सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहैं। यह सुनकर काम क्रीडा में धैर्य धारण करने वाली राधा का कठोर मन भय विह्वल हो गया और वे चतुर (राधा) हिय में हर्षित तथा प्रेम से आतुर होकर प्रिय के पास चली ॥१२५॥ स्याम नारि कैँ बिरह भरे। कबहुँक बैठन कुंज द्रुमनि तर, कबहुँक रहत खरे। कबहुँक तनु की सुरति बिसारत, कबहुँक तनु सुधि आवत। तब नागरि के गुनहिं बिचारत, तेई गुन गनि गावत। कहूँ मुकुट, कहूँ मुरलि रही गिरि, कहूँ कटि पीत पिछौरी। सूर स्याम ऐसी गति भीतर, आइ दूतिका दौरी ॥१२६॥ अर्थ—कृष्ण नारी (राधा) के विरह से आकुल हैं। कभी कुन्ज के वृक्षों के नीचे बैठते हैं, कभी खड़े रहते हैं। कभी उन्हे शरीर की स्मृति भूल जाती है, कभी शरीर की स्मृति आ जाती है। तब नागरि (राधा) के गुणो का विचार करते हैं, उसी के गुणों का गुणगान करते हैं। कही मुकुट, कही मुरली तथा कही पीताम्बर तथा पिछौरी गिर गयी है। सूरदास कहते हैं कि ऐसी अवस्था मे दूती दौडती हुई आई ॥१२६॥ धनि वृषभानु-सुता बड़ भागिनि। कहा निहारति अंग-अंग-छवि, धन्य स्याम-अनुरागिनि। और त्रिया नख-शिख सिंगार सजि, तेरैं सहज न पूरैँ। रति, रम्भा, उरवसी, रमा सी, तोहिं निरखि मन झूरैँ। ये सब कंत सुहागिनि नाहीं, तू है कंत-पियारी। सूर धन्य तेरी सुन्दरता, तोसी और न नारी ॥१२७॥ अर्थ—बडे भाग्य वाली वृषभानु की बेटी (राधा) धन्य हो। अंग-अंग की शोभा को क्या देखती हो। श्याम की अनुरागिनी (तुम) धन्य हो। अन्य स्त्रियां नख से शिख तक श्रृंगार करके तुम्हारे सहज (सौंदर्य) की वरावरी नही कर सकती। तुम रति, रंभा, उर्वशी के समान हो, तुम्हे देखकर मन झुलस जाता है। ये सब कंत (कृष्ण) की सुहागिनी नही है तुम्ही कृष्ण को प्यारी हो। सूरदास कहते हैं कि तुम्हारी सुन्दरता धन्य है, तुम्हारे समान और कोई नही है ॥१२७॥ सँग राजति वृषभानु कुमारी। कुंज सदन कुसुमनि सेज्या पर, दम्पति सोभा भारी। आलस भरे मगन रस दोऊ, अंग-अंग प्रति जोहत। मनहुँ गौर स्यामल ससि नव तन, बैठे संमुख सोहत। कुंज भवन राधा-मनमोहन, चहूँ पास ब्रजनारी। सूर रहीँ लोचन इकटक करि, डारतिं तन मन वारी ॥१२८॥ अर्थ—कृष्ण के साथ राधा शोभित है। कुन्ज-सदन में कुसुम की शय्या पर दम्पति की अत्यधिक शोभा है। आलस्य से भरे दोनो रस मग्न है, तथा एक-दूसरे के