भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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हो गये । (राधा के) उठने पर उठते हैं, बैठने पर बैठते हैं, चलने पर चलते हैं, (उन्हें) कुछ स्मरण नहीं रहता । सूरदास कहते हैं कि राधा बड़ी भाग्यवाली है, (यह) समझ कर मन ही (मन) मुस्कराती है ॥११०॥ निरखि पिय-रूप तिय चकित भारी । किधौं वै पुरुष मैं नारि, की वै नारि मैं ही हौं तन सुधि बिसारी । आपु तन चितै सिर मुकुट कुंडल स्त्रवन, अधर मुरली, मालवन बिराजै । उतहिं पिय-रूप सिर माँग बेनी सुभग, भाल बेंदी-बिंदु महा छाजै । नागरी हठ तजौ, कृपा मरि मोहिं भजौ; परी कह चूक सो कहौ प्यारी । सूर नागरी प्रभु-बिरह-रस मगन भई, देखि छवि हँसत गिरिराजधारी ॥१११॥ अर्थ-प्रिय के रूप को देखकर स्त्री (राधा) चकित हो गयी । (वह सोचती है) वह पुरुष हैं, मैं नारी हूँ कि वे नारी हैं, मैं (पुरुष) हूँ; मैं अपने शरीर की स्मृति भूल चुकी हूँ । अपने शरीर को देखकर उसे लगता है, उसके सिर पर मुकुट, कानो में कुंडल, ओठ से मुरली, (उर पर) वनमाल विराजती है । उधर प्रिय इस रूप मे दिखाई देते हैं—सिर पर मांग, सुन्दर वेणी, मस्तक पर बेंदी का बिन्दु बहुत सुशो- भित है । (राधा कहती है) नागरी हठ छोड़ो, कृपा करके मुझको भजो, कहो प्यारी किस चूक में पड गयी हो । सूरदास कहते हैं कि (राधा) प्रभु के विरह रस मे मग्न हो गयी, (इस) छवि को देखकर कृष्ण हँसते है ॥१११॥ कृष्ण गोपिका नंद-नंदन तिय-छवि तनु काछे । मनु गोरी साँवरी नारि दोउ, जाति सहज मै आछे । स्याम अंग कुसुमी नई सारी, फल गुंजा की भाँति । इत नागरि नीलांबर पहिरे, जनु दामिनी घन काँति । आतुर चले जात बन धामहिं, मन अति हरष बढ़ाए । सूर स्याम वा छवि कौं नागरि, निरखति नैन चुराए ॥११२॥ अर्थ-कृष्ण अपने शरीर पर स्त्री का रूप संवारे हैं । मानो गोरी और सांवली दोनो स्त्रियां अच्छी तरह से सहजता से चली जा रही है । गुंजा फल की तरह कृष्ण के शरीर पर कुसुमी रंग की साड़ी है । इधर राधा नीलाम्बर पहने है, जैसे बादलो में बिजली की काँति हो । मन मे अत्यन्त हर्ष बढ़ाकर, आतुर होकर वन के कुंज-गृह