भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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राधाकृष्ण १८१ अर्थ—वृषभानु की दुलारी (राधा) परम चतुर है। कृष्ण से मिलने के लिए उसने यह परम पवित्र युक्ति (चाल) रची। उधर कृष्ण को सुख दिया, इधर माता को हर्ष दिया। हार ने इतना उपकार किया, इसलिए उसे कभी वक्षस्थल से नही टालती। जो शिव, सनक तथा सनातन को दुर्लभ हैं उन्हे राधा ने वश में कर लिया है। सूरदास कहते हैं कि प्रभु की कृपा अगोचर है तथा वेदो से भी न्यारी है ॥६०॥ प्रीति के बस्य ये हैं मुरारी। प्रीति के बस्य नटवर सुभेषहिँ धरचौ, प्रीति बस करज गिरिराज धारी। प्रीति के बस्य ब्रज भए माखन चोर, प्रीति बस्य दाँवरि बँधाई। प्रीति के बस्य गोपी-रमन नाम प्रिय, प्रीति बस्य जमल तरु मोच्छदाई। प्रीति-बस नंद-बंधन बरुन-गृह गए, प्रीति के वस्य वन-धाम कामी। प्रीति के बस्य प्रभु सूर त्रिभुवन विदित, प्रीति बस सदा राधिका स्वामी ॥६१॥ अर्थ—कृष्ण प्रेम के वश मे हैं। उन्होंने प्रेम के वश मे होकर नटवर वेष धारण किया, प्रेम के वश होकर गोवर्द्धन पर्वत को धारण किया है। प्रेम के वश मे होकर ब्रज मे माखन चोर हुए। प्रेम के वश होकर अपने को रस्सी में बँधाया। प्रेम के वश मे होने के कारण गोपी-रमण नाम प्रिय हो गया है। प्रेम के वश मे होकर यमलार्जुन को मोक्ष दिया। प्रीति के वश में होकर नन्द के बन्धन तथा वरुण के घर गये। प्रीति वश वन ओर घर मे कामी बने। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण प्रेम के वश में हैं, यह तीन लोक मे प्रसिद्ध है। राधिका के स्वामी सदा प्रेम के वश मे हैं ॥६१॥ भ्रम आजु सखी अरुनोदय मेरे, नैननि कौं धोख भयौ। की हरि आजु पंथ गहिं गवने, स्याम जलद की उनयौ। की वग पाँति भाँति, उर पर की, मुकुत-माल बहु मोल। कीधौँ मोर मुदित ह्वै नाचत, की बरह-मुकुट की डोल। की घनघोर गम्भीर प्रात उठि, की ग्वालनि की टेरनि। की दामिनी कौंधति चहुँ दिसि, की सुभग पीत पट फेरनि। की बनमाल लाल-उर राजति, की, सुरपति-धनु चारु। सूरदास-प्रभु-रस भरि उमंगी, राधा कहति बिचारु ॥६२॥ अर्थ—सखी आज सूर्य निकलने के समय मेरी आंखो को धोखा हो गया। मेरे इस रास्ते से कृष्ण गुजरे कि श्याम बादल झुक गये। बगूले की पंक्ति की तरह कि वक्ष पर बहुमूल्य मोती की माला है। पता नही प्रसन्न होकर मोर नाचते हैं कि मोर मुकुट डोल रहा है। न जाने प्रातः घनघोर बादल की गरज उठती है कि ग्वालो की पुकार