सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५ सूरसागर सार सटीक भक्तवत्सलता बासुदेव की बड़ी बड़ाई । जगत पिता, जगदीस, जगत-गुरु, निज भक्तनि की सहत ढिठाई । भृगु कौ चरन राखि उर ऊपर, बोले बचन सकल-सुखदाई । सिव-विरंचि मारन कौँ धाए, यह गति काहू देव न पाई । बिनु-बदलैँ उपकार करत हैं, स्वारथ बिना करत मित्राई । रावन अरि कौ अनुज विभीषन, ताकौँ मिले भरत की नाई । बकी कपट करि मारन आई, सो हरि जू बैकुंठ पठाई । बिनु दीन्हेँ ही देत सूर प्रभु, ऐसे हैंँ जदुनाथ गुसाईं ॥३॥ अर्थ—वासुदेव (श्रीकृष्ण) की महत्ता अवर्णनीय है । वे सम्पूर्ण संसार के पिता, स्वामी तथा गुरु हैं और अपने भक्तो की धृष्टता सहन कर लेते हैं । भृगु के चरणों [के आघात] को अपने हृदय पर सहन कर उन्होने सबको आनन्दित करने वाले वचनों का प्रयोग किया । [इस प्रकार की सहनशीलता के अभाव मे] शिव और ब्रह्मा [अपना अपमान करने वाले भृगु को] मारने दौडे । इस प्रकार की गति कोई भी देवता नही प्राप्त कर सका । [जैसी विष्णु भगवान् ने दिखलाई] प्रतिफल की इच्छा के बिना वे उपकार करते है । [तथा] स्वार्थ रहित सोहार्द्र का भाव रखते है । [उनकी इस उदारता का एक अन्य प्रमाण यह है कि] शत्रु रावण के छोटे भाई विभीषण से वे भरत की भाँति [अर्थात् भाई के समान निश्छल रूप से] मिले । बकी कपट [रूप धारण] करके भगवान् को मारने आयी थी, उसे उन्होने [कृपा करके] स्वर्ग भेज दिया । सूर के प्रभु भक्तो से बिना कुछ प्राप्त किये ही [बहुत कुछ] दे डालते है । यदुवंशियों मे श्रेष्ठ (श्री- कृष्ण) इस प्रकार के [उदार तथा महान्] स्वामी हैं ॥३॥ प्रभु कौ देखौ एक सुभाइ । अति-गंभीर-उदार-उदधि हरि, जान-सिरोमनि राइ । तिनका सौँ अपने जनकौ गुन मानत मेरु-समान । सकुचि गनत अपराध-समुद्रहिँ बूंद-तुल्य भगवान । बदन-प्रसन्न कमल सनमुख ह्वैँ देखत हौँ हरि जैसेँ । विमुख भए अकृपा न निमिषहूँ, फिरि चितयौँ तो तैसेँ । भक्त-विरह कातर करुनामय, डोलत पाछैँ लागे । सूरदास ऐसे स्वामी कौँ देहिँ पीठि सो अभागे ॥४॥ अर्थ—प्रभु (भगवान् श्रीकृष्ण) का एक स्वभाव [विशेष रूप मे] दिखाई पडता है । भगवान् सागर की भाँति गंभीर तथा उदार है । ज्ञानियों मे सर्वश्रेष्ठो के राजा है । अपने भक्त के तृणवत् (अल्प) गुणो को वे सुमेरु पर्वत के समान (महान्) हैं तथा समुद्र तुल्य [बडे-बडे] अपराधो को बूंद के समान छोटा मानते है । [भक्त के] भगवान्