सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण १७६ अर्थ—अत्यन्त प्रेम से हृदय से लगाकर कृष्ण ने कहा कि (हे) राधिका प्यारी सुनो वन मे रात मत करो । अब अपने घर चली जाओ । गुप्त प्रीति के बड़े रस को माता-पिता कोई मन मे जानने न पावे । दोनों माताओ को देखते मैं हाथ से कौर डालकर चल दिया । तुम जैसे मुझे प्रिय लगती हो (उसके आगे) चकोर, और चन्द्रमा क्या है । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने इन बातो से राधा को बहुत रिझा लिया ॥८५॥ मैँ बलि जाउँ कन्हैया की । करतैँ कौर डारि उठि धायी, बात सुनी बन गैया की । धौरी गाय अपनी जानी, उपजी प्रीति लवैया की । तातैँ जल समोइ पग धोवति, स्याम देखि हित मैया की । जो अनुराग जसोदा कैँ उर, मुख की कहनि कन्हैया की । यह सुख सूर और कहुँ नाहीँ, सौँह करत बल भैया की ॥८६॥ अर्थ—मैं कृष्ण पर निछावर जाती हूँ । (जब उन्होने) वन मे गाय (के व्याने) की बात सुनी तो वे हाथ से कौर डालकर उठकर दौड़े । अपनी धौरी गाय जानकर लाने वाले के प्रति प्रीति पैदा हुई । उसी से गर्म और ठंडा पानी मिलाकर पैर धोती है। कृष्ण माता के हित को देखकर अपने मुख से यह कहते हैं कि जो प्रेम यशोदा के हृदय मे हैं वह सुख और कही नही है । (यह मैं) बलभद्र की सौगंध करके कहता हूँ ॥८६॥ राधा अतिहिँ चतुर प्रवीन । कृष्ण कौँ सुख दै चली हँसि, हँस-गति कटि छीन । हार कैँ मिस इहाँ आई, स्याम मनि-कैँ काज । भयौ सब पूरन मनोरथ, मिले श्रीब्रजराज । गाँठि-आँचर छोरि कै, मोतिसरी लीन्ही हाथ । सखी अवति देखि राधा, लई ताकौँ साथ । जुवति बूझति कहाँ नागरि, निसि गई इक जाम । सूर ब्यौरौ कहि सुनायौ, मैँ गई तिहिँ काम ॥८७॥ अर्थ —राधा अत्यधिक चतुर तथा प्रवीण है । कृष्ण को सुख देकर क्षीण कमर वाली (राधा) हँसकर, हंस की चाल से चली । श्याम रूपी मणि के लिए हार का बहाना करके यहाँ आई थी । कृष्ण के मिलने पर उसकी सब मनोकामना पूरी हो गयी । आंचल की गांठ छोड़कर मोतियों की माला हाथ मे ले ली । सखी को आती हुई देखकर उसको साथ मे ले लिया । युवतियाँ पूँछती है कि एक पहर रात गये कहाँ गयी थी ? सूरदास कहते हैं कि राधा ने सब ब्योरा कह सुनाया (और कहा कि) मैं उसी काम से गई थी ॥८७॥