सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण १८४ सुनकर उनका समस्त शरीर पुलकित होता है। सूरदास प्रभु के भावों को अपनाकर यह सुख कुछ-कुछ जानते है। श्रीराधा क्रोध करती है, उस (क्रोधित मुख) की छवि (भक्त तथा कृष्ण को) ललचा देने वाली है ।।१३६।। नैन चपलता कहाँ गँवाई। मोसौँ कहा दुरावत नागर, नागरि रैन जगाई। ताही कैँ रँग अरुन भए हैं, धनि यह सुन्दरताई। मनौ अरुन अंबुज पर बैठे, मत्त भृंग रस पाई। उड़ि न सकत ऐसे मतवारे, लागत पलक जम्हाई। सुनहु सूर यह अंग माधुरी, आलस भरे कन्हाई ।।१३७।। अर्थ-नेत्रों की चंचलता कहाँ गँवा दी। नागर कृष्ण मुझसे क्यों छिपाते हो? रात में नागरि (अन्य स्त्री) ने (तुम्हें) जगाया है। उसी के रंग से (नेत्र) लाल हो गये हैं। यह सुन्दरता धन्य है। मानों लाल कमल पर बैठे मतवाले भ्रमर रस पी रहे हों। ऐसे मतवाले हो गये हैं कि उड़ नहीं सकते। पलकों में आलस (जम्हाई) लग रहा है। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) यह आलस भरे कृष्ण के अंग की मधुरिमा है ।।१३७।। यह कहि कै तिय धाम गई। रिसनि भरी नख-सिख लौँ प्यारी, जोबन-गर्व-भई। सखी चलीँ गृह देखि दसा यह, हठ करि बैठी जाइ। बोलति नहीं मान करि हरि सौँ, हरि अंतर रहे आइ। इहिँ अंतर जुवती सब आईं, जहाँ स्याम घर-द्वारैँ। प्रिया मान करि बैठि रही है, रिस करि क्रोध तुम्हारैँ। तुम आवत अतिहीँ झहरानी, कहा करी चतुराई। सुनत सूर यह बात चकित पिय, अतिहिँ गए मुरझाई ।।१३८।। अर्थ-यह कहकर प्रिया (राधा) घर गयी। यौवन गर्व से युक्त प्यारी नख से शिख तक क्रोध से भर गयी। सखियाँ इस दशा को देखकर अपने घर चलीं। राधा हठ करके बैठ गयी, कृष्ण से मान करके किसी से बोलती नहीं, इसी बीच कृष्ण आ गये। इसके बाद सभी युवतियाँ वहीं आईं (जहाँ) कृष्ण घर के द्वार पर खड़े थे। (फिर कहने लगी) प्रिया तुम्हारे ऊपर क्रोध कर मान करके बैठी है। तुम्हारे आते ही अत्यधिक झल्लाई, तुमने (इस समय) क्या चतुरता की। सूरदास कहते हैं यह सुनते ही चकित प्रिय कृष्ण अत्यधिक मुरझा गये ।।१३८।। नैंकु निकुंज कृपा करि आइये। अति रिस कृस ह्वै रही किसोरी, करि मनुहार मनाइयै। कर कपोल अन्तर नहिं पावत, अति उसास तन ताइयै। छूटे चिहुर बदन कुम्हिलानी, सुहथ संवारि बनाइयै।