सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
ओर उन्ही का प्रभु ध्यान रखते हैं। सूरदास कहते हैं वही कृष्ण व्रजनारियों के हित से बँधकर, उनके साथ उन्हें विभिन्न मनोवांछित फल दे रहे हैं ॥१५७॥ वसंतोत्सव झूलत स्याम स्यामा संग। निरखि दंपति अंग सोभा, लजत कोटि अनंग । मंद त्रिविध समीर सीतल, अंग अंग मुगंध । मचत उड़त सुवास संग, मन रहे मधुकर बंध । तैसियै जमुना सुभग जहं, रच्यौ रंग हिडोल । तैसियै वृज-वधू वनि, हरि चितै लोचन कोर । तैसोई वृन्दा-विपिन-घन-कुंज-द्वार-बिहार । बिपुल गोपी, विपुल वन गृह, रवन नंदकुमार । नित्य लीला, नित्य आनंद, नित्य मंगल गान्ह । सूर सुर-मुनि मुखनि अस्तुति, धन्य गोपी कान्ह ॥१५८॥ अर्थ- कृष्ण प्रिया के साथ झूलते हैं। दम्पति के अंगो की शोभा देखकर हजार कामदेव लज्जित होते हैं। अंग-अंग को सुगन्धित करने वाली मन्द शीतल त्रिविध समीर (वायु) चल रही है। साथ में सुगन्धित पराग उड़ रहा है जिस पर मन रूपी भ्रमर मुग्ध हो गया है। वैसे ही यहाँ सुन्दर यमुना तट पर हिंडोला झूलने की क्रीड़ा रचायौ गयी है। वैसे ही ब्रज की वधुएँ सज-धजकर कृष्ण की ओर तिरछे नेत्रों से देखती है, वैसे ही वृन्दावन के कुन्जो के द्वारों का विहार है। बहुत सी गोपियां, विशाल वन-गृह तथा रमण करने वाले कृष्ण है। (वहाँ) नित्य लीला, नित्य आनन्द तथा नित्य मंगल- गान होता है। सूरदास कहते है कि देवता तथा मुनियो के मुख में नित्य स्तुति रहती है कि गोपी तथा कृष्ण धन्य हो ॥१५८॥ नित्य धाम वृन्दावन स्याम। नित्य रूप राधा ब्रज-वाम ॥ नित्य रास, जल नित्य बिहार। नित्य मान, खंडिताऽभिसार ॥ ब्रह्म-रूप येई करतार। करन हरन त्रिभुवन येइ सार ॥ नित्य कुंज-सुख नित्य हिंडोर। नित्यहिं त्रिविध-समीर झकोर ॥ सदा बसंत रहत जहां वास। सदा हर्ष, जहँ नहीं उदास ॥ कोकिल कीर सदा तहँ रोर। सदा रूप मन्मथ चितचोर ॥ विविध सुमन वन फूले डार। उन्मत मधुकर भ्रमर अपार ॥ नव पल्लव वन सोभा एक। विहरत हरि संग सखी अनेक ॥ कुहू कुहू कोकिला सुनाई। सुनि सुनि नारि परम हरपाईं ॥ वार वार सो हरिहिं सुनावतिं । ऋतु वसंत आयौ समुझावतिं ॥ फाग-चरित रस साध हमारैं। खेलहिं सब मिलि संग तुम्हारैं ॥ सुनि सुनि सूर स्याम मुसुकाने। ऋतु वसंत आयौ हरषाने ॥१५६॥
२०८ सूरसागर सार सटीक अर्थ—वृन्दावन का धाम तथा कृष्ण नित्य हैं। ब्रज की स्त्रियां तथा राधा का रूप नित्य है। रास, जल विहार, मान, खंडित (नायिका), अभिसार सब नित्य हैं। ब्रह्मा रूप में ये ही कर्त्ता हैं, कर्त्ता और हर्त्ता यही त्रिभुवन के सार हैं। कुन्ज का सुख तथा हिंडोला क्रीड़ा नित्य हैं। त्रिविधि समीर का झकोरा शाश्वत है। जहां सदा वसंत रहता है, सदा हर्ष रहता है, जहां उदासी नहीं है। वहाँ कोयला तथा तोते का शब्द सदैव गूंजता रहता है, चित्तचोर कामदेव तथा रूप सदा रहते हैं। वन की डालो में रंग रंग के फूल फूलते हैं और बहुत से भ्रमर मस्त होकर घूमते रहते हैं। नव पल्लवो की एक ही शोभा रहती है और कृष्ण के साथ अनेक सखियां विहार करती रहती हैं। कोकिल ने कू-कू का शब्द सुनाया, सुन-सुनकर स्त्रियां परम हर्षित हुईं। बार-बार वे कृष्ण को सुनाती है और समझती हैं कि वसन्त ऋतु आ गयी। हमारे मन मे फाग चरित की साध है कि हम सब मिलकर तुम्हारे साथ खेले। सूरदास कहते हैं कि सुन- सुनकर कृष्ण मुस्कराये, वे वसन्त ऋतु (आया हुआ जानकर) हर्षित हुए ॥१५८॥ पिय प्यारी खेलैँ जमुन तीर। भरि केसरि कुमकुम अरु अबीर ॥ घसि मृगमद चंदन अरु गुलाल। रंग भीने अरगज वस्त्र माल ॥ कूजत कोकिल कल हंस मोर। ललितादिक स्यामा एक ओर ॥ वृन्दादिक मोहन लई जोर। बाजै ताल मृदंग रवाब घोर ॥ प्रभु हँसि कै गेंदुक दइ चलाइ। मुख पट दै राधा गइ बचाइ ॥ ललिता पट-मोहन गह्यौ धाइ। पीताबर मुरली लइ छिंडाइ ॥ हौं सपथ करौं छोड़ौं न तोहिं। स्यामा जू आज्ञा दई मोहिं ॥ इक निज सहचरि आई बसीठि। सुनी री ललिता तू भई ढीठि ॥ पट छोड़ि दियौ तब नव किसोर। छवि रीझि सूर तृन दियौ तोर ॥१६०॥ अर्थ—प्रिय और प्यारी यमुना के किनारे कुमकुम केसर और अबीर भरकर खेलते हैं। मृग के मद, गुलाल और चन्दन का लेप किये हुए है तथा अंगराग के रंग से भीगे है तथा वस्त्र और माला (पहने हैं)। कोयल, हंस तथा मोर कूंज रहे हैं। ललिता आदि कृष्ण की प्रेमिकाएँ एक ओर हैं। वृन्दादि ने कृष्ण को जोर से ले (पकड) लिया। मृदंग, रवाब (सारंगी) की घोर आवाज हो रही है। कृष्ण ने हँसकर गेंद चला दी, मुख पर (घूंघट) कपड़ा देकर राधा ने अपना मुख बचा लिया। ललिता ने दौड़कर मोहन के वस्त्र को पकड़ लिया, उसने पीतांबर तथा मुरली छीन ली। मैं शपथ करती हूँ कि तुम्हे छोड़ूंगी नही, क्योकि राधा ने मुझे आज्ञा दी है। इतने मे एक सहचरी दूतो आ गयी और बोली कि सुना है ललिता तू ढीठ हो गयी है। तब ललित ने कृष्ण के वस्त्र छोड़ दिया और रीझकर भक्त सूर ने तृण तोड़ दिया ॥१६०॥ तेरैं आवैंगे आजु सखी हरि, खेलन कौं फाग (री)। सगुन संदेसौ हौं सुन्यौँ, तेरैं आँगन बोलै काग (री)।
राधाकृष्ण २०६ मदनमोहन तेरैं बस माई, सुनि राधे बड़भाग (री)। बाजत ताल मृदंग झांझ डफ, का सोवै, उठि जाग (री)। चोवा चंदन लै कुमकुम अरु, केसरि पैयाँ लाग (री)। सूरदास-प्रभु तुम्हारे दरस कौं, राधा अचल सुहाग (री) ॥१६१॥ अर्थ—आज सखी तुम्हारे यहां कृष्ण फाग खेलने आयेगे। मैंने सगुन का संदेशा सुना है। देखो तुम्हारे आंगन में कौवा बोल रहा है। मदनमोहन तुम्हारे वश में हैं, बड़भागिनी राधा सुनो। मृदङ्ग, झांझ, डफ की ताल बज रही है, तुम क्यों सोती हो, उठो, जागो। चोवा, चन्दन, कुमकुम तथा केसर लेकर उनके पैरों को छुओ। सूरदास कहते हैं कृष्ण तुम्हारे दर्शन को पाने के लिए व्याकुल हैं। राधा अचल सुहागवती हो ॥१६१॥ हरि संग खेलति हैं सब फाग। इहिं मिस करति प्रगट गोपी, उर-अंतर कौ अनुराग। सारी पहिरि सुरंग, कसि कंचुकि, काजर दै दै नैन। बनि बनि निकसि-निकसि भईं ठाढ़ी, सुनि माधौ के बैन। डफ, बाँसुरी रुंज अरु महुअरि, बाजत ताल मृदंग। अति आनंद मनोहर बानी, गावत उठति तरंग। एक कोध गोविंद ग्वाल सब, एक कोध ब्रज-नारि। छाँड़ि सकुच सब देति परस्पर, अपनी भाई गारि। मिलि दस पाँच अली कृष्णहिँ, गहि लावर्तिँ अचकाइ। भरि अरगजा अबीर कनक-घट, देति सीस तैं नाइ। छिरकतिँ सखी कुमकुमा केसरि, भुरकतिँ बंदन धूरि। सोभित है तनु साँझ-समै-घन, आए हैं मनु पूरि। दसहूँ दिसा भयौ परिपूरन, सूर सुरंग प्रमोद। सुर-बिमान कौतूहल भूले, निरखत स्याम-विनोद ॥१६२॥ अर्थ-कृष्ण के साथ सब गोपियां फाग खेलती है। इसी के बहाने सब गोपियां हृदय के अनुराग को प्रकट करती हैं। अच्छे रंग की साड़ी पहनकर, चोली कसकर तथा नेत्रो में काजल दे-देकर सजधज कर, कृष्ण की वाणी सुनकर निकल पडी। डफ, बांसुरी, रुंज, मधुकर, मृदंग का ताल बज रहा है। अत्यधिक आनंद तथा मनोहर वाणी से गाये जाते हुए गीतों की तरंग उठ रही है। एक ओर गोविन्द तथा सभी ग्वाल है तथा एक ओर ब्रज की स्त्रियां हैं। सभी संकोच छोड़कर परस्पर अपने मन को अच्छी लगने वाली गाली दे रहे हैं। दस-पांच सखियां मिलकर कृष्ण को अचानक पकड़ लाती हैं। सोने के घड़े मे अंगराज तथा अबीर भरकर सिर से डाल देती हैं। सखियां कुमकुम, केसर तथा सिंदूर की धूल झोंकती है। शरीर ऐसे शोभित हैं, मानो सन्ध्या के समय १४
२१० सूरसागर सार सटीक आकाश मे बादल फैल गये हो । सूरदास कहते हैं सुन्दर रंग दशों दिशाओ मे परिपूर्ण हो गया । देवतागण विमान मे विस्मृत हो कृष्ण के विनोद को देखते हैं ॥१६२॥ नंद नंदन बृषभानु किसोरी, मोहन राधा खेलत होरी । श्रीवृन्दावन अतिहिं उजागर, वरद बरन नव दंपति भोरी । एकनि कर है अगरु कुमकुमा, एकनि कर केसरि लै घोरी । एक अर्थ सौं भाव दिखावति, नाचति तरुनि बाल वृध भोरी । स्यामा उतहिं सकल ब्रज-वनिता, इतहिं स्याम रस रूप लहौ री । कंचन की पिचकारी छूटति, छिरकत ज्यौं सचुपावैं गोरी । अतिहिं ग्वाल दधि गोरस माते, गारी देत कहौ न करौ री । करत दुहाई नंदराइ की, लै जु गयौ कल बल छल जोरी । झुंडनि जोरि रही चंद्रावलि, गोकुल मैं कछु खेल मच्यौ री । सूरदास-प्रभु फगुआ दीजै, चिरजीवौ राधा वर जोरी ॥१६३॥ अर्थ-कृष्ण तथा राधा होली खेलते हैं। वृन्दावन अत्यधिक प्रकाशित (चहल- पहलमय) है। रंग-रंग के नवीन दम्पति विभोर खड़े हैं। एक (के) हाथ मे अगरु और कुमकुम है, तो एक हाथ मे लेकर केसर घोलता है। (सब) एक ही तरह का भाव दिखाते हैं। बाल, वृद्ध तथा तरुण सभी विभोर होकर नाचते हैं। उधर राधा तथा समस्त ब्रजवनिंताये हैं, इधर कृष्ण रूप लाभ कर रहे हैं। सोने की पिचकारी छूट रही है, छिरकने पर सखियां सुखी होती हैं। ग्वाल अत्यधिक दूध तथा दही से मस्त हैं, गाली देते हुए कहना नही करते। नंदराय (कृष्ण) की दुहाई देते हैं जो उपाय, बल तथा छल से जोड़ी लेकर चले। चन्द्रावली आदि झुण्ड बनाकर बोली कि गोकुल मे कुछ खेल मचा है। सूरदास कहते हैं (चन्द्रावली कहती है) प्रभु अब फगुआ (इनाम) दीजिये, राधा की श्रेष्ठ जोड़ी अनन्त काल तक जिये ॥१६३॥ गोकुलनाथ विराजत डोल । संग लिये वृषभानु-नंदिनी, पहिरे नील निचोल । कंचन खचित लालमनि मोती, हीरा जटित अमोल । झुलवहिँ जूथ मिलै ब्रजसुंदरि, हरषित करतिं कलोल । खेलतिँ, हँसतिँ परस्पर गावर्ति, बोलतिँ मीठे बोल । सूरदास स्वामी, पिय-प्यारी, झूलत हैं झकझोल ॥१६४॥ अर्थ - कृष्ण झूले पर शोभित है। नीले रंग की ओढनी पहने हुए राधा को साथ लिये हुए है। (राधा) सोने से खचित लाल मणि, मोती तथा हीरे से जड़ा अमूल्य हार पहने है। ब्रज की सुन्दरियां मिलकर उन्हे झुलाती हैं तथा हर्षित होकर कल्लोल करती हैं। खेलती हैं, हँसती हैं तथा परस्पर मीठी बोली बोलती है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण और प्यारी राधा झूले पर झोके के साथ झूलते हैं ॥१६४॥
मथुरा गमन अक्रूर ब्रज आगमन कंस नृपति अक्रूर बुलाये । बैठि इकंत मंत्र दृढ़ कीन्हौ, दोऊ बंधु मंगाये । कहूँ मल्ल, कहूँ गज दै राखे, कहूँ धनुष कहूँ वीर । नंद महर के बालक मेरैं, करषत रहत सरीर । उनहिं बुलाइ बीच ही मारौं, नगर न आवन पावैं । सूर सुनत अक्रूर कहत, नृप मन-मन मौज बढ़ावैं ॥१॥ अर्थ – राजा कंस ने अक्रूर को बुलाया। एकांत मे बैठकर दृढ़ मंत्रणा करके दोनों भाइयो (कृष्ण और बलराम) को मँगाया। कही पर मल्ल (योद्धा), कही हाथी, कही धनुष तथा कही वीरो को तैनात करके रखा। (कंस ने कहा) नंद महर के पुत्र मेरे शरीर में चुभते रहते हैं; उन्हे बुलाकर बीच मे ही मार डालूँ, नगर तक आने ही न पावें। सूरदास कहते हैं कि अक्रूर कंस की बातों को सुनते हैं तथा राजा कंस कहते हुए मन-ही-मन आनन्द बढ़ाते हैं ॥१॥ उत नंदहिं सपनौ भयौ, हरि कहूँ हिराने । बल-मोहन कोउ लै गयौ, सुनि कै बिलखाने । ग्वाल सखा रोवत कहैं, हरि तौ कहूँ नाहीँ । संगहि संग खेलत रहे, यह कहि पछिताहीं । दूत एक सँग लै गयौ, बलराम कन्हाई । कहा ठगौरी सी करी, मोहिनी लगाई । वाही के दोउ ह्वै गए, हम देखत ठाढ़े । सूरज प्रभु वै निठुर ह्वै, अतिहीं गए गाढ़े ॥२॥ अर्थ – उधर (मथुरा मे) नन्द को स्वप्न हुआ कि कृष्ण कही खो गये। बलराम और मोहन को कोई ले गया यह सुनकर (सब) बिलखने लगे। ग्वाल सखा रोते हुए कहते हैं कि कृष्ण तो कहीं नहीं हैं। (हम) साथ-साथ खेलते रहे यह कह कहकर पछताते हैं। बलराम और कृष्ण को कोई दूत साथ ले गया। मोहनी लगाकर पता नही क्या जादू सा कर दिया कि दोनों उसी के हो गये, हम खड़े देखते रहे। सूरदास कहते हैं कि (ग्वाल कहते हैं) वे कृष्ण निष्ठुर होकर अत्यधिक कष्ट देकर चले गये ॥२॥ सुफलक-सुत हरि दरसन पायौ । रहि न सक्यौ रथ पर सुख-व्याकुल, भयौ वहै मन भायौ ।
२१२ सूरसागर सार सटीक भू पर दौरि निकट हरि आयौ, चरननि चित्त लगायौ । पुलक अंग, लोचन जल-धारा, श्रीपद सिर परसायौ । कृपासिंधु करि कृपा मिले हँसि, लियौ भक्त उर लाइ । सूरदास यह सुख सोइ जानै, कहौँ कहा मैं गाइ ॥३॥ अर्थ—सुफलक पुत्र (अक्रूर) ने कृष्ण का दर्शन पाया । सुख से व्याकुल होकर रथ पर (बैठे) नही रह सके, वही मन को भाने वाली (बात) हुई । पृथ्वी पर दौड़कर कृष्ण के निकट आये और चरणों मे चित्त लगाया । पुलकित अंगो तथा आंख मे आंसू भरकर श्रीचरणो मे सिर को स्पर्श कराया । कृपासिंधु कृपा करके हंसकर मिले और भक्त को हृदय से लगा लिया । सूरदास कहते हैं कि इस सुख को वही (अक्रूर) जान सकते हैं, मैं उसे गाकर क्या कहूँ ॥३॥ चलन चलन स्याम कहत, लैन कोउ आयौ । नंद-भवन भनक सुनी, कंस कहि पठायौ । ब्रज की नारि गृह बिसारि, ब्याकुल उठि धाईँ । समाचार बूझन कौँ, आतुर ह्वै आईं । प्रीति जानि, हेत मानि, बिलखि बदन ठाढीँ । मानहु वै अति विचित्र, चित्र लिखी काढीँ । ऐसी गति ठौर-ठौर, कहत न बनि आवै । सूर स्याम बिछुरैँ, दुख-बिरह काहि भावै ॥४॥ अर्थ—कोई सखी किसी सखी से कह रही है कि हे सखी, कृष्ण बारम्बार जाने की बात कह रहे है और उन्हे लेने के लिए मथुरा से कोई आया है । नन्द के घर मे यह भनक पहुँची कि कंस ने कहकर भेजा है। ब्रज की स्त्रियां घर भुलाकर व्याकुल होकर दौड पड़ी । समाचार जानने के लिए आतुर होकर आयी । प्रीति जानकर, हित को मानकर बिलखते शरीर से खड़ी रह गयीं । मानो वे विचित्र चित्र मे लिखी गयी हों, ब्रज मे जगह-जगह ऐसी गति है कि कहते नही बनता । सूरदास कहते है कि श्याम से विछुड़ने पर विरह का दुख किसे अच्छा लगता है ॥४॥ चलत जानि चितवहिं ब्रज-जुवती, मानहुँ लिखीँ चितेरैँ । जहाँ सु तहाँ एकटक रहि गईँ, फिरत न लोचन फेरैँ । बिसरि गईं गति भाँति देह की, सुनतिँ न स्रवननि टेरैँ । मिलि जु गईं मानौँ पै पानी, निबरहिँ नहीं निबेरैँ । लागौँ संग मतंग मत्त ज्यौँ, घिरतिँ न कैसेँहु घेरैँ । सूर प्रेम-आसा अंकुस जिय, वै नहिँ इत-उंत हेरैँ ॥५॥ अर्थ—चलता हुआ जानकर ब्रज की युवतियां देखती हैं मानो चितेरे ने तस्वीर बना दी हो । जो जहाँ थी वही रह गयी, घुमाने पर भी नेत्र घूमते ही नही (दूसरी ओर देखती ही नही) । शरीर की गति को भूल गयी, पुकारने पर भी कानो से नही
मथुरा गमन २१३ सुनतीं। मानों दूध ओर पानी की तरह मिल गयी और विलग करने पर भी नहीं होती। साथ मे मतवाले हाथी की तरह लग गयी, किसी प्रकार घेरने पर भी नही घिरती। सूरदास कहते हैं कि प्रेम का आशा अंकुश (जिनके) हृदय में (चुभा रहता है) वे इधर-उधर नही देखती हैं ॥५॥ (मेरे) कमलनैन प्राननि तैं प्यारे । इन्हें कहा मधुपुरी पठाऊँ, राम कृष्न दोऊ जन बारे । जसुदा कहै सुनी सुफलक-सुत, मैं इन बहुत दुखनि सौं पारे । ये कहा जानैं राज सभा कौं, ये गुरुजन बिप्रहुँ न जुहारे । मथुरा असुर समूह बसत हैं, कर-कृपान, जोधा हत्यारे । सूरदास ये लरिका दोऊ, इन कब देखे मल्ल-अखारे ॥६॥ अर्थ - मेरे कमल नैन, मुझे प्राणो से भी अधिक प्रिय है। बलराम-कृष्ण दोनों अभी कम उम्र के बालक है, इन्हें मथुरा कैसे भेजूं ? यशोदा कहती हैं हे सुफलक के पुत्र ! सुनो, मैंने इन्हे बहुत कष्ट से पाला है; ये राजसभा (की रीति) को क्या जाने, इन्हे गुरुजनो तथा विप्रो से प्रणाम करने का अभ्यास भी नही है। मथुरा मे राक्षसो का समूह, तथा हाथ में तलवार लेने वाले, हत्यारे योद्धा बसते हैं। सूरदास कहते हैं कि ये दोनों ही लड़के हैं, इन्होंने अखाड़े के मल्ल को कब देखा है ॥६॥ जसुमति अति हीं भई बिहाल । सुफलक सुत यह तुमहिं बूझियत, हरत हमारे बाल । ये दोउ भैया जीवन हमरे, कहति रोहिनी रोइ । धरनी गिरति, उठति अति ब्याकुल, कहि राखत नहिं कोइ । निठुर भए जब तैं यह आयौ, घरहूँ आवत नाहिं । सूर कहा नृप पास तुम्हारौ, हम तुम बिनु मरि जाहिं ॥७॥ अर्थ-यशोदा अत्यधिक व्याकुल हो गयी । सुफलक के पुत्र क्या हमारे बालकों का हरण करना, तुम्हारे लिए उचित है ? रोहिणी रोकर कहती है कि ये दोनों भाई हमारे जीवन है। पृथ्वी पर गिरकर अत्यधिक व्याकुल हो उठती हैं, (सोचती हैं) कि 'इन्हे कहकर कोई (क्यो नही) रख लेता । जब से यह (अक्रूर) आये हैं तब से (दोनो बालक) और निष्ठुर हो गये है, घर भी नही आते। सूरदास कहते है (रोहिणी कहती है) कि नृप के पास तुम्हारा क्या काम है, हम (तो) तुम्हारे बिना मर जायेगे ॥७॥ सुने हैं स्याम मधुपुरी जात । सकुचनि कहि न सकत काहू सौं, गुप्त हृदय की बात । संकित बचन अनागत कोऊ, कहि जु गयी अधरात । नींद न परै, घटै नहिं रजनी, कब उठि देखौं प्रात ।
२१४ सूरसागर सार सटीक नंद नंदन तौ ऐसे लागैं, ज्यौं जल पुरइनि पात । सूर स्याम सँग तैं बिछुरत हैं, कब ऐहैं कुसलात ॥८॥ अर्थ—सुना है कि कृष्ण मधुपुरी जा रहे हैं। संकोचवश किसी से हृदय की गुप्त बात कहती नही है। आधी रात को कोई आने वाली (अनागत) शंकायुक्त बात कह गया। (फलस्वरूप) नींद आती, तथा रात घटती ही नही, प्रातः उठकर कब (कृष्ण को) देखूंगी। कृष्ण तो ऐसे उदासीन लग रहे हैं जेसे पुरइन (कमल) के पत्ते पर जल की बूंद। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण) साथ से विछुड रहे हैं, कब सकुशल लौट आयेगे ॥८॥ मथुरा प्रयाण अब नंद गाइ लेहु संभारि । जो तुम्हारैं आनि बिलमे, दिन चराई चारि । दूध दही खवाइ कीन्हे, बड़े अति प्रतिपारि । ये तुम्हारे गुन हृदय तैं, डारिहौं न बिसारि । मातु जसुदा द्वार ठाढ़ी, चलै आँसू ढारि । कह्यौ रहियौ सुचित सौं, यह ज्ञान गुर उर धारि । कौन सुत, को पिता-माता, देखि हृदै विचारि । सूर के प्रभु गवन कीन्हौ, कपट कागद फारि ॥६॥ अर्थ—नन्द अब गाय सम्हाल लो। जो तुम्हारे यहां आकर ठहरे, चार दिन गाय चरा दिया। आपने दूध, दही खिलाकर अत्यधिक प्रेम से पालन किया। तुम्हारे ये गुण हृदय से विस्मृत नही करूँगा। माता यशोदा द्वार पर खडी है, आंखो से आंसू ढुलक रहे हैं (कृष्ण ने) कहा यह महान् ज्ञान हृदय मे धारण करके स्वस्थ चित्त से रहना। कौन पुत्र है, कौन माता-पिता है इसे हृदय मे विचार कर देखना। सूरदास कहते है कि कपट के कागज को फाड़कर कृष्ण ने प्रस्थान किया ॥६॥ जबहीं रथ अक्रूर चढ़े। तब रसना हरि नाम भाषि कै, लोचन नीर बढे । महरि पुत्र कहि सोर लगायौ, तरु ज्यौं धरनि लुटाइ । देखतिं नारि चित्र सी ठाढ़ीं, चितये कुंवर कन्हाइ । इतनैहि मैं सुख दियौ सबनि कौं, दीन्ही अवधि बताइ । तनक हँसे, हरि मन जुवतिन कौं, निठुर ठगौरी लाइ । बोलतिं नहीं रहीं सब ठाढ़ी, स्याम-ठगीं ब्रज नारी । सूर तुरत मधुबन पग धारे, धरनी के हितकारी ॥१०॥ अर्थ—जैसे ही अक्रूर रथ पर चढ़े, (उन्होंने) वाणी से कृष्ण का नामोच्चारण किया और (उनकी) आंखो मे आंसू बढ गये। महरि (यशोदा) ने 'पुत्र-पुत्र' कहकर शोर मचाया, (वह) वृक्ष के समान पृथ्वी पर गिर पड़ी। नारियां चित्रवत् खड़ी होकर
मथुरा गमन २१५ देखती हैं, कृष्ण ने (भी उनकी ओर) देखा। इतने मे ही सब को सुख प्रदान किया और (लौटने की) अवधि बात दी। कृष्ण युवतियों के मन पर निष्ठुर जादू डालकर थोड़ा हँसे। कृष्ण से ठगी हुई स्त्रियां बोलती नही, सभी खड़ी रह गयी। सूरदास कहते हैं कि पृथ्वी के हितकारी (कृष्ण) ने मधुपुर की ओर कदम बढ़ाये ॥१०॥ रहीँ जहाँ सो तहाँ सब ठाढ़ीं । हरि के चलत देखियत ऐसी, मनहु चित्र लिखि काढ़ी । सूखे बदन, स्रवति नैननि तैँ, जल-धारा उर बाढ़ी । कंधनि बाँह धरे चितवतिं मनु, द्रुमनि बेलि दव दाढ़ी । नीरस करि छाँड़ी सुफलक सुत, जैसे दूध बिनु साड़ी । सूरदास अक्रूर कृपा तैँ, सहीँ बिपति तन गाढ़ी ॥११॥ अर्थ—जो जहाँ थी वे वही खड़ी रह गयी। कृष्ण के चलते समय ऐसी जान पड़ती है मानो (वे) चित्र की तस्वीरे हो। सूखे मुख, नेत्रो के स्रवित होने से हृदय पर जल की धारा बढ़ गयी। कन्धे पर बांह रखे हुए (वे) ऐसी जान पड़ती है मानों दावाग्नि से दग्ध वृक्षो पर लता हो। सुफलक के सुत ने उन्हे रसहीन करके छोड़ दिया जैसे मलाई-रहित दूध हो । सूरदास कहते है कि अक्रूर की कृपा से उन्होने गहन दुख सहन किया ॥११॥ बिछुरत श्री ब्रजराज आजु, इनि नैननि की परतीति गई । उड़ि न गए हरि संग तबहिँ तैँ, ह्वै न गए सखि स्याममई । रूप रसिक लालची कहावत, सो करनी कछुवै न भई । साँचे क्रूर कुटिल ये लोचन, वृथा मीन-छवि छीन लई । अब काहैँ जल-मोचत, सोचत, समौ गए तैँ सूल नई । सूरदास याही तैँ जड़ भए, पलकनिहूँ हठि दगा दई ॥१२॥ अर्थ—कृष्ण से बिछुड़ते ही इन नेत्रो का विश्वास नही रह गया। तब ये कृष्ण के साथ उड़ नही गये ओर न श्याममय ही हो गये। ये रूप रस से लालची कहे जाते थे, किन्तु उस (प्रकार की) करणी कुछ नही दिखाई पड़ी। सचमुच ये नेत्र क्रूर और कुटिल हैं, व्यर्थ ही (इन नेत्रो ने) मछली की शोभा छीन ली है। अब (ये नेत्र) क्यो जल छोड़ते हैं तथा चिन्तित होते हैं। (संयोग का) समय बीत जाने के कारण (इन्हे) नई पीड़ा (हो रही है)। सूरदास कहते हैं कि इसी से ये जड़ हो गये हैं, पलको ने भी हठ करके धोखा दे दिया (गिरना बन्द कर दिया) ॥१२॥ आजु रैनि नहिँ नीँद परी । जागत गिनत गगन के तारे, रसना रटत गोबिंद हरी । वह चितवनि, वह रथ की बैठनि, जब अक्रूर की बाँह गही । चितवति रही ठगी सी ठाढ़ी, कहि न सकति कछु काम दही ।
२१६ सूरसागर सार सटीक इते मान व्याकुल भइ सजनी, आरज पंथहुँ तैं बिडरी। सूरदास-प्रभु जहाँ सिधारे, कितिक दूर मथुरा नगरी ॥१३॥ अर्थ—आज रात में नीद नही आयी। जागती हुई आकाश के तारे गिनती रही, जीभ गोविंद कृष्ण रटती रही। जब अक्रूर की बाँह (कृष्ण ने) पकड़ी, (उस समय की) वह दृष्टि, वह रथ पर बैठना, (कितना निष्ठुर था)। (तब) हम ठगी सी खडी रही, तथा काम से दग्ध कुछ कह न सकी। हे सखी ! इतना अधिक व्याकुल हो गयी कि आर्यपथ से भी अलग हो गयी। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण जहां गये वहां से मथुरा नगरी कितनी दूर है ॥१३॥ री मोहिं भवन भयानक लागै, माई स्याम विना। काहि जाइ देखीँ भरि लोचन, जसुमति कैं अँगना। को सकट सहाइ करिवै कौं, मेटै विघ्न घना। लै गयौ क्रूर अक्रूर साँवरौ, ब्रज कौ प्रानधना। काहि उठाइ गोद करि लीजै, करि करि मन मगना। सूरदास मोहन दरसन बिनु, सुख सम्पति सपना ॥१४॥ अर्थ--हे सखी ! कृष्ण के बिना मुझे घर भयानक लगता है। यशोदा के आंगन जाकर किसे भर-निगाह (जी भर कर) देखूं। संकट (के समय) कौन सहायता करे (तथा) घने विघ्नों को मिटा दे। निर्दयी अक्रूर ब्रज के प्राणधन को लेकर चला गया। किसे उठाकर मन को प्रसन्न कर करके गोद मे ले ले। सूरदास कहते हैं कि मोहन के दर्शन के बिना सुख-सम्पत्ति स्वप्न के समान (है) ॥१४॥ कहा हौँ ऐसे ही मरि जैहौँ। इहिँ आँगन गोपाल लाल कौ, कबहुँ कि कनिया लैहौँ। कब वह मुख बहुरौ देखौंगी, कह वैसो सचुपैहौँ। कब मोपै माखन माँगैगे, कब रोटी धरि दैहौँ। मिलन आस तन-प्रान रहत हैं, दिन दस मारग ज्वैहौँ। जौ न सूर अइहैं इते पर, जाइ जमुन धँसि लैहौँ ॥१५॥ अर्थ—क्या मैं ऐसे ही मर जाऊँगी ? इस आँगन मे गोपाल लाल को कभी गोद मे लूंगी ? वह मुख फिर कब देखूँगी, वह सुख कहाँ पाऊँगी ? कब मुझसे मक्खन मागेगे, कब रोटी पर (मक्खन) रखकर दूँगी। मिलने की आशा से शरीर मे प्राण रुके है। दस दिन तक रास्ता देखूँगी। सूरदास कहते है कि इस बीच यदि नही आयेगे तो (हम गोपियां) जाकर यमुना मे धंस जायेगी ॥१५॥ मथुरा प्रवेश तथा कस-वध बूझत हैं अक्रूरहिँ स्याम। तरनि किरनि महलनि पर झईं, इहै मधुपरी नाम।
श्रवननि सुनत रहत है जाकौ, सो दरसन भए नैन । कंचन कोटि कँगूरनि की छबि, मानी बैठे मैन । उपवन बन्यौ चहूँधा पुर के, अतिहीँ मोकौँ भावत । सूर स्याम बलरामहिँ पुनि पुनि, कर पल्लवनि दिखावत ॥१६॥ अर्थ—अक्रूर से कृष्ण पूँछते हैं। (जहाँ) महलों पर सूर्य की किरणे छायी हैं (क्या) इसी का नाम मधुपुरी है। कानो से जिसे सुनता रहा उसका नेत्रो से दर्शन हो गया । सोने के महल के कंगूरो की शोभा ऐसी है मानों कामदेव बैठे हों । पुर के चारो ओर बने उपवन मुझे अत्यधिक रुचिकर लगते हैं । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण कर- पल्लवो से बलराम को बार-बार दिखाते हैं ॥१६॥ मथुरा हरषित आजु भई । ज्यौँ जुवती पति आवत सुनि कै, पुलकित अंग मई । नवसत साजि सिंगार सुदरी, आतुर पंथ निहारति । उड़ति धुजा तनु सुरति बिसारे, अंचल नहीँ संभारति । उरज प्रगट महवनि पर कलसा, लसति पास बन सारी । ऊँचे अटनि छाज की सोभा, सीस उचाइ निहारी । जालरंध्र इकटक मग जोवति, किंकिन कंचन दुर्ग । बेनी लसति कहाँ छबि ऐसी, महलनि चित्रे उर्ग । बाजत नगर बाजने जहँ तहँ, और बजत घरियार । सूर स्याम बनिता ज्यौँ चंचल, पग नूपुर झनकार ॥१७॥ अर्थ—मथुरा आज हर्षित हो गयी, जैसे पति को आता सुनकर युवती के अंग पुलकित हो जाते हैं। सोलह श्रृंगार सजाकर सुन्दरी आतुर होकर पथ निहारती है। उड़ती हुई ध्वजा (ऐसी ज्ञात होती है) जैसे विस्मृत होकर अपने अंचल को नही सम्हालती । महलों पर रखे गये कलस (रूपी) स्तन प्रत्यक्ष हो गये तथा पास के वन (रूपी) साडी शोभित है। ऊँची छतो छज्जे शोभित हैं, (जैसे छज्जे के रूप में मथुरा रूपी नारी) सिर ऊँचा करके पथ निहार रही है। झरोखे की जालियो मे इकटक रास्ता देखती हैं। कंचन के दुर्ग (नगर सुन्दरी) की किंकिणी हैं। महलो पर के चित्रित सांप चोटी के समान शोभित हैं और जगह ऐसी छवि कहाँ है । नगर मे जहाँ-तहाँ वाजे तथा घड़ियाल बजते है, सूरदास कहते है मानो यह कृष्ण की चंचल पत्नी है जिसके पग के नूपुरों को झनकार हो रही है ॥१७॥ मथुरा पुर मैँ सोर पर्यौ । गरजत कंस बंस सब साजे, मुख कौ नीर हर्यौ । पीरौ भयौ, फेफरी अधरनि, हिरदय अतिहि डर्यौ । नंद महर के सुत दोउ सुनि कै, नारिनि हर्ष भर्यौ ।
२१८ सूरसागर सार सटीक कोउ महलनि पर कोउ छज्जनि पर, कुल लज्जा न करयौ। कोउ धाईँ पुर गलिन गलिन ह्वै, काम-धाम विसरयौ। इंदु वदन नव जलद सुभग तनु, दोउ खग नयन करयौ। सूर स्याम देखत पुर-नारी, उर-उर प्रेम भरयौ ॥१८॥ अर्थ—मथुरा नगर मे शोर मच गया। अपने वश सहित सुसज्जित कंस गरज रहा है, किन्तु (उसका) मुख सूख गया है, (वह) (भय से) पीला पड गया, अधरों पर पपड़ी पड गयी, (और) (वह) हृदय से अत्यधिक डरा (है)। (दूसरी ओर) नन्द महर के दोनों पुत्रों के विषय मे सुनकर नारियो को हर्ष हुआ। कोई महलो पर, कोई छज्जो पर (आकर देखने लगी), उन्होंने कुल की लज्जा नही की। कोई पुर की गली-गली से होकर दोड पड़ी तथा धाम का काम सब कुछ भूल गया। नये वादल के समान सुन्दर शरीर वाले कृष्ण के चन्द्र-मुख हेतु पुर की नारियो ने अपने दोनो नेत्रो को (चकोर) पक्षी बना लिया। सूरदास कहते हैं कि अपने-अपने हृदय मे प्रेम भरकर पुर की नारियां कृष्ण को देखती हैं ॥१८॥ ढोटा नंद कौ यह री। नाहिं जानति बसत ब्रज मैँ, प्रगट गोकुल री। धरयौ गिरिवर वाम कर जिहिँ, सोइ है यह री। दैत्य सब इनहीँ सँहारे, आपु-भुज-बल री। ब्रज-घरनि जो करत चोरी, खात माखन री। नंद-घरनी जाहिँ बाँध्यौ, अजिर ऊखल री। सुरभि-ठान लिये वन तैँ आवत, सबहिँ गुन इन री। सूर-प्रभु ये सबहि लायक, कंस डरै जिन री ॥१९॥ अर्थ—यही नन्द के पुत्र हैं। जानती नही कि (यही) ब्रज में बसते हैं तथा गोकुल मे प्रकट हुए हैं। वाये हाथ से जिन्होने गिरवर को धारण किया यह वही है। अपनी भुजाओं के बल से इन्होने सारे दैत्यो का सहार किया। ब्रज के घरो मे जो चोरी करते हैं तथा माखन खाते हैं। नन्द की स्त्री ने जिन्हे आंगन मे ऊखल से बांधा था। गायो का समूह लेकर वन से आते है, इनमे सभी गुण हैं। सूरदास कहते हैं कि ये सब (कुछ करने) योग्य हैं, और कंस जिनसे डरता है ॥१९॥ भए सखि नैन सनाथ हमारे। मदनगोपाल देखतहिँ सजनी, सब दुख सोक विसारे। पठये हे सुफलक-सुत गोकुल, लैन सो इहाँ सिधारे। मल्ल जुद्ध प्रति कंस कुटिल मति, छल करि इहाँ हँकारे। मुष्टिक अरु चानूर सैल सम, सुनियत हैं अति भारे। कोमल कमल समान देखियत ये जसुमति के बारे।
मथुरा गमन २१५ होवे जीति विधाता इनकी, करहु सहाइ सवारे। सूरदास चिर जियहु दुष्ट दलि, दोऊ नंद-दुलारे ॥२०॥ अर्थ- हे सखि ! हमारे नेत्र सफल हो गये । मदन गोपाल को देखते ही (हमने) सारे दुख-शोक भुला दिये । इन्हे लेने के लिए अक्रूर को (कस ने) गोकुल भेजा था, इसी से यहां आये हैं। कुटिल-बुद्धि कंस ने मल्ल युद्ध के लिए छल करके (इन्हे) यहाँ बुलाया है। सुनती हूँ मुष्टिक और चानूर पर्वत के समान अत्यन्त भारी है। ये यशोदा के बालक कोमल कमल के समान दिखाई देते हैं। हे विधाता ! शीघ्र सहायता करो ताकि इनकी ही जीत हो । सूरदास कहते है कि दुष्टो का नाश करके नन्द के दोनो पुत्र बहुत समय तक जिएँ ॥२०॥ धनुषसाला चले नंदलाला । सखा लिए संग प्रभु रंग नाना करत, देव नर कोउ न लखि सकत ख्याल । नृपति के रजक सों भेंट मग मेँ भई, कह्यौ दै बसन हम पहिरि जाही । वसन ये नृपति के जासु की प्रजा तुम, ये बचन कहत मन डरत नाहीँ । एक ही मुष्टिका प्रान ताके गए, लए सब वसन कछु सखनि दीन्हे । आइ दरजी गयौ बोलि ताकौँ लयौ, सुभग अँग साजि उन विनय कीन्हे । सुनि सुदामा कह्यौ गेह मम अति निकट, कृपा करि तहाँ हरि चरन धारे । धोइ पद-कमल पुनि हार आगैँ धरे, भक्ति दै, तासु सब काज सारे । लिए चंदन बहुरि आनि कुबिजा मिली, स्याम अँग लेप कीन्हौ बनाई । रीझि तिहिँ रूप दियौ, अंग सुधौ कियौ, बचन सुभ भाषि निज गृह पठाई । पुनि गए तहाँ जहँ धनुष, बोले सुभट, हौंस जनि मन करौ वन-बिहारी । सूर प्रभु छुवत धनु टूटि धरनी पर्यो, सोर सुनि कंस भयौ भ्रमित भारी ॥२१॥ अर्थ-साथ मे मित्रो को लेकर अनेक क्रीडाएँ करते हुए कृष्ण धनुष-शाला को चले, देवता या मनुष्य कोई (उनके इस) खेल को देख (समझ) नहीं सकता। रास्ते में राजा (कंस के) धोबी से भेट हुई । (कृष्ण ने उससे) कहा कि हमे वस्त्र दो (जिन्हे) पहनकर हम जाएं । (धोबो ने कहा) यह वस्त्र राजा के हैं जिनकी तुम प्रजा हो, यह वचन कहते हुए (तुम) डरते नही हो ! एक ही मुष्टिका (मुक्के) मे उसके प्राण चले गये तथा उससे सब वस्त्र ( कृष्ण ने ) ले लिये, कुछ मित्रों को दे दिये । दरजी आया और (उसने) उनके सुन्दर अंग को सजाकर विनय की। फिर सुदामा ने कहा कि मेरा घर अत्यन्त निकट है, कृपा करके कृष्ण वहां गए । (सुदामा ने) चरण-कमल धोये (तथा) फिर हार (अहार) आगे रखा । (कृष्ण ने) अपनी भक्ति देकर उसके सब कार्य सिद्ध कर दिये । फिर आगे चंदन लिए कुब्जा मिली, उसने भली प्रकार कृष्ण के अंगों
२२० सूरसागर सारः सटीक पर लेप की। (कृष्ण ने) रीझ कर उसे रूप प्रदान किया तथा अंग सीधा कर दिया और शुभ वचन कहकर घर भेजा। फिर वहां गये जहां धनुष था। सुभटों ने कहा कि हे बनविहारी ! (धनुष तोड़ने) का हौंसला मत करो। सूरदास कहते हैं कि छूते ही धनुष टूटकर पृथ्वी पर जा पड़ा, शोर सुनकर कंस बहुत भ्रमित हुआ ॥२१॥ सुनिहि महावत बात हमारी। बार-बार संकर्षण भाषत, लेत नाहिं ह्याँ तैं गज टारी। मेरौ कह्यौ मानि रे मूरख, गज समेत तोहिं डारौं मारी। द्वारैं खरे रहे हैं कबके, जनि रे गर्व करहि जिय भारी। न्यारौ करि गयंद तू अजहूँ, जान देहि कै आपु सँभारी। सूरदास प्रभु दुष्ट निकंदन, धरनी भार उतारनकारी ॥२२॥ अर्थ—महावत हमारी बात सुनो ! बार-बार संकर्षण (बलराम) कहते हैं, यहाँ से (हाथी को) हटा क्यों नहीं लेता। मूर्ख ! मेरा कहना मानो, नहीं तो हाथी सहित तुम्हें मार डालूँगा। कब से (कृष्ण) द्वार पर खड़े हैं, (यह) जानकर भी तू मन में अत्यधिक गर्व करता है। अभी तू हाथी को अलग कर, या तो जाने दे या प्राण देने के लिए सँभल जा। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण) दुष्टों के नाशक तथा पृथ्वी का भार उतारने वाले हैं ॥२२॥ तब रिस कियौ महावत भारि। जौ नहिं आज मारिहौं इनकौं, कंस डारिहै मारि। आंकुस राखि कुम्भ पर कर्षयौ, हलधर उठे हँकारि। धायौ पवनहुँ तैं अति आतुर, धरनी दंत खंभारि। तब हरि पूँछ गह्यौ दच्छिन कर, कँबुक फेरि सिर वारि। पटक्यौ भूमि, फेरि नहिं मटक्यौ, लीन्हौ दंत उपारि। दुहुँ कर दुरद दसन इक इकछवि, सो निरखतिं पुरनारि। सूरदास प्रभु सुर सुखदायक, मारयौ नाग पछारि ॥२३॥ अर्थ—तब महावत ने अत्यधिक क्रोध किया। जो इन्हे आज मार नहीं डालता ,तो कंस (मुझे) मार डालेगा। (उसने) अंकुश दोनो कुंभों पर रखकर खींचा (चुभोया) (इस पर) बलराम ललकार उठे। (तब) दांतों से पृथ्वी को कंपित करके (वह हाथी) पवन से भी अधिक तीव्रता से दौड़ा। तब कृष्ण ने दाहिने हाथ से पूंछ पकड़ी। हाथी को सिर के चारों ओर फिराकर पृथ्वी पर पटक दिया, फिर वह हिला-डुला नहीं तथा (तब) (कृष्ण ने) उसके दांत उखाड़ लिये। दोनों दांत एक-एक हाथ मे शोभित हैं जिन्हे नगर की स्त्रियां देख रही है। सूरदास कहते हैं कि प्रभु देवताओ को सुख देने वाले है। उन्होंने हाथी को पछाड़कर मारा ॥२३॥ एई सुत नंद अहीर के। मारयौ रजक बसन सब लूटे, संग सखा बल वीर के।
मथुरा गमन २२१ कांधि धरि दोऊ जन आए, दंत कुंबलयापीर के। 'पसुपति मंडल मध्य मनो, मनि क्षीरधि नीरधि नीर के। उड़ि आए तजि हंस मात मनु, मानसरोवर तीर के। सूरदास प्रभु ताप निवारन, हरन संत दुःख पीर के ॥२४॥ अर्थ—नन्द अहीर के पुत्र ये ही हैं। बलराम तथा मित्रों के साथ धोबी को मारकर (इन्होने) सब वस्त्र लूट लिये। कुवलयापीड (हाथी) के दांतो को कन्धे पर रखकर दोनो भाई आये । पशुपति मंडल के बीच मानों क्षीर सागर की मणि हो, मानों मतवाले हंस होकर मानसरोवर के तीर को छोड़कर उड़ आये हों.। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ताप का निवारण करने वाले, (तथा) सन्तो के दुख और पीड़ा को हरने वाले हैं ॥२४॥ सुनो हो बीर मुष्टिक चानूर सबै, हमहिं नृप पास नहिं जान दैहौ। घरि राखे हमें, नहीं बूझे तुम्हें, जगत मैं कहा उपहास लैहौ। सबै यहै कहै भली मत तुम पै है, नंद के कुँवर दोउ मल्ल मारे। यहै जस लेहुगे, जान नहिं देहुगे, खोजही परे अब तुम हमारे। हम नहीं कहैं तुम मनहिं जौ यह बसी, कहत हौ कहा तौ करौ तैसी। सूर हम तन निरखि देखियै आपुकीं, बात तुम मनहिं यह बसी नैसी ॥२५॥ अर्थ—मुष्टिक, चानूर, सभी वीरों सुनो ! क्या मुझे राजा के पास नही जाने दोगे ? मुझे घेरकर खड़े हो, (मैं) तुम्हे (कुछ) नही समझता, (तुम) जगत में हँसे जाओगे। सभी, यही भली बात तुमसे कहेगे (कि) नन्द के पुत्रों ने दोनो मल्लो को मार डाला । (तुम) यही यश लोगे और जाने नही दोगे, तुम मेरे पीछे ही पढ गये हो। तुम्हारे मन में जो यही बसा है तो हम (कुछ) नही कहेंगे । (मल्लो ने कहा) क्या कहते हो, जैसा करना हो करो। सूरदास कहते हैं (मल्ल कृष्ण से कहते हैं) कि हमारी तरफ देखकर अपने को देखो ! तुम्हारे मन मे (हम से भिड़ने की) यह बुरी बात बस गयी है ॥२५॥ गह्यौ कर स्याम भुज मल्ल अपने धाइ, झटकि लीन्हौ तुरत पटकि धरनी । भटकि अति सब्द भयौ, खटक नृप के हियैं, अटकि प्राननि पर्यौ चटक करनी। लटकि निरखन लग्यौ, मटक सब भूलि गइ, हटक करि देउँ इहै लागी । झटकि कुंडल निरखि, अटक ह्वै कै गयौ, गटकि सिल सौं रही मीच जागी। मल्ल जे जे रहे सबै मारे तुरत, असुर जोधा सबै तेउ सँहारे। धाइ दूतनि कह्यौ, मल्ल कोउ न रह्यौ, सूर बलराम हरि सब पछारे ॥२६॥ अर्थ—मल्ल ने दोडकर अपनी भुजा से कृष्ण का हाथ पकड़ लिया। (कृष्ण ने) तुरन्त झटककर (हाथ छुड़ा लिया), (और) (उसे) धरती पर पटक दिया। घोर शब्द से (राजा) भ्रमित हुआ, राजा (कंस) के हृदय मे खटका पैदा हुआ, चटक कर प्राण उलझ गये। लटक कर (झुककर) (वह मल्ल) देखने लगा, सारी गति भूल गई, यही
२२२ सूरसागर सार सटीक लगा कि (इन्हें) रोक दूं। (कृष्ण के) कुंडल की झटक (हिलना) देखकर वह अटक सा (स्तब्ध सा) रह गया, (मानों) शिला सी गटक गया हो, उसकी मृत्यु (मानो) जग गई हो। (कृष्ण ने) जो-जो मल्ल थे सभी को तुरन्त मारा, सभी असुर, योद्धाओ का संहार कर दिया। दौड़कर दूतों ने (कंस से) कहा, (कि) कोई शेष नही रहा, शूरवीर बलराम, कृष्ण ने सभी को पछाड़ दिया ॥२६॥ नवल नंदनंदन रंगभूमि राजैं। स्याम तन, पीत पट मनौ घन मैं तड़ित, मोर के पंख माथैं विराजैं। स्रवन कुडल झलक मनौ चपला चमक, दृग अरुन कमल दल से विसाला। भौंह सुंदर धनुप, बान सम सिर तिलक, केस कुंचित सोह भृंग माला। हृदय वनमाल, नूपुर चरन लाल, चलत गज चाल, अति बुधि विराजै। हंस मानौ मानसर अरुन अंबुज सुभर, निरखि आनंद करि हरषि गाजैं। कुवलया मारि चानूर मुष्टिक पटकि, वीर दोउ कंध गज-दंत धारे। जाइ पहुँचे तहाँ कंस बैठ्यौ जहाँ, गए अवसान प्रभु के निहारे। ढाल तरवारि आगैं धरी रहि गई, महल कौ पंथ खोजत न पावत। लात कैं लगत सिर तैं गयौ मुकुट गिरि, केस गहि लै चले हरि खसावत। चारि भुजा धारि तेहिं चारु दरसन दियौ, चारि आयुध चहूँ हाथ लीन्हे। असुर तजि प्रान निरवान पद कौं गयौ, विमल मति भई प्रभु रूप चीन्हे। देखि यह पुहुप वर्षा करी सुरनि मिलि, सिद्ध गंधर्व जय धुनि सुनाई। सूर प्रभु अगम महिमा न कछु कहि परति, सुरनि की गति तुरत असुर पाई ॥२७॥ अर्थ-नवल कृष्ण रंग-भूमि मे सुशोभित हैं। श्याम शरीर पर पीताम्बर मानो बादल मे बिजली हो, मोर के पंख मस्तक पर विराज रहे हैं। श्रवण के कुंडल मानो बिजली की चमक हो। आंखे लाल कमलदल के समान विशाल हैं। भौंह सुन्दर धनुष के समान हैं। सिर का तिलक बाण के समान है। कुंचित बाल भौरों की माला (पंक्ति) के समान है। हृदय पर वनमाला, लाल चरणो मे नूपूर, गज के समान चाल तथा अत्यधिक बुद्धि विराजित है (अत्यन्त बुद्धिमान हैं)। हंस मानों कमल से भरे मान- सरोवर को देखकर आनन्द से हर्षित होकर बोल रहे हैं। कुवलय (हाथी) को मारकर, मुष्टिक को पटककर दोनो वीर कंधे प...रण किये हुये हैं। वहां जाकर पहुँचे जहां कंस बैठा था। देखा (कृष्ण ने) ये। ढाल-तलवार आगे ...रह गयी, महल का रास्ता चटक कर प्राण । घोर शब्द ही सिर से मुकुट खिसक तथा (तब ... कड़कर कृष्ण धर्मति भूल गई, यही धारण करके, चारों हाथों हैं जिन्हें नगर... ये उसे सुन्द तजकर निर्वाण पद को प्राप्त वाले है। उन्हो... का रूप विमल हो गयी। यह देखकर . मारच्यो... र गंधवों ने जय-जयकार की
[header] मधुरा गमन २२३ [/header]
ध्वनि सुनाई । सूरदास कहते हैं कृष्ण की अगम महिमा के विषय में कुछ नही कहा जा सकता । देवताओं की स्थिति असुर पा गया ॥२७॥ उग्रसेन कौँ दियौ हरि राज । आनंद मगन सकल पुरबासी, चँवर डुलावत श्री ब्रजराज । जहाँ तहाँ तैँ जादव आए, कंस डरनि जे गए पराइ । मागध सूत करत सब अस्तुति, जै जै जै श्री जादवराइ । जुग-जुग विरद यहै चलि आयौ, भए वलि के द्वारैँ प्रतिहार । सूरदास प्रभु अज अविनासी, भक्तन हेत लेत अवतार ॥२८॥ अर्थ - कृष्ण ने उग्रसेन को राज्य दे दिया । समस्त पुरवासी आनन्द से मग्न होकर कृष्ण के चामर डुलाते हैं। जो यादव कंस के डर से इधर-उधर भाग गये थे वे आ गये। मागध, बन्दी सभी स्तुति करते हैं कि श्री यादवराय की जय हो, जय हो । युग-युग से यही यश चला आया कि कृष्ण बलि के द्वार पर प्रतिहारी बने थे । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण अजन्मा अविनासी हैं तथा भक्तो के लिए अवतार लेते है ॥२८॥ तब बसुदेव हरषित गात । स्याम रामहिँ कंठ लाए, हरषि देवै मात । अमर दिवि दुंदुभी दीन्हीँ, भयौ जै जैकार । दुष्ट दलि सुख दियौ संतनि, ये वसुदेव कुमार । दुख गयौ बहि हर्ष पूरन, नगर के नर-नारि । भयौ पूरब फल संपूरन, लह्यौ सुत दैत्यारि । तुरति बिप्रनि बोलि पठये, धेनु कोटि मँगाइ । सूर के प्रभु ब्रह्मपूरन, पाइ हरषै राइ ॥२९॥ अर्थ-तब वसुदेव ने हर्षित शरीर से कृष्ण और बलराम को गले से लगा लिया । देवकी माता हर्षित हो गयी । देवताओ ने आकाश मे जय-जयकार करके दुंदुभी बजायी । दुष्टों का नाश करके इन वसुदेव पुत्र (कृष्ण) ने सन्तो को सुख दिया । दुख बह गया, नगर के नर-नारी हर्ष से पूर्ण हो गये । (वसुदेव) के पूर्व जन्म का पुण्य फलित हुआ, दैत्यो के शत्रु कृष्ण को प्राप्त किया । हजारों गाय मंगाकर ब्राह्मणो को (देने के लिए) बुला भेजा । सूरदास कहते है कि पूर्ण ब्रह्म कृष्ण को पाकर (वसुदेव आदि) हर्षित हो गये ॥२६॥ बसुद्यौ कुल-व्यौहार विचारि । हरि हलधर कौँ दियौ जनेऊ, करि षटरस ज्यौनारि । जाके स्वास-उसाँस लेत मैं, प्रगट भये श्रुति चार । तिन गायत्री सुनो गर्ग सौँ, प्रभु गति अगम अपार । विधि सौँ धेनु दई बहु विप्रनि, सहित सर्वडलंकार । जदकुल भयौ परम कौतूहल, जहँ तहँ गावतिं नार ।
२२४ सूरसागर सार सटीक मातु देवकी परम मुदित ह्वै, देति निछावरि वारि। सूरदास की यहै आसिषा, चिर जियौ नंदकुमार ॥३०॥ अर्थ—वसुदेव ने कुल के व्यवहार को विचार कर छह प्रकार के रसो से युक्त भोजन कराके कृष्ण और हलधर को जनेऊ दिया। जिनके सांस तथा उच्छवास लेने से चारो वेद प्रकट हुए उन्होने ही गर्ग से गायत्री (मंत्र) पढी। प्रभु की गति अगम तथा अपार है। सभी आभूषणों के साथ विधि-पूर्वक ब्राह्मणो को बहुत सी गायें प्रदान की गयी। यदुकुल अत्यधिक प्रसन्न हुआ, जहाँ-तहाँ स्त्रियाँ गाती हैं। माता देवकी अत्यधिक प्रसन्न होकर उतार कर (धन को कृष्ण-बलराम सिर के चारो ओर घुमाकर) निछावर देती हैं। सूरदास ने यही आशीष दी (कि) नद कुमार चिरकाल तक जीवित रहें ॥३०॥ कुबरी पूरव तप करि राख्यो । आए स्याम भवन ताही कैं, नृपति महल सब नाख्यौ । प्रथमहिं धनुष तोरि आवत हे, बीच मिली यह धाइ । तिहिं अनुराग वस्य भए ताकैं, सी हित कह्यो न जाइ । देव काज हरि आवन कहि गए, दैन्हौ रूप अपार । कृपा दृष्टि चितवतहीँ श्री भइ, निगम न पावत पार । हम तैँ दूरि दीन के पाछैं, ऐसे दीनदयाल । सूर सुरनि करि काज तुरतहीँ, आवत तहाँ गोपाल ॥३१॥ अर्थ—कुबरी ने पूर्व जन्म में तप कर रखा था। कृष्ण ने राजा के समस्त महलो को नष्ट किया (और) उसी के भवन आये। प्रथम ही धनुष तोड़कर आते थे, (हे) (यह) बीच मे ही दौडकर मिल गयी। उसी अनुराग के कारण उसके वश मे हो गये, यह स्नेह कहते नही बनता। (कृष्ण जी) देव कार्य करके (उससे) आने के लिए कह गये थे, (उन्होने) उसे अपार रूप दे दिया। कृपा की दृष्टि से देखते ही शोभा छा गयी, निगम पार नही पाते। अहंकार से दूर तथा दीन के पीछे रहने वाले (कृष्ण) ऐसे ही दीन दयालु हैं ! सूरदास कहते हैं कि देवताओं के कार्य को करके गोपाल वहां तुरन्त ही आये ॥३१॥ कियौ सुर-काज गृह चले ताकैं । पुरुष औ नारि कौ भेद भेदा नहीं, कुलिन अकुलीन अवतरचौ काकैं । दास दासी कौन, प्रभु निप्रभु कौन है, अखिल ब्रह्मांड इक रोम जाकैं । भाव साँचौ हृदय जहाँ, हरि तहाँ हैं, कृपा प्रभु की माथ भाग वाकैं । दास दासी स्याम भजनहु तैं जिये, रमा सम भई सो कुब्जदासी । मिली वह सूर प्रभु प्रेम चंदन चरचि, कियौ जप कोटि,तप कोटि कासी ॥३२॥ अर्थ—देवताओ का कार्य करके उसके घर चले उसके (कृष्ण-ब्रह्म) लिए पुरुष और स्त्री का भेद नही, कुलीन या अकुलीन किसके यहाँ अवतरित नही हुए हैं। दासी,
५. मथुरा गमन एवं विरह
मथुरा गमन २२५ या दास कौन है, या प्रभु तथा दास निप्रभु कौन है (कृष्ण-ब्रह्म के लिए यह सब भेद- भाव कुछ महत्व नही रखता है)। जिसके एक रोम के बराबर अखिल ब्रह्माण्ड है। जहाँ जिस हृदय में सच्चा भाव है कृष्ण जी वही है। जिसके मस्तक पर प्रभु की कृपा है वही भाग्यशाली है। दास-दासी कृष्ण के भजन से जीवित रहते हैं। वह कृष्ण दासी अब लक्ष्मी के समान हो गयी । सूरदास कहते हैं कि वह प्रेम रूपी चन्दन लगाकर सूर के प्रभु से मिली (उसके प्रेम से) उसने कोटि जप तथा काशी में किये जाने वाले कोटि तप को कर डाला (अर्थात् इतना फल प्राप्त कर लिया) ॥३२॥ मथुरा दिन-दिन अधिक बिराजै । तेज प्रताप राइ केसौं कैँ, तीनि लोक पर गाजै । पग पग तीरथ कोटिक राजैं, मधि विश्राति बिराजै । करि अस्नान प्रात जमुना कौ, जनम मरन भय भाजै । बिट्ठल विपुल बिनोद बिहारन, ब्रज कौ बसिबौ छाजै । सूरदास सेवक उनहीं कौ, कृपा सु गिरिधर राजै ॥३३॥ अर्थ-मथुरा दिन प्रतिदिन अधिक शोभित हो रही है। राजा कृष्ण का तेज (तथा) प्रताप तीनो लोको मे घोषित हो रहा है। पग-पग पर करोड़ो तीर्थ शोभित है, (तथा) मध्य मे विश्राति विराज रही है। प्रातः यमुना का स्नान करने पर जन्म-मरण का भय भाग जाता है । विट्ठल की अनेक विनोद की क्रीड़ास्थलियो मे रहना अच्छा लगता है । सूरदास उन्ही के सेवक है, कृष्ण की कृपा (उन पर) राज कर रही है ॥३३॥ नन्द का ब्रज प्रत्यागमन वेगि ब्रज कौं फिरिए नँदराइ । हमहिं तुमहिं सुत तात कौ नातौ, ओर पर्यौ हैँ आइ । बहुत कियौ प्रतिपाल हमारौ, सो नहिं जी तैँ जाइ । जहाँ रहैं तहँ तहाँ तुम्हारे, डारचौ जनि बिसराइ । जननि जसोदा भेंटि सखा सब, मिलियौँ कण्ठ लगाइ । साधु समाज निगम जिनके गुन, मेरैं गनि न सिराइ । माया मोह मिलन अरु विछुरन, ऐसैं ही जग छाइ । सूर स्याम के निठुर वचन सुनि, रहे नैन जल छाइ ॥३४॥ अर्थ-नन्दराय ! शीघ्र ही ब्रज को वापस चले जाइये । हमारा तुम्हारा पुत्र और पिता का सम्बन्ध अन्त को आ गया है। (तुमने) हमारा बहुत पोषण किया है, वह मन से नही जाता । जहाँ जहाँ रहूँगा वहाँ-वहाँ तुम्हारा ही रहूँगा, (इसे) भुला मत देना । माता यशोदा और सखाओं से भेंटकर कंठ लगाकर मिलना । जिनके गुणो की साधु-समाज तथा वेदों ने (बताया है) वे मेरे द्वारा गिनने से समाप्त होने वाले नही हैं । १५
२२६ सूरसागर सार सटीक माया, मोह, मिलन और वियोग इन्ही मे संसार नष्ट होता है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के निष्ठुर वचन सुनकर (नन्द के) नेत्रो मे आंसू छा गये ॥३४॥ नद बिदा होइ घोष सिधारौ । बिछुरन मिलन रच्यौ विधि ऐसौ, यह सकोच निवारौ । कहियौ जाइ जसोदा आगेँ, नैंन नीर जनि ढारौ । सेवा करी जानि सुत अपनौ, कियौ प्रतिपाल हमारौ । हमैँ तुम्हें अन्तर कछु नाहीँ, तुम जिय ज्ञान बिचारौ । सूरदास प्रभु यह बिनती है, उर जनि प्रीति बिसारौ ॥३५॥ अर्थ-हे नन्द ! विदा होकर गाँव को प्रस्थान करो । वियोग और मिलन ब्रह्मा ने इसी तरह रचा है, इस संकोच का निवारण करो (भूल जाओ) । यशोदा के आगे जाकर कहना कि नेत्रों से जल न ढुलकाये । अपना पुत्र समझकर उन्होने हमारी सेवा की तथा हमारा प्रतिपालन किया । हममे तुममे कुछ भी अन्तर नही है, तुम मन मे ज्ञान का विचार करो । सूरदास के प्रभु की यह विनती है कि हृदय से प्रेम को भुला न देना ॥३५॥ गोपालराइ हौं न चरन तजि जैहौँ । तुमहिँ छोड़ि मधुबन मेरे मोहन, कहा जाइ ब्रज लैहौँ । कैहौँ कहा जाइ जसुमति सौँ, जब सन्मुख उठि ऐहै । प्रात समय दधि मथत छोड़ि कै, काहि कलेऊ दैहै । बारह बरस दियौ हम ढीठौ, यह प्रताप बिनु जाने । अब तुम प्रगट भए बसुद्यौ-सुत, गर्ग बचन परमाने । रिपु हति काज सबै कत कीन्हौ, कत आपदा विनासी । डारि न दियौ कमल कर तैँ गिरि, दबि मरते ब्रजवासी । बासर सग सखा सब लीन्हे, टेरि न धेनु चरैहौ । क्यौं रहिहैँ मेरे प्रान दरस बिनु, जब संध्या नहिँ ऐहौ । ऊरध स्वाँस चरन गति थाकी, नैन नीर भरआइ । सूर नंद बिछुरत की वेदनि, मो पै कही न जाइ ॥३६॥ अर्थ-हे गोपाल राय ! मैं चरण तजकर नही जाऊँगा । मेरे मोहन तुम्हे मथुरा मे छोड़कर ब्रज में जाकर क्या लूंगा । यशोदा जब सम्मुख उठकर आयेगी तो उनसे क्या कहूँगा । प्रातःकाल दही के मन्थन को छोड़कर किसे कलेवा देंगी । बारह वर्ष तक हमने (तुम्हारे) इस प्रताप को विना जाने तुमसे धृष्टता की । अब तुम वसुदेव के पुत्र के रूप मे प्रकट हुए हो, गर्ग के वचनों को (तुमने) (अपने असाधारण कृत्यों द्वारा) प्रमाणित कर दिया । शत्रुओ को मारकर सभी कार्यों को क्यों किया और आपदाएँ क्यों नष्ट की। कमल-कर से पर्वत को डाल क्यों न दिया । (जिससे) सब ब्रजवासी दबकर मर जाते । (अब) दिन मे सभी सखाओ को लेकर पुकार-पुकार कर गाये नही चराओगे । जब