सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमथुरा गमन २२७
शाम को नही आओगे तो दर्शन के बिना मेरे प्राण कैसे रहेगे । (नन्द के) ऊर्ध्व उच्छ्वास (आने लगे), चरण की गति थकित हो गयी तथा नेत्रों में आंसू भर आये । आंखो मे पानी आ जाने के कारण धूमिल दिखने लगा । सूरदास कहते है कि नन्द के विछुड़ते समय की वेदना मुझसे कही नही जाती ॥३६॥ (मेरे) मोहन तुमहिं बिना नहिं जैहौं । महरि दौरि आगे जब ऐहै, कहा ताहि मैं कहौँ । माखन मथि राख्यो ह्वै है, तुम हेत, चलो मेरे बारे । निठुर भए मधुपुरी आइ कै, काहँ असुरनि मारे । सुख पायौ वसुदेव देवकी, अरु सुख सुरनि दियौ । यहै कहत नंद गोप सखा सब, बिदरन चहत हियौँ । तब माया जड़ता उपजाई, निठुर भए जदुआइ । सूर नंद परमोधि पठाए, निठुर ठगौरी लाइ ॥३७॥ अर्थ-(मेरे) मोहन ! तुम्हारे बिना मैं नहीं जाऊंगा । यशोदा दौड़कर जब आगे आयेगी तो उससे मैं क्या कहूँगा । माखन मथकर तुम्हारे लिए रखा होगा, मेरे बालक ! (तुम) चलो । मधुपुरी आकर निष्ठुर हो गये हो; असुरो को (तुमने) क्यो मारा । वसुदेव देवकी ने सुख प्राप्त किया और देवताओं को (तुमने) सुख दिया। सब गोप सखा तथा नन्द यही कहते हैं कि अब हृदय फटना चाहता है। तब कृष्ण ने माया की जड़ता उत्पन्न कर दी (तथा) (वे) स्वयं निष्ठुर हो गये । सूरदास कहते है कि निष्ठुर जादू द्वारा नन्द को समझा कर भेज दिया ॥३७॥ उठे कहि माधौ इतनी बात । जिते मान सेवा तुम कीन्हौ, बदलौ दयौ न जात । पुत्र हेत प्रतिपार कियौ तुम, जैसँ जननी तात । गोकुल वसत हँसत खेलत मोहिं, द्योस न जान्यौ जात । होहु विदा घर जाहु गुसाईं, माने रहियौ नात । ठाढ़ौँ थक्यो उतर नहिं आवै, लोचन जल न समात । भए बल-हीन खोन तन कंपित, ज्यौँ बयारि बस पात । धकधकात हिय बहुत सूर उठि, चले नंद पछितात्त ॥३८॥ अर्थ-कृष्ण ये बाते कह उठे । "तुमने जितनी अधिक (मेरी) सेवा की उसका बदला नही दिया जा सकता । पुत्र समझ कर तुमने माता-पिता की तरह पालन-पोषण किया । गोकुल मे रहते, हँसते-खेलते मुझे दिन (बीतता) नही जान पड़ता था। हे गोसाईं (पूज्य) विदा होकर घर जाइये, सम्बन्ध मानते रखियेगा।" खड़े-खडे (नन्द) थकित हो गये, कुछ उत्तर नही आता तथा आँखों में जल (आंसू) नही समाते थे, (नन्द) बलहीन तथा क्षीण हो गये । शरीर कांपने लगा जैसे हवा के वश मे पत्ता हो। सूरदास कहते हैं कि नन्द का हृदय बहुत धधकता है तथा वह पछताते हुए चल पड़े ॥३८॥