सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ सूरसागर सार सटीक अर्थ—वृन्दावन का धाम तथा कृष्ण नित्य हैं। ब्रज की स्त्रियां तथा राधा का रूप नित्य है। रास, जल विहार, मान, खंडित (नायिका), अभिसार सब नित्य हैं। ब्रह्मा रूप में ये ही कर्त्ता हैं, कर्त्ता और हर्त्ता यही त्रिभुवन के सार हैं। कुन्ज का सुख तथा हिंडोला क्रीड़ा नित्य हैं। त्रिविधि समीर का झकोरा शाश्वत है। जहां सदा वसंत रहता है, सदा हर्ष रहता है, जहां उदासी नहीं है। वहाँ कोयला तथा तोते का शब्द सदैव गूंजता रहता है, चित्तचोर कामदेव तथा रूप सदा रहते हैं। वन की डालो में रंग रंग के फूल फूलते हैं और बहुत से भ्रमर मस्त होकर घूमते रहते हैं। नव पल्लवो की एक ही शोभा रहती है और कृष्ण के साथ अनेक सखियां विहार करती रहती हैं। कोकिल ने कू-कू का शब्द सुनाया, सुन-सुनकर स्त्रियां परम हर्षित हुईं। बार-बार वे कृष्ण को सुनाती है और समझती हैं कि वसन्त ऋतु आ गयी। हमारे मन मे फाग चरित की साध है कि हम सब मिलकर तुम्हारे साथ खेले। सूरदास कहते हैं कि सुन- सुनकर कृष्ण मुस्कराये, वे वसन्त ऋतु (आया हुआ जानकर) हर्षित हुए ॥१५८॥ पिय प्यारी खेलैँ जमुन तीर। भरि केसरि कुमकुम अरु अबीर ॥ घसि मृगमद चंदन अरु गुलाल। रंग भीने अरगज वस्त्र माल ॥ कूजत कोकिल कल हंस मोर। ललितादिक स्यामा एक ओर ॥ वृन्दादिक मोहन लई जोर। बाजै ताल मृदंग रवाब घोर ॥ प्रभु हँसि कै गेंदुक दइ चलाइ। मुख पट दै राधा गइ बचाइ ॥ ललिता पट-मोहन गह्यौ धाइ। पीताबर मुरली लइ छिंडाइ ॥ हौं सपथ करौं छोड़ौं न तोहिं। स्यामा जू आज्ञा दई मोहिं ॥ इक निज सहचरि आई बसीठि। सुनी री ललिता तू भई ढीठि ॥ पट छोड़ि दियौ तब नव किसोर। छवि रीझि सूर तृन दियौ तोर ॥१६०॥ अर्थ—प्रिय और प्यारी यमुना के किनारे कुमकुम केसर और अबीर भरकर खेलते हैं। मृग के मद, गुलाल और चन्दन का लेप किये हुए है तथा अंगराग के रंग से भीगे है तथा वस्त्र और माला (पहने हैं)। कोयल, हंस तथा मोर कूंज रहे हैं। ललिता आदि कृष्ण की प्रेमिकाएँ एक ओर हैं। वृन्दादि ने कृष्ण को जोर से ले (पकड) लिया। मृदंग, रवाब (सारंगी) की घोर आवाज हो रही है। कृष्ण ने हँसकर गेंद चला दी, मुख पर (घूंघट) कपड़ा देकर राधा ने अपना मुख बचा लिया। ललिता ने दौड़कर मोहन के वस्त्र को पकड़ लिया, उसने पीतांबर तथा मुरली छीन ली। मैं शपथ करती हूँ कि तुम्हे छोड़ूंगी नही, क्योकि राधा ने मुझे आज्ञा दी है। इतने मे एक सहचरी दूतो आ गयी और बोली कि सुना है ललिता तू ढीठ हो गयी है। तब ललित ने कृष्ण के वस्त्र छोड़ दिया और रीझकर भक्त सूर ने तृण तोड़ दिया ॥१६०॥ तेरैं आवैंगे आजु सखी हरि, खेलन कौं फाग (री)। सगुन संदेसौ हौं सुन्यौँ, तेरैं आँगन बोलै काग (री)।