सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ सूरसागर सार सटीक जा दिन जाकै भवन न आवत, सो मन मैं यह करति विचार । आजु गए औरहिं काहू कैं, रिस पावति, कहि बड़े लवार । यह लीला हरि कैं मन भावत, खंडित वचन कहत सुख होत । साँझ बोल दै जात सूर-प्रभु, ताकैं आवत होत उदोत ॥१३४॥ अर्थ—अब युवतियों के साथ कृष्ण प्रकट हुए । मिल-जुल कर सब ने यह जाना कि कृष्ण सब ही के घर पर लुब्ध हैं । जिस दिन जिसके घर नही आते उस दिन वह मन में यही विचार करती है कि आज कृष्ण (किसी) और के घर गये है । (वह) क्रोधित होती है और कहती है कि वह बहुत धूर्त हैं। यह लीला कृष्ण के मन को अच्छी लगने वाली है । खंडित वचन कहने पर उन्हे सुख मिलता है । सूरदास कहते है कि सन्ध्या समय आने को कह जाते हैं पर आते-आते सबेरा हो जाता है ॥१३४॥ राधिका गेह हरि-देह-बासी । और तिय घरनि घर तनु-प्रकासी ॥ ब्रह्म पूरन द्वितीय नहिं कोऊ । राधिका सबै हरि सबै वोऊ ॥ दीप सौं दीप जैसैं उजारी । तैसैं हौ ब्रह्म घर-घर बिहारी ॥ खंडिता बचन हित यह उपाई । कबहुँ कहुँ जात, कहुँ नहिं कन्हाई ॥ जन्म कौ सुफल हरि यहै पावैं । नारि रस-वचन श्रवननि सुनावैं ॥ सूर-प्रभु अनतही मगन कीन्हौ । तहाँ नहिं गए जहाँ बचन दीन्हौ ॥१३५॥ अर्थ—राधिका का निवास-स्थान कृष्ण के शरीर मे स्थित उनका हृदय है, जबकि और गोपियां अपने शरीर के घर-घर को प्रकाशित करती हैं । ब्रह्म पूर्ण रूप से व्याप्त है, दूसरा कोई नही है । राधिका सब कुछ है वही कृष्ण की सब कुछ है । दीपक से जैसे दीपक जलाया जाता है, वैसे ही ब्रह्म घर-घर विहार करने वाला है । खंडित (खण्डिता नायिका के उपालम्भ) वचन (सुनने) के हित से कृष्ण (ऐसा) व्यवहार करते है कि कभी कही जाते हैं (कभी) कही नही जाते । जन्म की सफलता कृष्ण को इसी मे मिलती है कि स्त्रियां रस युक्त वचन कानो को सुनाये । सूरदास कहते हैं कि प्रभु ने अन्यत्र गमन किया, वहां नही गये जहां के लिए वचन दिया था ॥१३५॥ मध्यम मान स्याम पिया सन्मुख नहिं जोवत । कबहुँ नैन की कोर निहारत, कबहुँ बदन पुनि गोवत । मन-मन हँसत त्रसत तनु परगट, सुनत भावती बात । खंडित वचन सुनत प्यारी के, पुलक होत सब गात । यह सुख सूरदास कछु जानै, प्रभु अपने कौं भाव । श्री राधा रिस करति, निरखि मुख, तिहिं छवि पर ललचाव ॥१३६॥ अर्थ—कृष्ण प्रिया (राधा) के सम्मुख नही देखते । कभी नेत्रो की कोर को देखते है, कभी फिर मुख छिपाते है । मन-ही-मन हँसते हैं, शरीर प्रकट करने से डरते हैं । मन को अच्छी लगने वाली बात सुनते है । प्यारी (राधा) की खंडित वाणी