सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 198, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्थ—मैंने कृष्ण से मान किया। दूसरी स्त्री मे रत कृष्ण को आते देखकर द्वार के किवाड बन्द कर-दिये। अपने ही हाथ से सभी जंजीरों को तथा छिद्रों को बन्द कर दिया। पर जब देखती हूँ तो सेज पर सुन्दर मूर्ति वाले कृष्ण दिखाई दिये। क्रोध से मेरा हृदय काँप गया। जब क्रुद्ध होकर भवन से बाहर चली तब हठकर (अपने को) लोटा लिया। क्या कहूँ कुछ कहा नही जाता। वहाँ दूसरे गोविन्द थे। सब क्रोध भूल गयी, मन हर्षित हो गया। फिर काम की इच्छा जी गयी। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण रति क्रीडा मे अत्यधिक चतुर हैं, छलकर उन्होने सुख का अमृत पी लिया ॥१३१॥ नंद-नंदन सुखदायक हैं। नैन सैन दै हरत नारि मन, काम काम-तनु दायक हैं। कबहुँ रैनि बसत काहू कैं, कबहुँ भोर उठि आवत हैं। काहू कौ मन आपु चुरावत, काहू कैं मन भावत हैं। काहू कै जागत सगरी निसि, काहूँ बिरह जगावत हैं। सुनहु सूर जोइ जोइ मन भावै, सोइ सोइ रंग उपजावत हैं ॥१३२॥ अर्थ—कृष्ण सुख देने वाले है। नेत्रों का संकेत देकर स्त्रियो के मन को हर लेते हैं। कामातुर शरीर मे (और) इच्छा पैदा करते है। कभी (किसी के यहाँ) रात मे बसते है, कभी प्रातः उठकर आते है। किसी के मन को स्वयं चुराते है और किसी के मन को स्वयं भा जाते हैं। किसी (के साथ) सारी रात जागते हैं, किसी के विरह को जगा देते है। सूरदास कहते हैं कि जो मन को अच्छा लगता है वही रङ्ग उत्पन्न करते हैं ॥१३२॥ नाना रंग उपजावत स्याम । कोउ रीझति कोउ खीझति बाम ॥ काहू कैं निसि बसत बनाइ । काहू मुख छुवै आवत जाइ ॥ बहु नायक ह्वै बिलसत आपु । जाकौ सिव पावत नहिं जापु ॥ ताकौं ब्रजनारी पति जानैं । कोउ आदरैं, कोउ अपमानैं ॥ काहू सौं कहि आवन साँझ । रहत और नागरि घर माँझ ॥ कबहुँ रैन सब सग बिहात । सुनहु सूर ऐसे नँद-तात ॥१३३॥ अर्थ—कृष्ण अनेक रंग उत्पन्न करते हैं, जिससे कोई स्त्री प्रसन्न होती है और कोई खीझती है। किसी के यहां रात मे अच्छी तरह बसते हैं, आते-जाते किसी के मुख को छूते हैं। बहुत से नायक का रूप धर के आप विलास करते हैं। जिसे शिव तप करके नही पाते, उसे ब्रज की स्त्रियाँ पति रूप में जानती है। कोई (उनका) आदर करती है कोई अपमान करती है। सन्ध्या समय किसी से आने के लिए कह आते हैं और रहते है किसी और स्त्री के घर। कभी उनकी रात सबके साथ व्यतीत होती है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ऐसे ही हैं ॥१३३॥ अब जुवतिनि सौं प्रगटे स्याम । अरस-परस सबहिनि यह जानी, हरि लुब्धे सबहिनि कैं धाम ।