सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंओर उन्ही का प्रभु ध्यान रखते हैं। सूरदास कहते हैं वही कृष्ण व्रजनारियों के हित से बँधकर, उनके साथ उन्हें विभिन्न मनोवांछित फल दे रहे हैं ॥१५७॥ वसंतोत्सव झूलत स्याम स्यामा संग। निरखि दंपति अंग सोभा, लजत कोटि अनंग । मंद त्रिविध समीर सीतल, अंग अंग मुगंध । मचत उड़त सुवास संग, मन रहे मधुकर बंध । तैसियै जमुना सुभग जहं, रच्यौ रंग हिडोल । तैसियै वृज-वधू वनि, हरि चितै लोचन कोर । तैसोई वृन्दा-विपिन-घन-कुंज-द्वार-बिहार । बिपुल गोपी, विपुल वन गृह, रवन नंदकुमार । नित्य लीला, नित्य आनंद, नित्य मंगल गान्ह । सूर सुर-मुनि मुखनि अस्तुति, धन्य गोपी कान्ह ॥१५८॥ अर्थ- कृष्ण प्रिया के साथ झूलते हैं। दम्पति के अंगो की शोभा देखकर हजार कामदेव लज्जित होते हैं। अंग-अंग को सुगन्धित करने वाली मन्द शीतल त्रिविध समीर (वायु) चल रही है। साथ में सुगन्धित पराग उड़ रहा है जिस पर मन रूपी भ्रमर मुग्ध हो गया है। वैसे ही यहाँ सुन्दर यमुना तट पर हिंडोला झूलने की क्रीड़ा रचायौ गयी है। वैसे ही ब्रज की वधुएँ सज-धजकर कृष्ण की ओर तिरछे नेत्रों से देखती है, वैसे ही वृन्दावन के कुन्जो के द्वारों का विहार है। बहुत सी गोपियां, विशाल वन-गृह तथा रमण करने वाले कृष्ण है। (वहाँ) नित्य लीला, नित्य आनन्द तथा नित्य मंगल- गान होता है। सूरदास कहते है कि देवता तथा मुनियो के मुख में नित्य स्तुति रहती है कि गोपी तथा कृष्ण धन्य हो ॥१५८॥ नित्य धाम वृन्दावन स्याम। नित्य रूप राधा ब्रज-वाम ॥ नित्य रास, जल नित्य बिहार। नित्य मान, खंडिताऽभिसार ॥ ब्रह्म-रूप येई करतार। करन हरन त्रिभुवन येइ सार ॥ नित्य कुंज-सुख नित्य हिंडोर। नित्यहिं त्रिविध-समीर झकोर ॥ सदा बसंत रहत जहां वास। सदा हर्ष, जहँ नहीं उदास ॥ कोकिल कीर सदा तहँ रोर। सदा रूप मन्मथ चितचोर ॥ विविध सुमन वन फूले डार। उन्मत मधुकर भ्रमर अपार ॥ नव पल्लव वन सोभा एक। विहरत हरि संग सखी अनेक ॥ कुहू कुहू कोकिला सुनाई। सुनि सुनि नारि परम हरपाईं ॥ वार वार सो हरिहिं सुनावतिं । ऋतु वसंत आयौ समुझावतिं ॥ फाग-चरित रस साध हमारैं। खेलहिं सब मिलि संग तुम्हारैं ॥ सुनि सुनि सूर स्याम मुसुकाने। ऋतु वसंत आयौ हरषाने ॥१५६॥