भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 359 में से

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पृष्ठ 186

राधाकृष्ण १८५ अर्थ-राधा के घर सखियां मिलने आईं । (राधा) अत्यन्त व्याकुल है तथा उसके होश-हवास कुछ नहीं है, (यहाँ तक कि) अपने शरीर की दशा (भी) भूल गयी है । (सखियां) बांह पकड़ कर पूछने लगी—सखी तुम्हें क्या हुआ ? ऐसी विवश तुम क्यों हो गयी हो ? मुझे सुनाकर कहो ! कल तेरा और ही रंग देखा था, आज (क्यो) मुरझा गयी हो ? सूरदास कहते हैं कि (सखियां कहती है) क्या कृष्ण को देखा है, कि फिर उन्होने जादू कर दिया ॥१००॥ अब मैं तोसों कहा दुराऊँ । अपनी कथा, स्याम की करनी, तो आगैं कहि प्रगट सुनाऊँ । मैं बैठी ही भवन आपनैं, आपुन द्वार दियौ दरसाऊँ । जानि लई मेरे जिय की उन, गर्व-प्रहारन उनकौँ नाऊँ । तबहीं तैं व्याकुल भई डोलति, चित्त न रहै कितनौ समुझाऊँ । सुनहु सूर ग्रह वन भयो मोकौँ, अब कैसे हरि दरसन पाऊँ ।.१०१॥ अर्थ - अब मैं तुमसे क्या छिपाऊँ । अपनी कथा और कृष्ण की करतूत तुम्हारे आगे प्रत्यक्ष सुनाती हूँ। मैं अपने घर बैठी थी, वे स्वयं द्वार पर दिखाई दिये। उन्होने मेरे मन की बात जान ली । 'गर्व के प्रहारक' उनका नाम (ही) है। तभी से व्याकुल होकर फिरती हूँ, कितना ही मन को समझाती हूँ वह नही मानता (चैन नही मिलता) । सूरदास कहते हैं कि (राधा सखियो से कहती है) घर मेरे लिए वन हो गया है अब कैसे कृष्ण का दर्शन प्राप्त करूँ ॥१०१॥ हमरी सुरति बिसारी बनवारी, हम सरबस दै हारी । पै न भए अपने सनेह बस, सपनेहूँ गिरधारी । वै मोहन मधुकर समान सखि, अनबन बेली-चारी । व्याकुल विरह व्यापी दिन-दिन हम, नीर जु नैननि ढारी । हम तन मन दै हाथ बिकानी, वै अति निठुर मुरारी । सूर स्याम बहु रवनि रमन, हम इक ब्रत, मदन-प्रजारी ॥१०२॥ अर्थ-हमारी स्मृति कृष्ण ने भुला दी । मैं सर्वस्व देकर हार गयी । तब भी कृष्ण स्वप्न में भी अपने स्नेह के वश नहीं हुए । सखी वह मोहन भ्रमर के समान हैं जो असंख्य लताओं पर विचरण करने वाले हैं। व्याकुल हो मैं दिन-प्रति-दिन विरह से व्याप्त हो रही हूँ और आंखो से आँसू ढुलकाती हूँ। मैं तन-मन (उनके) हाथ देकर बिक गयी । वे कृष्ण अत्यधिक निष्ठुर हैं। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) कि वह बहुत-सी स्त्रियो के साथ रमण करने वाले हैं, मैं एकव्रता काम की अग्नि से जली हुई हूँ ॥१०२॥ मैं अपनी सी बहुत करी री । मोसों कहा कहति तू माई, मन कैं सँग मैं बहुत लरी री । राखौं हटकि, उतहिं कौ धावत, बाकी ऐसियै परनि परी री । मोसौँ वैर करै रति उनसौँ, मोकौँ राख्यो द्वार खरी री ।

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