सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ सूरसागर सार सटीक ललिता संग सखिनि सोँ भाषति, देखी छवि पिय-प्यारी । सुनहु सूर ज्यौँ होम अगिनि घृत, ताहूँ तैं यह न्यारी ॥१०८॥ अर्थ - ललिता अत्यधिक प्रेम से विवश हो गयी । वह दृष्टिपात, वह परस्पर का मिलन, (वह) श्रेष्ठ नारी की अत्यधिक शोभा (सब सराहनीय है) । एक निगाह से (कृष्ण के) अग-अंग को देखती है, उधर कृष्ण वश मे हो गये हैं । वे आतुर होकर शोभा का आदान-प्रदान करते है। वे एक-से-एक बढकर हैं । ललिता सखियो के साथ बातचीत करती है कि प्रिय और प्यारी की शोभा देखो । सूरदास कहते हैं कि (ललिता कहती है) ज्यो होम की अग्नि मे घी हो, उससे भी यह निराली है ॥१०८॥ राधहिं मिलेहुँ प्रतीति न आवति । जदपि नाथ विधु वदन विलोकत, दरसन को सुख पावति । भरि-भरि लोचन रूप-परम-निधि, उरमैं आनि दुरावति । विरह-विकल मति दृष्टि दुहूँ दिसि, सँचि सरघा ज्यों धावति । चितवत चकित रहत चित अंतर, नैन निमेष न लावति । सपनौ आहि कि सत्य ईस यह, बुद्धि वितर्क बनावति । कबहूँक करति विचार कौन हौं, को हरि कैं हिय भावति । सूर प्रेम की बात अटपटी, मन तरंग उपजावति ॥१०६॥ अर्थ-राधा को (कृष्ण से) मिलने पर भी विश्वास नही आता है। यद्यपि वह कृष्ण के चन्द्र वदन को देखकर दर्शन का सुख पाती है। आंखो से रूप की परम निधि भरकर हृदय मे ले आकर छिपाती है। विरह से व्याकुल बुद्धि (वाली राधा) की दृष्टि दोनों दिशाओ मे है, जैसे मधु इकट्ठा करके मधुमक्खी दौड़ती है। चकित दृष्टि से चित्त के अन्तर मे देखती रहती है क्षण भर भी आंख नही लगाती । बुद्धि मे तर्क-वितर्क करती है कि हे ईश्वर यह सत्य है या स्वप्न है। कभी विचार करती है कि मैं कौन हूँ, और कौन कृष्ण के हृदय को भाती है। सूरदास कहते हैं कि प्रेम की अटपटी बात मन मे तरंग उत्पन्न करती है ॥१०६॥ स्याम भए. राधा वस ऐसेँ । चातक स्वाँति, चकोर चंद ज्यौँ, चक्रवाक रवि जैसेँ । नाद कुरंग, मीन जल की गति, ज्यौँ तनु कैं वस छाया । इकटक नैन अंग-छवि मोहेँ, थकित भए पति जाया । उठैँ उठत बैठैँ बैठत हैं, चलैँ चलत सुधि नाहीँ । सूरदास बड़भागिनि राधा, समुझि मनहिं मुसुकाही ॥११०॥ अर्थ-कृष्ण ऐसे राधा के वश मे हो गये है जैसे चातक स्वांति (के बूंद) के चकोर चन्द्रमा के, चक्रवाक सूर्य के वश मे रहता है । जैसे शब्द के वश में मृग, जल की गति के वश मे मछली और शरीर के वश मे छाया रहती है। एकटक नेत्र अंग की छवि पर मोहित हो गये हैं, वे पति (के नेत्र) पत्नी (की छवि) देखते-देखते थकित