सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमथुरा गमन २२५ या दास कौन है, या प्रभु तथा दास निप्रभु कौन है (कृष्ण-ब्रह्म के लिए यह सब भेद- भाव कुछ महत्व नही रखता है)। जिसके एक रोम के बराबर अखिल ब्रह्माण्ड है। जहाँ जिस हृदय में सच्चा भाव है कृष्ण जी वही है। जिसके मस्तक पर प्रभु की कृपा है वही भाग्यशाली है। दास-दासी कृष्ण के भजन से जीवित रहते हैं। वह कृष्ण दासी अब लक्ष्मी के समान हो गयी । सूरदास कहते हैं कि वह प्रेम रूपी चन्दन लगाकर सूर के प्रभु से मिली (उसके प्रेम से) उसने कोटि जप तथा काशी में किये जाने वाले कोटि तप को कर डाला (अर्थात् इतना फल प्राप्त कर लिया) ॥३२॥ मथुरा दिन-दिन अधिक बिराजै । तेज प्रताप राइ केसौं कैँ, तीनि लोक पर गाजै । पग पग तीरथ कोटिक राजैं, मधि विश्राति बिराजै । करि अस्नान प्रात जमुना कौ, जनम मरन भय भाजै । बिट्ठल विपुल बिनोद बिहारन, ब्रज कौ बसिबौ छाजै । सूरदास सेवक उनहीं कौ, कृपा सु गिरिधर राजै ॥३३॥ अर्थ-मथुरा दिन प्रतिदिन अधिक शोभित हो रही है। राजा कृष्ण का तेज (तथा) प्रताप तीनो लोको मे घोषित हो रहा है। पग-पग पर करोड़ो तीर्थ शोभित है, (तथा) मध्य मे विश्राति विराज रही है। प्रातः यमुना का स्नान करने पर जन्म-मरण का भय भाग जाता है । विट्ठल की अनेक विनोद की क्रीड़ास्थलियो मे रहना अच्छा लगता है । सूरदास उन्ही के सेवक है, कृष्ण की कृपा (उन पर) राज कर रही है ॥३३॥ नन्द का ब्रज प्रत्यागमन वेगि ब्रज कौं फिरिए नँदराइ । हमहिं तुमहिं सुत तात कौ नातौ, ओर पर्यौ हैँ आइ । बहुत कियौ प्रतिपाल हमारौ, सो नहिं जी तैँ जाइ । जहाँ रहैं तहँ तहाँ तुम्हारे, डारचौ जनि बिसराइ । जननि जसोदा भेंटि सखा सब, मिलियौँ कण्ठ लगाइ । साधु समाज निगम जिनके गुन, मेरैं गनि न सिराइ । माया मोह मिलन अरु विछुरन, ऐसैं ही जग छाइ । सूर स्याम के निठुर वचन सुनि, रहे नैन जल छाइ ॥३४॥ अर्थ-नन्दराय ! शीघ्र ही ब्रज को वापस चले जाइये । हमारा तुम्हारा पुत्र और पिता का सम्बन्ध अन्त को आ गया है। (तुमने) हमारा बहुत पोषण किया है, वह मन से नही जाता । जहाँ जहाँ रहूँगा वहाँ-वहाँ तुम्हारा ही रहूँगा, (इसे) भुला मत देना । माता यशोदा और सखाओं से भेंटकर कंठ लगाकर मिलना । जिनके गुणो की साधु-समाज तथा वेदों ने (बताया है) वे मेरे द्वारा गिनने से समाप्त होने वाले नही हैं । १५