भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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राधाकृष्ण १८७ फल पर पुहुप, पुहुप पर पल्लव, ता पर सुक, पिक, मृद मद काग । खंजन, धनुष, चंद्रमा ऊपर, ता ऊपर एक मनिधर नाग । अंग-अंग प्रति और-और छवि, उपमा ताकौँ करत न त्याग । सूरदास प्रभु पियौ सुधा-रस, मानौ अधरनिं के बड़ भाग ॥१७६॥ अर्थ - एक अद्भुत तथा अनुपम बाग है । दो कमलो (चरणों) के ऊपर श्रेष्ठ- हाथी (जांघ) खेलते हैं। उस पर सिंह (कमर) अनुराग करता है। सिंह पर सरोवर (नाभि प्रदेश) है, सरोवर के ऊपर पहाड (पयोधर) हैं, उस पर पराग युक्त कमल (कंचुकी के बेल-बूटे) फूले हैं। उसके ऊपर रुचिकर कबूतर (गला) बसता है, उसमे अमृत का फल (ठुड्डी) लगा है। फल के ऊपर फूल (तिल) है, फूल के ऊपर पल्लव (अधर) हैं। उस पर तोता (नाक), कोयल (वाणी), मृग (कस्तूरी वेदी), कौआ (वालो के पट्टे) (शोभित) है। खंजन (नेत्र), धनुष (भौंह), चन्द्रमा (मस्तक) उसके ऊपर एक मणिधर सर्प (मणि जटित आभूषण सहित वेणी) है। प्रति अंग में अधिक- से-अधिक शोभा है, उपमा उनका त्याग नही करती । सूरदास कहते है कि हे कृष्ण, अमृत रस पान करो, मानो (तुम्हारे) ओठो का बड़ा सौभाग्य है ॥१७६॥ भुज भरि लई हिरदय लाइ । बिरह व्याकुल देखि बाला, नैन दोउ भरि आइ । रैनि बासर बीच मैँ, दोऊ गए मुरझाइ । मनौ वृच्छ तमाल बेली, कनक सुधा सिंचाइ । हरष डहडह मुसुक फूलै, प्रेम फलनि लगाइ । काम मुरझनि बेली तरु की, तुरत ही बिसराइ । देखि ललिता मिलन वह, आनंद उर न समाइ । सूर के प्रभु स्याम स्यामा, त्रिबिध ताप नसाइ ॥१७७॥ अर्थ-भुजा से भरकर हृदय से लगा लिया। विरह से व्याकुल स्त्री को देख- कर दोनो नेत्र (आंसू से) भर आये। रात-दिन के बीच मे ही दोनो मुरझा गये। मानों तमाल के वृक्ष की स्वर्ण लता अमृत से सिंचकर, हर्ष से हरी भरी होकर, मुस्करा कर फूल गयी और उसमें प्रेम के फल लग गये। काम-पीड़ा से मुरझाई हुई तरु-लता ने तुरन्त अपनी आकुलता (मुरझनि) को भुला दिया। उस मिलन को देखकर ललिता के हृदय मे आनन्द नही समाता। सूरदास कहते हैं कृष्ण ने प्रिया के विविध ताप को नष्ट कर दिया ॥१७७॥ ललित प्रेम-बिबस भई भारी । वह चितवनि, वह मिलनि परस्पर, अति सोभा वर नारी । इकटक अंग-अंग अवलोकति, उत बस भए बिहारी । वह आतुर छबि लेत देत वै, इक तैँ इक अधिकारी ।