भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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१८४ सूरसागर सार सटीक करति अवसेर वृषभानु-नारी । प्रात तैं गई, वासर गयौ बीति सब, जाम निसि गई, धी कहँ वारी । हार कैं त्रास मैं कुँवरि त्रासी बहुत, तिहिं डरनि अजहूँ नहिं सदन आई । कहाँ मैं जाउँ, कह धौं रही रूसि कैं, सखिनि सौं कहति कहूँ मिलि माई । हार बहि जाइ, अति गइ अकुलाइ कैं, सुता कैं नाउँ इक वहै मेरैं । सूर यह बात जौ सुनैं अवहीँ महर, कहैं मोहिं ये ढंग तेरे ॥८८॥ अर्थ - वृषभानु की स्त्री चिन्ता करती हैं । राधा प्रात:काल से गयी है । दिन बीत गया, एक पहर रात भी बीत गयी, बेटी पता नही कहां है । हार के खोने के भय से मैंने बेटी को बहुत डराया, उसी के डर से अब तक घर नही आयी । मैं कहां जाऊं, पता नही कहाँ रूठकर चली गयी । सखियो से पूछती हैं कि वह कही मिली थी ? हार बह जाय । वह अत्यधिक आकुल होकर गयी है । लड़की के नाम पर मेरे वही अकेली (ही तो) है । सूरदास कहते हैं कि (राधा की मां कहती हैं) यह बात अभी महर सुनेगे तो कहेगे कि तेरा यही ढंग है ॥८८॥ राधा डर डराति घर आई । देखति हीं कीरति महतारी, हरषि कुँवरि उर लाई । धीरज भयौ सुता-माता जिय, दूरि गयौ तनु-सोच । मेरी कौं मैं काहैं त्रासी, कहा कियौ यह पोच । लै री मैया हार मोतिसरी, जा कारन मोहिं त्रासी । सूर राधिका के गुन ऐसे, मिलि आई अविनासी ॥८६॥ अर्थ - राधा डरती-डरती घर आई । देखते ही कीर्ति मां ने खुशी होकर राधा को हृदय से लगा लिया । बेटी और माता के (दोनो के) जी मे धीरज हुआ । मैंने (अपनी) लडकी को क्यो डराया और इसने क्या बुरा कार्य किया ? (राधा कहती है) मैया यह मोतियो का हार लो जिसके कारण तुमने मुझे डराया था । सूरदास कहते हैं कि राधा के गुण ऐसे है (जो कि) अविनाशी (कृष्ण) से मिलकर चली आयी ॥८६॥ परम चतुर वृषभानु-दुलारी । यह मति रची कृष्न मिलिबे की, परम पुनीत महा री । उत्त सुख दियौ नंद-नंदन कौं, इतहिं हरष महतारी । हार इतौ उपकार करायौ, कबहुँ न उर तैं टारी । जे सिव-सनक-सनातन दुर्लभ, ते बस किये कुमारी । सूरदास-प्रभु-कृपा अगोचर, निगमनि हू तैं न्यारी ॥६०॥