भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 197

१८६ सूरसागर सार सटीक अंग की ओर देखते हैं। मानों गोरे और श्याम चन्द्रमा नवीन शरीर धारण कर सम्मुख बैठे हैं। सूरदास कहते हैं कि वे निर्निमेष नेत्रो से उन पर अपना तन मन न्योछावर कर डालती है ॥१२८॥ खण्डिता प्रकरण काहे कौं कहि-गए आइहैं, काहैं झूठी सौंहैं खाए । ऐसे मैं नहिं जाने तुमकौं, जे गुन करि तुम प्रकट दिखाए । भली करी यह दरसन दीन्हे, जनम जनम के ताप नसाए । तब चितए हरि नैंकु तिया-तन, इतनैहिं सब अपराध छमाए । सूरदास सुन्दरी सयानी, हँसि लीन्हे पिय अंकम लाए ॥१२६॥ अर्थ-क्यो कहा था कि आयेगे और क्यो झूठी सौगंध खाई थी । मैं तुम्हे ऐसा नही जानती थी, (मेरे लिए ये अपरिचित थे) जिन गुणो को तुमने प्रत्यक्ष दिखाया । अच्छा किया कि यह दर्शन दिया और जन्म-जन्म के ताप को नष्ट कर दिया । तब कृष्ण ने तनिक प्रिया की ओर देखा, इतने मे ही सब अपराधो की क्षमा मांग ली । सूरदास कहते है कि सुन्दर सयानी राधा ने हँसकर प्रिय को अंक में ले लिया ॥१२६॥ धीर धरहु फल पावहुगे । अपनेहीँ सुख के पिय चाँड़े, कबहुँ तौ बस आवहुगे । हम सौं कहत और की औरै, इन बातनि मन भावहुगे । कबहुँ राधिका मान करैगी, अन्तर बिरह जनावहुगे । तब चरित्र हमहीँ देखैंगी, जैसैँ नाच नचावहुगे । सूर स्याम अति चतुर कहावत, चतुराई बिसरावहुगे ॥१३०॥ अर्थ-धीरज धरो, फल पाओगे । अपने ही सुख से प्रज्वल लालसा वाले कभी तो वश मे आओगे । हमसे और का और कहते हो, इन्ही बातो से मन को अच्छे लगोगे । कभी राधा मान करेगी तथा विरह का अन्तर जताओगे । तब जैसा नाच नचाओगे उस चरित्र को हम ही देखेगी । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण तुम बहुत चतुर हो, उस समय चतुरता भुला दोगे ॥१३०॥ मैं हरि सौं हो मान कियौ री । आवत देखि आन बनिता-रत्त, द्वार कपाट दियौ री । अपनैं हीँ कर साँकर सारी, संधिहिँ सन्धि सियौ री । जौ देखौं तो सेज सुमूरति, काँप्यौ रिसनि हियौ री । जब झुकि चली भवन तैँ बाहरि, तब हठि लौटि लियौ री । कहा कहौँ कछु कहत न आवै, तहँ गोविंद बियौ री । विसरि गई सब रोष, हरष मन, पुनि फिरि मदन जियौ री । सूरदास प्रभु अति रति नागर, छलि मुख अमृत पियौ री ॥१३१॥