भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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अत्यधिक अनुराग पूर्ण इशारे तथा संभ्रम से मिलकर साथ में परम सुख प्राप्त करते हैं। तुमसे बिछुड़ते ही 'राधा कहां हो' कहकर कुंज-कुंज में दौड़ते हैं। तेरा चित्र बनाते है और देखते हैं, इस प्रकार दिवस का विरह दूर करते हैं। सूरदास कहते है कि रस की राशि कृष्ण से भेद-भाव क्यों करती हो ॥१५४१॥ राधे हरि तेरौ नाम विचारैँ। तुम्हरेइ गुन ग्रन्थित करि माला, रसनाकर सौँ टारैँ। लोचन-मूँदि ध्यान धरि, दृढ़ करि, पलकन नैंकु उघारैँ। अंग अंग प्रति रूप माधुरी, उर तैँ नहीँ बिसारैँ। ऐसो नेम तिहारे पिय कैँ, कह जिय निठुर तिहारैँ। सूर स्याम मनकाम पुरावहु, उठि चलि कहैँ हमारैँ ॥१५४२॥ अर्थ-हे राधा कृष्ण तेरे नाम का ही विचार करते रहते है। तुम्हारे गुणो की माला गूंथकर वाणी रूपी हाथ से घुमाते रहते हैं। आंख मूंदकर, दृढ़ करके पलको को तनिक भी नहीं उघाड़ते। अंग-अंग के रूप माधुर्य को तनिक भी हृदय से विस्मृत नही होने देते। तुम्हारे प्रिय का ऐसा नियम है, और दूसरी ओर तुम्हारा मन कितना कठोर है। सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती है) कृष्ण की मनोकामना पूर्ण करो और हमारे कहने से उठ कर चलो ॥१५४२॥ कहा तुम इतनैँहि कौँ गरबानी। जीवन रूप दिवस दसही कौ, जल अँजुरी कौ जानी। तृन की अगिनि, धूम कौ मदिर, ज्यौँ तुषार-कन-पानी। रिसहीँ जरति पतंग ज्योति ज्यौँ, जानत लाभ न हानी। नरि कछु ज्ञानऽभिमान जाव दै, हैऽब कौन मति ठानी। तन धन जानि जाम जुग छाया, भूलति कहा अयानी। नवसै नदी चलति मरजादा, सुधियै सिन्धु समानी। सूर इतर ऊसर के बरषैँ, थोरैँहि जल इतरानी ॥१५४३॥ अर्थ-इतने ही पर तुम क्यों गर्वित हो गयी हो। यह जीवन का सौंदर्य केवल दस ही दिन (कुछ ही समय) के लिए है। यह अँजुली के जल के समान है। (यह) तृण की आग, धुएं के मन्दिर तथा तुषारकण के पानी (की तरह क्षणिक है)। क्रोध से पतंग जैसे ज्योति (आग) मे जल जाता है, वह लाभ हानि नही जान पाता। (अतः) कुछ समझ-बूझ कर अभिमान छोड़ दे। अब कौन-सी बुद्धि ठान ली है। शरीर और धन को दो घड़ी की छाया समझो। अज्ञानी इसे क्यों भूलती हो। समतल पर प्रवाहित नदियां मर्यादा से चलकर सीधे समुद्र में समा जाती हैं। सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती है) अन्यथा ऊसर मे बरसने पर थोड़े ही जल से नदियां इतरा जाती हैं ॥१५४३॥