सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ सूरसागर सार सटीक कछु मैं हूँ पहिचानति तुमकौं, तुमहिं मिलाऊँ नंद-दुलारी। काहे कौं तुम सकुचति हौ जू, कहौ काह है नाम तुम्हारी। ऐसो सखी मिली तोहिं राधा, तौ हमकौं काहै न बिसारी। सूरदास दम्पति मन जान्यौ, यातैं कैसें होत उबारी ॥११८॥ अर्थ- बस मथुरा मे ही तुम्हारा निवास है। राधा के द्वारा यह उपकार हुआ कि तुम्हारा दुर्लभ दर्शन हो गया। वार-वार हाथ पकड कर देखती है (ओर कहती है) घूंघट की ओट को दूर क्यो नही करती हों। कभी कपोल (गाल) छूकर हाथ छूती है फिर चुटकी लेती है कि मेरी तरफ देखो। मैं तुमको कुछ पहचान रही हूँ, तुम्हे कृष्ण से मिला दूँगी। तुम क्यो संकोच करती हो, कहो तुम्हारा क्या नाम है ? राधा तुम ऐसी सखी पाकर हम जैसी सखियो को क्यो न भूल जाओ। सूरदास कहते है कि कृष्ण और राधा दोनों मन मे जान गये कि अब इससे कैसे उवार हो ॥११८॥ ऐसी कुंवरि कहाँ तुम पाई। राधा हूँ तें नख-सिख सुंदरि, अब लौं कहाँ दुराई। काकी नारि, कौन की बेटी, कौन गाउँ तैं आई। देखी सुनी न ब्रज, वृन्दावन, सुधि-बुधि हरति पराई। धन्य सुहाग भाग याकौ, यह जुवतिनि की मनभाई। सूरदास-प्रभु हरषि मिले हँसि, लै उर कठ लगाई ॥११९॥ अर्थ-अर्थतुम ऐसी कुमारी (कुंवरि) कहाँ पा गई। राधा से भी इसके नख- शिख सुन्दर है, (ऐसे अंगो को) अब तक कहाँ छिपाये थी। किसकी स्त्री है, किसकी बेटी है और किस गाँव से आई है। ब्रज और वृन्दावन मे (तुम्हे) न तो देखा है न सुना है। (तुम) दूसरे की स्मृति और बुद्धि दोनों हरती हो। इसका सुहाग और भाग्य दोनो धन्य है जो कि इन युवतियो के मन को भा गयी। सूरदास कहते है कि कृष्ण हँसकर गले से लगाकर मिल गये ॥११९॥ नँद-नंदन हँसे नागरी-मुख चितै, हरषि चंद्रावलि कंठ लाई। बाम भुज रवनि, दच्छिन भुज सखी पर, चले बन धाम सुख कहि न जाई। मनौ बिबि दामिनि, बीच नव घन सुभग, देखि छवि काम रति- सहित लाजै। किधौं कंचन-लता, बीच सुतमाल तरु, भामिनिनि बीच गिरिधर विराजै। गए गृहकुंज, अलिगुंज, सुमननि पुंज, देखि आनंद भरे सूर स्वामी। राधिका-रवन, जुवती-रवन, मन-रँवन निरखि छवि होत मन- काम कामी ॥१२०॥