भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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२२४ सूरसागर सार सटीक मातु देवकी परम मुदित ह्वै, देति निछावरि वारि। सूरदास की यहै आसिषा, चिर जियौ नंदकुमार ॥३०॥ अर्थ—वसुदेव ने कुल के व्यवहार को विचार कर छह प्रकार के रसो से युक्त भोजन कराके कृष्ण और हलधर को जनेऊ दिया। जिनके सांस तथा उच्छवास लेने से चारो वेद प्रकट हुए उन्होने ही गर्ग से गायत्री (मंत्र) पढी। प्रभु की गति अगम तथा अपार है। सभी आभूषणों के साथ विधि-पूर्वक ब्राह्मणो को बहुत सी गायें प्रदान की गयी। यदुकुल अत्यधिक प्रसन्न हुआ, जहाँ-तहाँ स्त्रियाँ गाती हैं। माता देवकी अत्यधिक प्रसन्न होकर उतार कर (धन को कृष्ण-बलराम सिर के चारो ओर घुमाकर) निछावर देती हैं। सूरदास ने यही आशीष दी (कि) नद कुमार चिरकाल तक जीवित रहें ॥३०॥ कुबरी पूरव तप करि राख्यो । आए स्याम भवन ताही कैं, नृपति महल सब नाख्यौ । प्रथमहिं धनुष तोरि आवत हे, बीच मिली यह धाइ । तिहिं अनुराग वस्य भए ताकैं, सी हित कह्यो न जाइ । देव काज हरि आवन कहि गए, दैन्हौ रूप अपार । कृपा दृष्टि चितवतहीँ श्री भइ, निगम न पावत पार । हम तैँ दूरि दीन के पाछैं, ऐसे दीनदयाल । सूर सुरनि करि काज तुरतहीँ, आवत तहाँ गोपाल ॥३१॥ अर्थ—कुबरी ने पूर्व जन्म में तप कर रखा था। कृष्ण ने राजा के समस्त महलो को नष्ट किया (और) उसी के भवन आये। प्रथम ही धनुष तोड़कर आते थे, (हे) (यह) बीच मे ही दौडकर मिल गयी। उसी अनुराग के कारण उसके वश मे हो गये, यह स्नेह कहते नही बनता। (कृष्ण जी) देव कार्य करके (उससे) आने के लिए कह गये थे, (उन्होने) उसे अपार रूप दे दिया। कृपा की दृष्टि से देखते ही शोभा छा गयी, निगम पार नही पाते। अहंकार से दूर तथा दीन के पीछे रहने वाले (कृष्ण) ऐसे ही दीन दयालु हैं ! सूरदास कहते हैं कि देवताओं के कार्य को करके गोपाल वहां तुरन्त ही आये ॥३१॥ कियौ सुर-काज गृह चले ताकैं । पुरुष औ नारि कौ भेद भेदा नहीं, कुलिन अकुलीन अवतरचौ काकैं । दास दासी कौन, प्रभु निप्रभु कौन है, अखिल ब्रह्मांड इक रोम जाकैं । भाव साँचौ हृदय जहाँ, हरि तहाँ हैं, कृपा प्रभु की माथ भाग वाकैं । दास दासी स्याम भजनहु तैं जिये, रमा सम भई सो कुब्जदासी । मिली वह सूर प्रभु प्रेम चंदन चरचि, कियौ जप कोटि,तप कोटि कासी ॥३२॥ अर्थ—देवताओ का कार्य करके उसके घर चले उसके (कृष्ण-ब्रह्म) लिए पुरुष और स्त्री का भेद नही, कुलीन या अकुलीन किसके यहाँ अवतरित नही हुए हैं। दासी,