सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 184, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण १८३ एक जीव देही द्वै राची, यह कहि कहि जु सुनावैं । उनकी पटतर तुमकौं दीजैं, तुम पटतर वै पावैं । अमृत कहा अमृत-गुन प्रगटै, सो हम कहा बतावैं । सूरदास गूंगे कौ गुर ज्यौं, बूझति कहा बुझावैं ॥६५॥ अर्थ—हम तुमको कृष्ण कहां दिखावें । वे कहीं भी तुमसे अलग नही रहते और (तुम्हें) तनिक भी नही भुलाते । एक जीव तथा दो शरीर की रचना की है, यह कह- कह कर सुनाते है । उनकी उपमा तुमको दी जाय तथा तुम्हारी उपमा उनको प्राप्त हो । अमृत कैसे अमृत गुण प्रकट करता है, उसे हम कैसे बताये । सूरदास कहते हैं कि गूंगे के गुड़ के समान पूछने पर कैसे समझाया जाय ॥६५॥ सुनि राधा यह कहा बिचारै । वै तेरैं तू उनकैं रंग, अपनो मुख क्यौं न निहारै । जो देखौ तौ छांह आपनी, स्याम-ह्रदै ह्याँ छाया । ऐसी दशा नंद-नंदन की, तुम दोउ निर्मल काया । नीलांबर स्यामल तनु की छबि, तुम छवि पीत सुबास । घन-भीतर दामिनी प्रकाशित, दामिनि घन-चहुँ पास । सुन री सखी बिलख कहौं तोसौँ, चाहति हरि कौ रूप । सूर सुनहु तुम दोउ सम जोरी, एक स्वरूप अनूप ॥६६॥ अर्थ —सुनो राधा यह विचार क्यों करती हो । वह तुम्हारे रंग मे तुम उनके रंग में (रंग गयी हो), अपने मुख को क्यों नही निहारती हो । जो देखो तो अपनी छाया (देखो), कृष्ण का हृदय यहाँ छाया है। ऐसी दशा श्रीकृष्ण की है। तुम दोनों निर्मल शरीर (वाले) हो । नीले आकाश के समान श्यामल कृष्ण का शरीर है और तुम्हारी पीली सुगन्धित छवि है । बादल के भीतर (जैसे) बिजली प्रकाशित हो या बिजली वादल के चारों तरफ ( छायी ) हो । सुनो री सखी ताड़ करके तुमसे बात कहती हूँ (तुम) कृष्ण के रूप को चाहती हो । सूरदास कहते है कि (सखी कहती है) तुम दोनों समान जोड़ी तथा एक अनुपम स्वरूप वाले हो ॥६६॥ पिय तेरैं बस यौं री माई । ज्यौँ संगहिं संग छाँह देह-वस, प्रेम कह्यौ नहिँ जाई । ज्यौँ चकोर बस सरद चंद्र कैं, चक्रवात बस-भान । जैसेँ मधुकर कोमल कोस-बस, त्यौँ बस स्याम सुजान । ज्यौँ चातक बस स्वाँति बूँद कैँ, तन कैँ बस ज्यौँ जीय । सूरदास-प्रभु अति बस तेरैँ, समुझ देखि धौँ हीय ॥६७॥ अर्थ—सखी ! प्रिय कृष्ण यों तुम्हारे वश मे हैं जैसे साथ-ही-साथ रहने वाली छाया शरीर के वश में रहती है । ( तुम दोनों का ) प्रेम कहा नही जा सकता । (अकथनीय है) । जैसे चकोर शरद ऋतु के चन्द्रमा के वश मे रहता है, चक्रवाक सूर्य