भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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१८२ सूरसागर सार सटीक है। चारों ओर विजली कौंधती है कि सुन्दर पीताम्बर फहर रहा है। हृदय पर सुन्दर वनमाला विराज रही है कि सुन्दर इन्द्र धनुष हैं। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के रस से उमँगकर राधा विचार कर कहती है ॥६२॥ राधिका हृदय तै धोख टारौ। नंद के लाल देखे प्रात-काल तैं, मेघ नहिं स्याम तनु-छवि बिचारी। इंद्र-धनु नहीं बन दाम बहु सुमन के, नहीं बग पाँति बर मोति माला। सिखी वह नहीं सिर मुकुट सीखंड पछ, तड़ित नहिं पीत पट-छवि रसाला। मंद गरजन नहीं चरन नूपुर-सबद, भोरही आजु हरि गबन कीन्हौ। सूर-प्रभु भामिनी भवन करि गवन, मन रवन दुख के दवन जानि लीन्हौ ॥६३॥ अर्थ—राधा हृदय से धोखा मिटा दो। तुमने प्रातःकाल कृष्ण को देखा था, मेघ को नही। कृष्ण के शरीर की शोभा के विषय मे विचार तो करो। इन्द्र का धनुष नही है बहुत से फूलो वाली वनमाला है। बगुलों की पंक्ति नही है बल्कि श्रेष्ठ मोती की माला है। वह मोर नही बल्कि सिर पर मोर के पंखों का मुकुट है। बिजली नही पीताम्बर की सुन्दर छवि है। मन्द गरजन नही चरण के नूपुरो का शब्द है। आज प्रातः ही कृष्ण ने गमन किया। सूरदास कहते है कि भामिनी अपने घर जाओ, तुमने मन को आकर्षित करने वाले, दुःख को दमन करने वाले कृष्ण को जान लिया है ॥६३॥ एक निष्ठा धन्य धन्य वृषभानु-कुमारी। धनि माता, धनि पिता तिहारे, तोसी जाई बारी। धन्य दिवस, धनि निसा तबहिं की, धन्य घरी, धनि जाम। धन्य कान्ह तेरैं बस जे हैं, धनि कीन्हे बस स्याम। धनि मति, धनि रति, धनि तेरी हित, धन्य भक्ति, धनि भाउ। सूर स्याम पति धन्य नारि तू, धनि-धनि एक सुभाउ ॥६४॥ अर्थ—वृषभानु की बेटी (राधा) धन्य-धन्य है। तुम्हारे माता और पिता धन्य है जिन्होने तुम्हारी जैसी बेटी पैदा की। वह दिन धन्य है, तब की रात धन्य है, घड़ी पहर (सब) धन्य है (जब तेरा जन्म हुआ)। कृष्ण धन्य हैं जो तुम्हारे वश मे हैं। तुम धन्य हो जिसने कि कृष्ण को वश मे किया है। तेरी बुद्धि, रति, हित, भक्ति भाव सब धन्य हैं। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण पति तू नारी (दोनो) धन्य हो। एक स्वभाव वाले (तुम दोनों) धन्य हो ॥६४॥ तोहिं स्याम हम कहाँ दिखावैं। तुमतैं न्यारे रहत कहूँ न वै, नैकुं नहीं बिसरावैं।