सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजहूँ मान करौं, मन पाऊँ, यह कहि इत-उत चितै डरी री। सुनहु सूर पाँचनि मत एकै, मैं री मोही रही परी री ॥१०३॥ अर्थ—मैंने अपना सा बहुत (कुछ) किया। सखी मुझसे तू क्या कहती है, मन के साथ मैंने बहुत लड़ाई लड़ी। हठ करके उसे रोकती हूँ, वह उधर ही दौड़ता है फिर उसकी ऐसी आदत पड़ गयी है। मुझसे शत्रुता करता है उनसे प्रेम करता है, मुझे द्वार पर खड़ी रखता है। अब भी मान करूँ यदि मन को पा जाऊँ। यह कहकर इधर- उधर देखकर भयभीत हुई। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) (सखियों) सुनो ये पाँचों इन्द्रियाँ एक ही विचार रखती हैं। मैं ही मोह मे पड़ कर खड़ी रह गयी अथवा मोह से आविर्भूत होकर पड़ी रहती हूँ ॥१०३॥ भूलि नहीं अब मान करौँ री। जातैं होइ अकाज आपनौ, कहैं वृथा मरौँ री। ऐसे तन मैं गर्व न राखौँ, चिंतामनि बिसरौँ री। ऐसी बात कहै जो कोऊ, ताकै संग लरौँ री। आरजपंथ चलैं कह सरिहै, स्यामहिं संग फिरौँ री। सूर स्याम जउ आपु, स्वारथी, दरसन नैन भरौँ री ॥१०४॥ अर्थ—अब भूल कर भी मान नहीं करूँगी। जिससे अपना अनिष्ट होता है, क्यो व्यर्थ मरूँ। ऐसे शरीर मे गर्व नही रखूँगी, (न तो) चिंतामणि को भूलूँगी। ऐसी बात जो कोई करेगा उसके साथ लड़ूँगी। आर्य पथ (श्रेष्ठ मार्ग) पर चलने से क्या कल्याण होगा ? (इससे) कृष्ण के साथ घूमूँगी। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) कि कृष्ण भले ही स्वयं स्वार्थी हों किन्तु उनका दर्शन करके नेत्रो को (रस से) भर लूंगी ॥१०४॥ माई मेरौ मन पिय सौं यौँ लाग्यौ, ज्यौँ संग लागी छाँहि। मेरौ मन पिय जीव वसत हैं, पिय जिय मो मैं नाहि। ज्यौँ चकोर चंदा कौं निरखत, इत-उत दृष्टि न जाइ। सूर स्याम बिनु छिन-छिन जुग सम, क्योँ करि रैन विहाइ ॥१०५॥ अर्थ—सखी, मेरा मन प्रिय (कृष्ण) से ऐसा लगा है जैसे साथ में छाया लगी रहती है। मेरा मन प्रिय के प्राण में बसता है, लेकिन प्रियतम का जीव मुझमे नही (बसता है)। जैसे चकोर चन्द्रमा को देखता है, उसकी इधर-उधर दृष्टि नही जाती। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) कृष्ण के बिना क्षण-क्षण युग के समान लगता है फिर (वियोग) की रात कैसे बीते ॥१०५॥ अद्भुत एक अनूपम बाग। जुगल कमल पर गज बर क्रीड़त, तापर सिंह करत अनुराग। हरि पर सरवर, सर पर गिरिवर, गिर पर फूले कंज-पराग। रुचिर कपोत बसत ता ऊपर, ता ऊपर अमृत फल लाग।