भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 227

२२६ सूरसागर सार सटीक माया, मोह, मिलन और वियोग इन्ही मे संसार नष्ट होता है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के निष्ठुर वचन सुनकर (नन्द के) नेत्रो मे आंसू छा गये ॥३४॥ नद बिदा होइ घोष सिधारौ । बिछुरन मिलन रच्यौ विधि ऐसौ, यह सकोच निवारौ । कहियौ जाइ जसोदा आगेँ, नैंन नीर जनि ढारौ । सेवा करी जानि सुत अपनौ, कियौ प्रतिपाल हमारौ । हमैँ तुम्हें अन्तर कछु नाहीँ, तुम जिय ज्ञान बिचारौ । सूरदास प्रभु यह बिनती है, उर जनि प्रीति बिसारौ ॥३५॥ अर्थ-हे नन्द ! विदा होकर गाँव को प्रस्थान करो । वियोग और मिलन ब्रह्मा ने इसी तरह रचा है, इस संकोच का निवारण करो (भूल जाओ) । यशोदा के आगे जाकर कहना कि नेत्रों से जल न ढुलकाये । अपना पुत्र समझकर उन्होने हमारी सेवा की तथा हमारा प्रतिपालन किया । हममे तुममे कुछ भी अन्तर नही है, तुम मन मे ज्ञान का विचार करो । सूरदास के प्रभु की यह विनती है कि हृदय से प्रेम को भुला न देना ॥३५॥ गोपालराइ हौं न चरन तजि जैहौँ । तुमहिँ छोड़ि मधुबन मेरे मोहन, कहा जाइ ब्रज लैहौँ । कैहौँ कहा जाइ जसुमति सौँ, जब सन्मुख उठि ऐहै । प्रात समय दधि मथत छोड़ि कै, काहि कलेऊ दैहै । बारह बरस दियौ हम ढीठौ, यह प्रताप बिनु जाने । अब तुम प्रगट भए बसुद्यौ-सुत, गर्ग बचन परमाने । रिपु हति काज सबै कत कीन्हौ, कत आपदा विनासी । डारि न दियौ कमल कर तैँ गिरि, दबि मरते ब्रजवासी । बासर सग सखा सब लीन्हे, टेरि न धेनु चरैहौ । क्यौं रहिहैँ मेरे प्रान दरस बिनु, जब संध्या नहिँ ऐहौ । ऊरध स्वाँस चरन गति थाकी, नैन नीर भरआइ । सूर नंद बिछुरत की वेदनि, मो पै कही न जाइ ॥३६॥ अर्थ-हे गोपाल राय ! मैं चरण तजकर नही जाऊँगा । मेरे मोहन तुम्हे मथुरा मे छोड़कर ब्रज में जाकर क्या लूंगा । यशोदा जब सम्मुख उठकर आयेगी तो उनसे क्या कहूँगा । प्रातःकाल दही के मन्थन को छोड़कर किसे कलेवा देंगी । बारह वर्ष तक हमने (तुम्हारे) इस प्रताप को विना जाने तुमसे धृष्टता की । अब तुम वसुदेव के पुत्र के रूप मे प्रकट हुए हो, गर्ग के वचनों को (तुमने) (अपने असाधारण कृत्यों द्वारा) प्रमाणित कर दिया । शत्रुओ को मारकर सभी कार्यों को क्यों किया और आपदाएँ क्यों नष्ट की। कमल-कर से पर्वत को डाल क्यों न दिया । (जिससे) सब ब्रजवासी दबकर मर जाते । (अब) दिन मे सभी सखाओ को लेकर पुकार-पुकार कर गाये नही चराओगे । जब