सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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इतनी कहा गाँठि कौ लागत, जी बातनि सुख पाइयै । रूठेहिं आदर देत सयाने, यहै सूर जस गाइयै ॥१३६॥ अर्थ—कृपा करके तनिक निकुंज मे आइये । अत्यधिक क्रोध से किशोरी (राधा) दुर्बल हो रही है, उसे विनय पूर्वक मान लीजिए । हाथ और कपोल दोनों का- अन्तर नही होता (अर्थात् हाथ पर कपोल रखे रहती है), अत्यधिक उच्छ्वास से शरीर को तपाती है । अपने सुन्दर हाथों से सँवारे उसके बाल छूट गये है, मुख कुम्हला गया है । जो बातों से ही सुख पाया जा सकता है, तो इसमे गाँठ का क्या लगता है अर्थात् क्या खर्च होता है । रूठे हुए व्यक्ति को सज्जन (श्रेष्ठ लोग) आदर देते हैं । सूरदास इसका यश गाते है ॥१३८॥ बैठि मानिनी गहि मौन । मनौ सिद्ध समाधि सेवत, सुरनि साधे पौन । अचल आसन, पलक तारी, गुफा घूँघट-भौन । रोषही कौ ध्यान धारै, टेक टारै कौन । अबहिँ जाइ मनाइ लीजै, अबसि कीजै गौन । सूर के प्रभु जाइ देखौ, चित्त चौंधी जोन ॥१४०॥ अर्थ—मानिनी मौन धारण करके बैठी है । मानो सिद्ध समाधि का सेवन कर रही है और देवता प्राण वायु सिद्ध (अवरुद्ध) किए हुए हैं । वह अचल आसन पर बैठी है, पलक को लगातार रोके है (ध्यान लगाये है) । घूंघट के बीच का स्थान गुफा के समान है । क्रोध पर ही ध्यान धारण किये हुए है, उसे हठ करके कौन टाल सकता है । अभी जाकर उसे मना लीजिए । (उसके पास) अवश्य गमन कीजिए । सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती है) कृष्ण जाकर उस चिन्ता से तिलमिलायी (राधा) को अवश्य देखो ॥१४०॥ स्यामा तू अति स्यामहिं भावै । बैठत-उठत, चलत, गौ चारत, तेरौ लीला गावै । पीत बरन लखि पीत बसन उर, पीत धातु अंग लावै । चन्द्राननि सुनि, मोर चन्द्रिका, माथैँ मुकुट बनावै । अति अनुरागि सैनि संभ्रम मिलि, संग परम सुख पावै । बिछुरत तोहिँ क्वासि राधा कहि, कुज-कुंज प्रति धावै । तेरी चित्र लिखैँ, अरु निरखैँ, बासर-बिरह नसावै । सूरदास रस-रासि-रसिक सौं, अन्तर क्यौँ करि आवै ॥१४१॥ अर्थ—श्यामा (राधा) तू कृष्ण को अत्यधिक प्रिय है । बैठते, उठते, चलते, गाय चराते तुम्हारी ही लीला गाते है । (तुम्हारे) पीले रंग को (शरीर को) देखकर पीताम्बर हृदय से लगाते है, तथा पीली धातु का (शरीर पर) लेप करते है । (तुझे) चन्द्रमा के समान मुख वाली जानकर मोर चन्द्रिका से मस्तक का मुकुट बनाते हैं ।