सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण १८१ जैसी तुम तैसी है येऊ, भली बनी तुमसी री । सुनहु सूर अति चतुर राधिका, येइ चतुरनि की गौ है री ॥११५॥ अर्थ—कहो राधा यह कौन है। (यह) अत्यधिक सुन्दर, सांवली, सलोनी तीनों लोक के मन को मोहती है और कोई स्त्री इसके समान नही है। इससे कह दो हमारी ओर न देखे, (यह) किसकी पुत्री है, किसी की स्त्री है अथवा यह नवयुवती है। जैसी तुम हो वैसे ही यह भी है। तुम्हारे समान अच्छी बनी हुई है। सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती है) राधिका अत्यधिक चतुर है, यही चतुरो की चाल है ॥११५॥ मथुरा तैं ये आई है। कछु सम्बन्ध हमारौ इनसौँ, तातैं इनहिँ बुलाई है। ललिता सग गई दधि वेँचन, उनहीँ इनहिँ चिन्हाई है। उहै सनेह जानि री सजनी, आजु मिलन हम आई है। तब ही की पहिचानि हमारी, ऐसी सहज सुभाई है। सूरदास मोहिँ आवत देखी, आपु संग उठि धाई है ॥११६॥ अर्थ—(यह) मथुरा से आई है। हमारा इसका कुछ सम्बन्ध है, इसी से इसे बुलाया है। ललिता के साथ दही बेचने गयी थी, उसने ही इसे पहचनवा दिया। उसी स्नेह को जानकर सखी; यह हमसे मिलने आई है। तभी की हमारी इसकी पहचान है। यह ऐसे ही सहज स्वभाव वाली है। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) मुझे देखकर स्वयं उठकर साथ दौड़ी चली आई ॥११६॥ इनकोँ ब्रजहीँ क्यौँ न बुलावहु । की वृषभानु पुरा, की गोकुल, निकटहिँ आनि बसावहु । येऊ नवल नवल तुमहूँ हौ, मोहन कौँ दोउ भावहु । मोकौँ देखि कियौ अति घूँघट, काहैं न लाज छुड़ावहु । यह अचरज देख्यौ नहिँ कबहुँ, जुवतिहिँ जुहुति दुरावहू । सूर सखी राधा सौँ पुनि पुनि, कहति जु हमहिँ मिलावहु ॥११७॥ अर्थ—इनको ब्रज मे क्यों नही बुला लेती हो। वृषभानुपूर या गोकुल (कही) निकट लाकर बसा लो। यह भी नवल है और तुम भी, दोनो मोहन (कृष्ण) को अच्छी लगोगी। मुझे देखकर इसने अत्यधिक घूंघट कर लिया, इसकी लाज क्यो नही दूर करती हो। यह आश्चर्य कभी नही देखा कि युवती ही युवती को छिपाये। सूरदास कहते हैं कि सखी राधा से बार-बार कहती है कि हमे (इससे) मिलाओ ॥११७॥ मथुरा मैँ वस वास तुम्हारौ ? राधा तैं उपकार भयौ यह, दुर्लभ दरसन भयौ तुम्हारौ । वार-वार कर गहि निरखति, घूँघट-ओट करौ किन न्यारौ । कवहूँक पर परसति कपोल छुइ, चुटकि लेति ह्या हमहिँ निहारी ।