भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 20

के समक्ष (शरण में) जाने पर जिस प्रकार वे कमल की भाँति प्रसन्नमुख दिखाई पड़ते है, (भक्त के) विमुख हो जाने पर भी वे [वैसे ही प्रसन्नमुख तथा कृपालु रहते हैं और] उसके ऊपर एक क्षण के लिये भी क्रोध नही करते । भक्त जब फिर उनकी ओर झुकता है तो वे पूर्ववत् ही [कृपालु] हो जाते हैं। भक्त के विरह में व्याकुल भगवान् उसके पीछे लगे घूमते रहते हैं। सूरदास कहते हैं कि ऐसे कृपालु स्वामी से मुख मोड़ने वाले बड़े ही अभागे हैं ॥४॥ राम भक्तवत्सल निज बानौँ । जाति, गोत, कुल नाम, गनत नहिँ, रंक होइ कै रानौँ । सिब-ब्रह्मादिक कौन जाति प्रभु, हौं अजान नहिँ जानौँ । हमता जहाँ तहाँ प्रभु नाहीँ, सो हमता क्योँ मानौँ ? प्रगट खंभ तैँ दए दिखाई, जद्यपि कुल कौ दानौ । रघुकुल राघव कृष्ण सदा ही, गोकुल कीन्हौँ थानौ । बरनि न जाइ भक्त की महिमा, बारंबार बखानौँ । ध्रुव राजपूत, बिदुर दासी-सुत कौन कौन अरगानौ । जुग जुग बिरद यहै चलि आयौ, भक्तनि हाथ बिकानौ । राजसूय मैँ चरन पखारे स्याम लिए कर पानीँ । रसना एक, अनेक स्याम-गुन, कहँ लगि करौँ बखानौ । सूरदास-प्रभु की महिमा अति, साखी बेद पुरानौ ॥५॥ अर्थ—भक्तवत्सलता ही भगवान् का निजी स्वरूप, बिरद (बाना) है। [भक्त के प्रति वात्सल्य भाव रखने मे] वे जाति, गोत्र, कुल तथा नाम (आदि) की गणना (भेद) नही करते, न इस बात का कि वह रंक है या राजा । हे प्रभु, शिव ब्रह्मा आदि की कौन जाति है - मैं अज्ञानी कुछ नहीं जानता । अहंकार की भावना जहाँ होती है वहाँ प्रभु [का सान्निध्य] प्राप्त नही हो सकता, तो ऐसे अहंकार की भावना को हम प्रश्रय क्यो दे ? यद्यपि [प्रह्लाद] दैत्यवंश मे उत्पन्न हुआ था [तथापि उसकी रक्षा के लिये] स्तम्भ से प्रकट हुये । [भगवान्] [रघुवंश मे रामचन्द्रजी के रूप मे प्रकट हुए तथा] श्रीकृष्ण के रूप मे गोकुल को [उन्होने] अपना स्थान बनाया । भक्त की महिमा का [आसानी से] वर्णन नही हो सकता [इस कारण मैं] बार-बार उनका बखान कर रहा हूँ। ध्रुव राजपुत्र थे किन्तु विदुर दासी पुत्र थे तथा और भी किसका किसका भेद करूँ (तफ़सील दूँ) [जिनके उद्धार मे भगवान् ने भेद-भाव नही रखा] युगो से भगवान् का यह गुण या सुयश (बिरद) प्रसिद्ध है कि वे भक्तो के हाथ बिक चुके है । [महाराज युधिष्ठिर के] राजसूय में भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने हाथ मे जल लेकर [अपनी महत्ता का विचार न करके राजाओ के] चरण धोये । जिह्वा एक है किन्तु श्याम के गुण अनेक हैं उनका बखान कहाँ तक करूँ ? सूरदास के प्रभु की महिमा असीम है, वेद तथा पुराण इसके साक्षी (समर्थक) है ॥५॥