सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 18, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय तथा भक्ति मंगलाचरण चरन-कमल बंदौं हरि-राइ। जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अँधे कौं सब कछु दरसाइ । बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराइ । सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तिहिं पाइ ॥१॥ अर्थ—मैं भगवान् के कमलवत् चरणों की वन्दना करता हूँ, जिनकी कृपा से लंगड़ा पर्वत लांघ जाता है [तथा] अन्धे को सब कुछ दिखाई पड़ने लगता है, बहरा सुनने लगता है, गूंगा बोलने लगता है तथा अत्यन्त निर्धन भी छत्रधर (सम्राट्) बन जाता है। सूरदास कहते है कि ऐसे कृपालु स्वामी के उन चरणों की मैं बार-बार वन्दना करता हूँ ॥१॥ सगुणोपासना अबिगत-गति कछु कहत न आवै । ज्यौँ गूँगैं मीठे फल कौ रस अंतरगत हीँ भावै । परम स्वाद सबही सु निरंतर अमित तोष उपजावै । मन-बानी कौं अगम-अगोचर, सो जाने जो पावै । रूप-रेख-गुन-जाति जुगति-बिनु निरालंब कित धावै । सब विधि अगम बिचारहिं तातैं सूर सगुन-पद गावै ॥२॥ अर्थ—[भगवान् के] अव्यक्त (निर्गुणस्वरूप) की कुछ रीति कही नही जा सकती । जैसे गूंगे को मीठे फल का स्वाद मन-ही-मन अच्छा लगता है, वैसे ही निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति का आनन्द भी अत्यन्त उच्चकोटि का है तथा निरन्तर असीम सन्तोष प्रदान करने वाला है। [निर्गुण ब्रह्म] मन वाणी के द्वारा दुर्बोध एव अग्राह्य है तथा इन्द्रियातीत है, जो उसे प्राप्त कर लेता है वही उसे जान पाता है (उससे उत्पन्न आनन्द तथा ज्ञान की अनुभूति मनुष्य अभिव्यक्त नही कर सकता ।) [निर्गुण ब्रह्म] रूप, आकार, गुण, जाति तथा तर्क से रहित (अव्यपदेश्य) है। इस प्रकार निरवलम्ब होकर [मन निर्गुण ब्रह्म के ध्यान मे] कहाँ दौड़े ? अतः (निर्गुण ब्रह्म को) विचार की दृष्टि से सब प्रकार से पहुँच के बाहर (अगम) जानकर सूर अपने पदो मे (ब्रह्म के) सगुण रूप का गायन कर रहा है ॥२॥ २