भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

२०६ सूरसागर सार सटीक माधौ तहाँ बुलाई राधे, जमुना निकट सुसीतल छहियाँ । आछी नीकी कुसुँभी सारी, गोरैं तन चलि हरि पिय पहियाँ । दूती एक गई मोहिनि पै, जाइ कह्यौ यह प्यारी कहियाँ । सूरदास सुनि चतुर राधिका, स्याम रैनि वृन्दावन महियाँ ॥१५५॥ अर्थ—कृष्ण ने राधा को यमुना के किनारे वहीं बुलाया जहाँ शीतल छाया थी । तुम अच्छी, कुसुंभी रंग की साड़ी पहनकर कृष्ण के पास चलो । एक दूती ने राधा के पास जाकर यही बात कही । सूरदास कहते हैं कि चतुर राधिका ने सुनकर (जान लिया) कृष्ण रात मे वृन्दावन मे हैं ॥१५५॥ झूँमक सारी तन गोरैं हो । जगमग रह्यौ जराइ कौ टीकौ, छवि की उठतिँ झकोरैं हो । रत्न जटिल कै सुभग तरचौना, मनहुँ जात रवि भोरैं हो । दुलरी कंठ निरखि पिय इक टक, दृग भए रहैं चकोरैं हो । सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन कौं, रीझि-रीझि तृन तोरैं हो ॥१५६॥ अर्थ—झब्बेदार साड़ी गोरे शरीर पर (शोभित) है । जड़े हुए टीके जगमगा रहे है, छवि का झकोरा उठ रहा है । रत्न से जड़ा हुआ सुन्दर तरौना मानो प्रातः काल का सूर्य हो । दो-लड़ी की माला कंठ पर देखकर कृष्ण की आंखे चकोर की तरह हो गयी हैं । सूरदास कहते है कि तुम्हारे (राधा के) मिलन के लिए कृष्ण रीझ-रीझकर (मगल कामना से कि कही नजर न लग जाय) तृण तोड़ते है ॥१५६॥ राधिका बस्य करि स्याम पाए । विरह गयौ दूरि, जिय हरष हरि कै भयौ, सहस मुख निगम जिहिं नेति गाए । मान तजि मानिनी मैन कौ वल हरच्यौ, करत तनु कंत जो त्रास भारी । कोक विद्या निपुन, स्याम स्यामा बिपुल, कुंज-गृह द्वार ठाढे मुरारी । भक्त-हित-हेत अवतारि लीला करत, रहत प्रभु तहाँ निजु ध्यान जाकैं । प्रगट प्रभु सूर ब्रजनारि कैं हित बँधे, देत मन-काम-फल सग ताकैं ॥१५७॥ अर्थ—कृष्ण ने राधा को वश मे कर लिया । विरह दूर चला गया मन में हर्ष हुआ । ये वे ही कृष्ण हैं जिन्हे सहस्रों मुख से निगम नेति-नेति कहकर गाते हैं । मान त्यागकर मानिनी (राधा) ने कामदेव के बल को हर लिया जो कृष्ण के शरीर को त्रसित कर रहा था । काम-कला मे निपुण कृष्ण और राधा बार-बार (मिलते हैं) । कृष्ण कुंज-गृह के द्वार पर खड़े है। भक्तो के हित के लिए जो अवतार लेकर लीला करते हैं,