भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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१६४ सूरसागर सार सटीक आलिंगन दै अधर दसत खंडि, कर गहि चिबुक उठावत । नासा सौं नासा लै जोरत, नैन नैन परसावत । इहिं अंतर प्यारी उर निरख्यौ, झझकि भई तब न्यारी । सूर स्याम मोकौं दिखरावत, उर ल्याए धरि प्यारी ॥१२३॥ अर्थ—प्रिय को देखकर प्यारी ने हँस दिया । कृष्ण अंग-अंग देखकर रीझ गये, हँसकर उन्होने नागरि (राधा) को हृदय से लगा लिया । आलिंगन देकर, अधरो पर दांतो के चिह्न देकर, हाथ से ठुड्डी पकड़कर उठाते हैं । नाक से नाक जोड़ते हैं, नेत्र से नेत्र स्पर्श कराते हैं । इसी बीच प्यारी ने वक्ष-स्थल को देखा और तब झिझककर अलग हो गयी । सूरदास कहते हैं कि मुझे दिखाते हुए कृष्ण ने प्यारी को पकड़कर हृदय से लगा लिया ॥१२३॥ मान करौ तुम और सवाई । कोटि करौ एकै पुनि द्वै हौ, तुम अरु मोहन माई । मोहन सो सुनि नाम श्रवनहौँ, मगन भई सुकुमारी । मान गयौ, रिस गई तुरतहीँ, लज्जित भई मन भारी । धाइ मिली दूतिका कंठ सौं, धन्य-धन्य कहि बानी । सूर स्याम बन धाम जानिकै, दरसन कौँ अतुरानी ॥१२४॥ अर्थ—अब तुम सवाया (और अधिक) मान करो । हजारों यत्न करो, तुम और मोहन अन्ततः एक ही होगे । मोहन का नाम कान से सुनकर सुकुमारी राधा प्रसन्न हो गयी । मान समाप्त हो गया, तुरन्त ही क्रोध चला गया, मन मे अत्यधिक लज्जित हुई । धन्य-धन्य की वाणी कहकर, दौड़कर दूती के गले से लिपट गयी । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण को कुन्ज वन मे जानकर (राधा) दर्शन के लिए आतुर हो गयी ॥१२४॥ चलौ किन मानिनि कुंज-कुटीर । तुव बिनु कुँवर कोटि बनिता तजि, सहत मदन की पीर । गदगद स्वर संभ्रम अति आतुर, स्रवत सुलोचन नीर । क्वासि क्वासि वृषभानु नंदिनी, बिलपत बिपिन अधीर । बंसी बिसिष, माल ब्यालावलि, पंचानन पिक कीर । मलयज गरल, हुतासन मारुत, साखामृगरिपु चीर । हिय मैं हरषि प्रेम अति आतुर, चतुर चली पिय तीर । सुनि भयभीत बज्र के पिंजर, सूर सुरति-रनधीर ॥१२५॥ अर्थ—मानिनी कुन्ज-कुटीर क्यों नही चलती । तुम्हारे बिना कृष्ण हजारो स्त्रियो को छोड़कर काम-पीड़ा सह रहे हैं। गद्गद स्वर तथा भ्रम के साथ आतुर होकर आंखो से आंसू गिराते हैं । वृषभानु की बेटी (राधा) कहाँ है, कहां है (कहकर) वे वन में विलाप कर रहे हैं ? (उनके लिए) वंशी वाण, माला सर्प, कोयल तथा तोता सिंह, मलयज विष, वायु अग्नि, चोर शाखामृग (बन्दर) के शत्रु (कांटा) के समान हो गए