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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

२२४ सूरसागर सार सटीक मातु देवकी परम मुदित ह्वै, देति निछावरि वारि। सूरदास की यहै आसिषा, चिर जियौ नंदकुमार ॥३०॥ अर्थ—वसुदेव ने कुल के व्यवहार को विचार कर छह प्रकार के रसो से युक्त भोजन कराके कृष्ण और हलधर को जनेऊ दिया। जिनके सांस तथा उच्छवास लेने से चारो वेद प्रकट हुए उन्होने ही गर्ग से गायत्री (मंत्र) पढी। प्रभु की गति अगम तथा अपार है। सभी आभूषणों के साथ विधि-पूर्वक ब्राह्मणो को बहुत सी गायें प्रदान की गयी। यदुकुल अत्यधिक प्रसन्न हुआ, जहाँ-तहाँ स्त्रियाँ गाती हैं। माता देवकी अत्यधिक प्रसन्न होकर उतार कर (धन को कृष्ण-बलराम सिर के चारो ओर घुमाकर) निछावर देती हैं। सूरदास ने यही आशीष दी (कि) नद कुमार चिरकाल तक जीवित रहें ॥३०॥ कुबरी पूरव तप करि राख्यो । आए स्याम भवन ताही कैं, नृपति महल सब नाख्यौ । प्रथमहिं धनुष तोरि आवत हे, बीच मिली यह धाइ । तिहिं अनुराग वस्य भए ताकैं, सी हित कह्यो न जाइ । देव काज हरि आवन कहि गए, दैन्हौ रूप अपार । कृपा दृष्टि चितवतहीँ श्री भइ, निगम न पावत पार । हम तैँ दूरि दीन के पाछैं, ऐसे दीनदयाल । सूर सुरनि करि काज तुरतहीँ, आवत तहाँ गोपाल ॥३१॥ अर्थ—कुबरी ने पूर्व जन्म में तप कर रखा था। कृष्ण ने राजा के समस्त महलो को नष्ट किया (और) उसी के भवन आये। प्रथम ही धनुष तोड़कर आते थे, (हे) (यह) बीच मे ही दौडकर मिल गयी। उसी अनुराग के कारण उसके वश मे हो गये, यह स्नेह कहते नही बनता। (कृष्ण जी) देव कार्य करके (उससे) आने के लिए कह गये थे, (उन्होने) उसे अपार रूप दे दिया। कृपा की दृष्टि से देखते ही शोभा छा गयी, निगम पार नही पाते। अहंकार से दूर तथा दीन के पीछे रहने वाले (कृष्ण) ऐसे ही दीन दयालु हैं ! सूरदास कहते हैं कि देवताओं के कार्य को करके गोपाल वहां तुरन्त ही आये ॥३१॥ कियौ सुर-काज गृह चले ताकैं । पुरुष औ नारि कौ भेद भेदा नहीं, कुलिन अकुलीन अवतरचौ काकैं । दास दासी कौन, प्रभु निप्रभु कौन है, अखिल ब्रह्मांड इक रोम जाकैं । भाव साँचौ हृदय जहाँ, हरि तहाँ हैं, कृपा प्रभु की माथ भाग वाकैं । दास दासी स्याम भजनहु तैं जिये, रमा सम भई सो कुब्जदासी । मिली वह सूर प्रभु प्रेम चंदन चरचि, कियौ जप कोटि,तप कोटि कासी ॥३२॥ अर्थ—देवताओ का कार्य करके उसके घर चले उसके (कृष्ण-ब्रह्म) लिए पुरुष और स्त्री का भेद नही, कुलीन या अकुलीन किसके यहाँ अवतरित नही हुए हैं। दासी,

५. मथुरा गमन एवं विरह

मथुरा गमन २२५ या दास कौन है, या प्रभु तथा दास निप्रभु कौन है (कृष्ण-ब्रह्म के लिए यह सब भेद- भाव कुछ महत्व नही रखता है)। जिसके एक रोम के बराबर अखिल ब्रह्माण्ड है। जहाँ जिस हृदय में सच्चा भाव है कृष्ण जी वही है। जिसके मस्तक पर प्रभु की कृपा है वही भाग्यशाली है। दास-दासी कृष्ण के भजन से जीवित रहते हैं। वह कृष्ण दासी अब लक्ष्मी के समान हो गयी । सूरदास कहते हैं कि वह प्रेम रूपी चन्दन लगाकर सूर के प्रभु से मिली (उसके प्रेम से) उसने कोटि जप तथा काशी में किये जाने वाले कोटि तप को कर डाला (अर्थात् इतना फल प्राप्त कर लिया) ॥३२॥ मथुरा दिन-दिन अधिक बिराजै । तेज प्रताप राइ केसौं कैँ, तीनि लोक पर गाजै । पग पग तीरथ कोटिक राजैं, मधि विश्राति बिराजै । करि अस्नान प्रात जमुना कौ, जनम मरन भय भाजै । बिट्ठल विपुल बिनोद बिहारन, ब्रज कौ बसिबौ छाजै । सूरदास सेवक उनहीं कौ, कृपा सु गिरिधर राजै ॥३३॥ अर्थ-मथुरा दिन प्रतिदिन अधिक शोभित हो रही है। राजा कृष्ण का तेज (तथा) प्रताप तीनो लोको मे घोषित हो रहा है। पग-पग पर करोड़ो तीर्थ शोभित है, (तथा) मध्य मे विश्राति विराज रही है। प्रातः यमुना का स्नान करने पर जन्म-मरण का भय भाग जाता है । विट्ठल की अनेक विनोद की क्रीड़ास्थलियो मे रहना अच्छा लगता है । सूरदास उन्ही के सेवक है, कृष्ण की कृपा (उन पर) राज कर रही है ॥३३॥ नन्द का ब्रज प्रत्यागमन वेगि ब्रज कौं फिरिए नँदराइ । हमहिं तुमहिं सुत तात कौ नातौ, ओर पर्यौ हैँ आइ । बहुत कियौ प्रतिपाल हमारौ, सो नहिं जी तैँ जाइ । जहाँ रहैं तहँ तहाँ तुम्हारे, डारचौ जनि बिसराइ । जननि जसोदा भेंटि सखा सब, मिलियौँ कण्ठ लगाइ । साधु समाज निगम जिनके गुन, मेरैं गनि न सिराइ । माया मोह मिलन अरु विछुरन, ऐसैं ही जग छाइ । सूर स्याम के निठुर वचन सुनि, रहे नैन जल छाइ ॥३४॥ अर्थ-नन्दराय ! शीघ्र ही ब्रज को वापस चले जाइये । हमारा तुम्हारा पुत्र और पिता का सम्बन्ध अन्त को आ गया है। (तुमने) हमारा बहुत पोषण किया है, वह मन से नही जाता । जहाँ जहाँ रहूँगा वहाँ-वहाँ तुम्हारा ही रहूँगा, (इसे) भुला मत देना । माता यशोदा और सखाओं से भेंटकर कंठ लगाकर मिलना । जिनके गुणो की साधु-समाज तथा वेदों ने (बताया है) वे मेरे द्वारा गिनने से समाप्त होने वाले नही हैं । १५

२२६ सूरसागर सार सटीक माया, मोह, मिलन और वियोग इन्ही मे संसार नष्ट होता है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के निष्ठुर वचन सुनकर (नन्द के) नेत्रो मे आंसू छा गये ॥३४॥ नद बिदा होइ घोष सिधारौ । बिछुरन मिलन रच्यौ विधि ऐसौ, यह सकोच निवारौ । कहियौ जाइ जसोदा आगेँ, नैंन नीर जनि ढारौ । सेवा करी जानि सुत अपनौ, कियौ प्रतिपाल हमारौ । हमैँ तुम्हें अन्तर कछु नाहीँ, तुम जिय ज्ञान बिचारौ । सूरदास प्रभु यह बिनती है, उर जनि प्रीति बिसारौ ॥३५॥ अर्थ-हे नन्द ! विदा होकर गाँव को प्रस्थान करो । वियोग और मिलन ब्रह्मा ने इसी तरह रचा है, इस संकोच का निवारण करो (भूल जाओ) । यशोदा के आगे जाकर कहना कि नेत्रों से जल न ढुलकाये । अपना पुत्र समझकर उन्होने हमारी सेवा की तथा हमारा प्रतिपालन किया । हममे तुममे कुछ भी अन्तर नही है, तुम मन मे ज्ञान का विचार करो । सूरदास के प्रभु की यह विनती है कि हृदय से प्रेम को भुला न देना ॥३५॥ गोपालराइ हौं न चरन तजि जैहौँ । तुमहिँ छोड़ि मधुबन मेरे मोहन, कहा जाइ ब्रज लैहौँ । कैहौँ कहा जाइ जसुमति सौँ, जब सन्मुख उठि ऐहै । प्रात समय दधि मथत छोड़ि कै, काहि कलेऊ दैहै । बारह बरस दियौ हम ढीठौ, यह प्रताप बिनु जाने । अब तुम प्रगट भए बसुद्यौ-सुत, गर्ग बचन परमाने । रिपु हति काज सबै कत कीन्हौ, कत आपदा विनासी । डारि न दियौ कमल कर तैँ गिरि, दबि मरते ब्रजवासी । बासर सग सखा सब लीन्हे, टेरि न धेनु चरैहौ । क्यौं रहिहैँ मेरे प्रान दरस बिनु, जब संध्या नहिँ ऐहौ । ऊरध स्वाँस चरन गति थाकी, नैन नीर भरआइ । सूर नंद बिछुरत की वेदनि, मो पै कही न जाइ ॥३६॥ अर्थ-हे गोपाल राय ! मैं चरण तजकर नही जाऊँगा । मेरे मोहन तुम्हे मथुरा मे छोड़कर ब्रज में जाकर क्या लूंगा । यशोदा जब सम्मुख उठकर आयेगी तो उनसे क्या कहूँगा । प्रातःकाल दही के मन्थन को छोड़कर किसे कलेवा देंगी । बारह वर्ष तक हमने (तुम्हारे) इस प्रताप को विना जाने तुमसे धृष्टता की । अब तुम वसुदेव के पुत्र के रूप मे प्रकट हुए हो, गर्ग के वचनों को (तुमने) (अपने असाधारण कृत्यों द्वारा) प्रमाणित कर दिया । शत्रुओ को मारकर सभी कार्यों को क्यों किया और आपदाएँ क्यों नष्ट की। कमल-कर से पर्वत को डाल क्यों न दिया । (जिससे) सब ब्रजवासी दबकर मर जाते । (अब) दिन मे सभी सखाओ को लेकर पुकार-पुकार कर गाये नही चराओगे । जब

मथुरा गमन २२७

शाम को नही आओगे तो दर्शन के बिना मेरे प्राण कैसे रहेगे । (नन्द के) ऊर्ध्व उच्छ्वास (आने लगे), चरण की गति थकित हो गयी तथा नेत्रों में आंसू भर आये । आंखो मे पानी आ जाने के कारण धूमिल दिखने लगा । सूरदास कहते है कि नन्द के विछुड़ते समय की वेदना मुझसे कही नही जाती ॥३६॥ (मेरे) मोहन तुमहिं बिना नहिं जैहौं । महरि दौरि आगे जब ऐहै, कहा ताहि मैं कहौँ । माखन मथि राख्यो ह्वै है, तुम हेत, चलो मेरे बारे । निठुर भए मधुपुरी आइ कै, काहँ असुरनि मारे । सुख पायौ वसुदेव देवकी, अरु सुख सुरनि दियौ । यहै कहत नंद गोप सखा सब, बिदरन चहत हियौँ । तब माया जड़ता उपजाई, निठुर भए जदुआइ । सूर नंद परमोधि पठाए, निठुर ठगौरी लाइ ॥३७॥ अर्थ-(मेरे) मोहन ! तुम्हारे बिना मैं नहीं जाऊंगा । यशोदा दौड़कर जब आगे आयेगी तो उससे मैं क्या कहूँगा । माखन मथकर तुम्हारे लिए रखा होगा, मेरे बालक ! (तुम) चलो । मधुपुरी आकर निष्ठुर हो गये हो; असुरो को (तुमने) क्यो मारा । वसुदेव देवकी ने सुख प्राप्त किया और देवताओं को (तुमने) सुख दिया। सब गोप सखा तथा नन्द यही कहते हैं कि अब हृदय फटना चाहता है। तब कृष्ण ने माया की जड़ता उत्पन्न कर दी (तथा) (वे) स्वयं निष्ठुर हो गये । सूरदास कहते है कि निष्ठुर जादू द्वारा नन्द को समझा कर भेज दिया ॥३७॥ उठे कहि माधौ इतनी बात । जिते मान सेवा तुम कीन्हौ, बदलौ दयौ न जात । पुत्र हेत प्रतिपार कियौ तुम, जैसँ जननी तात । गोकुल वसत हँसत खेलत मोहिं, द्योस न जान्यौ जात । होहु विदा घर जाहु गुसाईं, माने रहियौ नात । ठाढ़ौँ थक्यो उतर नहिं आवै, लोचन जल न समात । भए बल-हीन खोन तन कंपित, ज्यौँ बयारि बस पात । धकधकात हिय बहुत सूर उठि, चले नंद पछितात्त ॥३८॥ अर्थ-कृष्ण ये बाते कह उठे । "तुमने जितनी अधिक (मेरी) सेवा की उसका बदला नही दिया जा सकता । पुत्र समझ कर तुमने माता-पिता की तरह पालन-पोषण किया । गोकुल मे रहते, हँसते-खेलते मुझे दिन (बीतता) नही जान पड़ता था। हे गोसाईं (पूज्य) विदा होकर घर जाइये, सम्बन्ध मानते रखियेगा।" खड़े-खडे (नन्द) थकित हो गये, कुछ उत्तर नही आता तथा आँखों में जल (आंसू) नही समाते थे, (नन्द) बलहीन तथा क्षीण हो गये । शरीर कांपने लगा जैसे हवा के वश मे पत्ता हो। सूरदास कहते हैं कि नन्द का हृदय बहुत धधकता है तथा वह पछताते हुए चल पड़े ॥३८॥

७२८ सूरसागर सार सटीक बार-बार मग जोवति माता । व्याकुल विनु मोहन वल-भ्राता ॥ आवत देखि गोप नँद साथा । विवि बालक विनु भई अनाथा ॥ धाई धेनु बच्छ ज्यों ऐसेँ । माखन बिना रहे धौं कैसें ॥ ब्रज-नारी हरषित सब धाईँ । महरि जहाँ-तहँ आतुर आईँ ॥ हरषित मातु रोहिनी आई । उर भरि हलधर लेउँ कन्हाई ॥ देखे नन्द गोप सब देखे । वल मोहन कौँ तहाँ न पेखे ॥ आतुर मिलन-काज ब्रज नारी । सूर मधुपुरी रहे मुरारी ॥३६॥ अर्थ—बार-बार माता रास्ता निहारती है और मोहन तथा उनके भाई बलराम के विना व्याकुल होती है। गोपों को नन्द के साथ आते देखकर तथा (उनके साथ) दोनो बालकों को न (देख) अनाथ (असहाय) हो गयी । गाय जैसे बछडे को देखकर दोडती है, वैसे ही यशोदा दौड़ी और पूछा कि कृष्ण मक्खन के बिना कैसे रहते है ? ब्रज की स्त्रियां हर्षित होकर दौड़ी जहां-तहां से ग्वालिने आतुर होकर आयी । माता रोहिणी हर्षित होकर आयी कि कृष्ण ओर बलराम को हृदय से लगा लूं । उन्होने नन्द को देखा, सब गोपो को देखा, लेकिन कृष्ण और बलराम को वहाँ नही देखा । मिलने के लिये ब्रज की नारियां आतुर है, (किन्तु) सूरदास कहते है कि कृष्ण तो मधुपुरी मे ही रुक गये ॥३६॥ उलटि पग कैसेँ दीन्हौ नंद । छाँड़े कहाँ उभै सुत मोहन, धिक जीवन मतिमंद । कै तुम धन-जोबन-मद माते, कै तुम छूटे वद । सुफलक-सुत वैरी भयौ हमकौँ, लै गयौ आनंदकंद । राम कृष्ण बिन कैसेँ जीजै, कठिन प्रीति कै फद । सूरदास मैं भई अभागिन, तुम बिनु गोकुलकंद ॥४०॥ अर्थ— (यशोदा कहती हैं) हे नंद ! तुमने उलट कर पग कैसे रखा (अर्थात् तुम प्रत्यावर्तित कैसे हुए) ? दोनो मनमोहन-पुत्रो को कहां छोड़ दिया ? मन्द बुद्धि वाले ! तुम्हारा जीवन धिक्कार है ! क्या तुम धन-योवन के मद से मत्त हो अथवा क्या तुम बन्दीगृह से छूटे हो । अक्रूर हमारे वैरी हो गये, जो आनन्दकंद कृष्ण को ले गये । बलराम और कृष्ण के बिना कैसे जीवित रहे, प्रीति का फंडा बहुत मजबूत है । सूर- दास कहते हैं कि गोकुलचंद तुम्हारे बिना मैं अभागिन हो गयो हूँ ॥४०॥ दोउ ढोटा गोकुल-नायक मेरे । काहैँ नद छाँड़ि तुम आए, प्रान-जिवन सब केरे । तिनकें जात बहुत दुख पायौ, रोर परो इहिँ खेरे । गोसुत गाइ फिरत हैं दहँ दिसि, वै न चरैं तृन घेरे ।

मथुरा गमन २२६ प्रीति न केरी राम दसरथ की, प्रान तजे बिनु हेरैँ । सूर नंद सौं कहति जसोदा, प्रबल पाप सब मेरैं ॥४१॥ अर्थ- मेरे दोनो लड़के गोकुल के नायक हैं। सबके प्राणो को जिलाने वाले (उन बालकों को) नन्द तुम क्यो छोड़कर चले आये। उनके जाते समय बहुत दुख हुआ, इस गांव में कोलाहल मच गया था। गोकुल मे गाय और बछडे दसो दिशाओ मे घूम रहे है, वे घेर रखने पर भी तृण नही चरते। दशरथ तथा राम की प्रीति तुमने नही की, जिन्होंने (राम को) न देखकर प्राण ही त्याग दिया था। सूरदास कहते हैं कि नन्द से यशोदा कहती हैं कि यह सब मेरे प्रबल पाप का (परिणाम) है ॥४१॥ नंद कहौ हो कहाँ छाँड़े हरि । लै जु गए जैसेँ तुम ह्वाँतैं, ल्याए किन वैसहिँ आगैं धरि । पालि पोषि मैं किए सयाने, जिन मारे गज मल्ल कंस अरि । अब भए तात देवकी वसुद्यौ, बाँह पकरि ल्याये न न्याव करि । देखौ दूध दही घृत माखन, मैँ राखे सब वैसैं ही धरि । अब को खाइ नंदनंदन बिनु, गोकुल मनि मथुरा जु गए हरि । श्रीमुख देखन कौ ब्रजवासी, रहे ते घर आँगन मेरैं भरि । सूरदास प्रभु के जु संदेसे, कहे महर आँसू गदगद करि ॥४२॥ अर्थ--नन्द, कहो ! (तुमने) कृष्ण को कहां छोडा। जैसे तुम यहाँ से ले गये थे वैसे ही आगे करके क्यो नही लाये । पाल-पोसकर (मैंने) उन्हे बड़ा किया, जिन्होने हाथी, मल्ल, तथा शत्रु कंस को मारा। अब उनके माता-पिता देवकी और वसुदेव हो गये ! न्याय करके तुम हाथ पकड़कर (उन्हे) क्यो नही लाये। देखो मैंने दूध, दही, घी तथा मक्खन सब वैसे ही रख छोड़ा है। अब कृष्ण के वियोग मे (उन्हे) कौन खाय क्योंकि गोकुलमणि कृष्ण मथुरा चले गये। श्रीमुख को देखने के लिए ब्रज के निवासी मेरे आंगन मे भरे हैं। सूरदास कहते हैं कि प्रभु (कृष्ण) के संदेश को नन्द ने आंसू भरकर गद्गद स्वर मे कहा ॥४२॥ जसुदा कान्ह कान्ह कै बूझै। फूटि न गईं तुम्हारी चारों, कैसेँ मारग सूझै । इक तौ जरी जात बिनु देखैं, अब तुम दीन्हौ फूँकि । यह छतिया मेरे कान्ह कुंवर बिनु, फटि न भई द्वै टूक । धिक तुम धिक ये चरन अहौ पति,अध वोलत उठि धाए। सूर स्याम बिछुरन की हम पै, दैन बधाई आए ॥४३॥ अर्थ- यशोदा 'कृष्ण-कृष्ण' कहकर पूछती हैं। तुम्हारी चारों आंखें (चर्मचक्षु तथा ज्ञानचक्षु) फूट क्यो नही गईं, तुम्हे मार्ग कैसे दिखाई दिया। एक तो बिना देखे जली जा रही हूँ, अब तुमने और भी संतप्त कर दिया। यह छाती मेरे कुंवर कृष्ण के बिना फटकर दो टूक क्यों नही हो गयी। अहो पति ! तुम धिक् हो तथा तुम्हारे चरणों

२३० सूरसागर सार सटीक को धिक्कार है, जो आधा कहते ही उठकर दौड़ पड़े। (जल्दी वापस चल पड़े) । सूरदास कहते हैं (यशोदा कहती हैं) कि कृष्ण के बिछुड़ने पर हमे बधाई देने चले आये ॥४३॥ नंद हरि तुमसौँ कहा कह्यौ । सुनि सुनि निठुर बचन मोहन के, कैसैँ हृदय रह्यौ । छाँड़ि सनेह चले मंदिर कत, दौरि न चरन गह्यौ । दरकि न गई बज्र की छाती, कत यह सूल सह्यौ । सुरति करत मोहन की वातैँ, नैननि नीर वह्यौ । सुधि न रही अति गलित गात भयौ, मन उसि गयौ अह्यौ । उन्हैँ छाँड़ि गोकुल कत आए, चाखन दूध दह्यौ । तजे न प्रान सूर दसरथ लौँ, हुतौ जन्म निवह्मो ॥४४॥ अर्थ— हे नन्द ! कृष्ण ने तुमसे क्या कहा। मोहन के निष्ठुर वचन सुनकर (तुम्हारा) हृदय कैसे (सुरक्षित) रहा। स्नेह छोड़कर घर की ओर कैसे चल पड़े, दौड़ कर (कृष्ण के) चरण क्यो नही पकड़े। तुम्हारी वज्र जैसी छाती दरक (फट) नही गयी, इस शूल को कैसे सहन किया। मोहन की बाते स्मरण करने से (यशोदा) के नेत्रो से आँसू बहने लगे । उन्हे कुछ स्मरण न रहा, शरीर अत्यधिक गलित (क्षीण) हो गया, मानो साँप उस गया हो । (यशोदा कहती है) उन्हें छोड़कर गोकुल मे दूध, दही चखने क्यो चले आये । दशरथ की तरह प्राण क्यों नही छोड़ दिये। अगर ऐसा किया होता तो (तुम्हारे) जीवन का निर्वाह हो गया होता ॥४४॥ कहाँ रह्यौ मेरौ मनमोहन । वह मूरति जिय तैँ नहिं बिसरति, अंग अंग सब सोहन । कान्ह बिना गौवैँ सब ब्याकुल, को ल्यावै भरि दोहन । माखन खात खवावत ग्वालनि, सखा लिए सब गोहन । जब वै लीला सुरति करति हौँ, चित चाहत उठि जोहन । सूरदास-प्रभु के बिछुरे तैँ, मरियत है अति छोहन ॥४५॥ अर्थ-मेरा मनमोहन कहाँ रह गया। वह मूर्ति प्राण से विस्मृत नही होती, उसके अंग-अंग सुशोभित थे । कृष्ण के बिना सभी गाये व्याकुल है, दोहनी भरकर कौन ले आये । सब सखाओं को साथ लेकर मक्खन खाते और खिलाते थे। जब उन लीलाओ को याद करती हूँ तो चित्त कहता है कि उठकर देखूं । सूरदास कहते हैं कि यशोदा कहती हैं कि मैं तो कृष्ण के वियोग के उत्पन्न होने से उनके अत्यधिक स्नेह से मरी जा रही हूँ ॥४५॥ गोपी बचन तथा ब्रजदशा ग्वारनि कही ऐसी जाइ । भए हरि मधुपुरी राजा, बड़े बंस कहाइ ।

२३४ सूरसागर सार सटीक कोमल चरन-कमल कंटक कुस, हम उन पै बन गाइ चराई। रंचक दधि कै काज जसोदा, बाँधे कान्ह उलूषन लाई। इंद्र-प्रकोप जानि ब्रज राखे, बरुन फाँस तैं मोहिं मुकराई। अपने तन-धन-लोभ कंस-डर, आगेँ कै दीन्हे दोउ भाई। निकट बसत कबहूँ न मिलि आये, इते मान मेरी निठुराई। सूर अजहूँ नाती मानत हैं, प्रेम सहित करैं नंद-दुहाई ॥५४॥ अर्थ—कृष्ण की सेवा मे चूक हो गयी। इस अपराध का कहाँ तक वर्णन करूँ; ऐसा कह कहकर महर नंद पछताते हैं। कोमल चरण-कमल (वाले कृष्ण) से हमने कुश, कंटक से युक्त वन मे गाय चरवाया। तनिक से दही के कारण यशोदा ने उन्हे ओखली से लाकर बांधा। इन्द्र के प्रकोप को जानकर (कृष्ण ने) ब्रज की रक्षा की, वरुण के फन्दे से मुक्त किया। अपने तन-धन के लोभ से तथा कंस के डर से दोनो भाइयों को (कंस के) आगे कर दिया। निकट ही तो थे, (किन्तु) इतनी बड़ी निष्ठुरता हममे थी कि कभी मिल नही आया। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण) अभी भी नाता मानते है, प्रेम सहित नन्द की दुहाई देते (रहते) है ॥५४॥ लै आवहु गोकुल गोपालहिँ । पाईंनि परि क्यों हूँ बिनती करि, छल बल बाहु विसालहिँ । अब की बार नैँकु दिखरावहु, नंद आपने लालहिँ । गाइनि गनत ग्वार गोसुत सँग, सिखवत बैन रसालहिँ । जद्यपि महाराज सुख संपति, कौन गनै मनि लालहिँ । तदपि सूर वै छिन न तजत हैं, वा घुँघची की मालहिँ ॥५५॥ अर्थ—कृष्ण को गोकुल ले जाओ। पांव पड़कर, विनती करके, छल से (या) बल-पूर्वक किसी प्रकार विशाल भुजाओं (वाले) (कृष्ण को) (ले जाओ)। अब की बार हे नन्द ! तनिक अपने लाल को दिखा दो। ग्वाल-बछड़ों के साथ गाय की गिनती करते थे तथा रस-युक्त वाणी (सबको) सिखाते थे। यद्यपि वे सुख सम्पत्ति के महाराज है, (उनके यहाँ) मणि और लालों की गिनती कौन करे; फिर भी वे (कृष्ण) घुंघची की माला कभी नही त्यागते ॥५५॥ हौं तौ माई मथुरा ही पै जैहौं । दासी ह्वै बसुदेव राइ की, दरसन देखत रैहौं । राखि राखि एते दिवसनि मोहिँ, कहा कियो तुम नीकी । सोऊ तौ अक्रूर गए लै, तनक खिलौना जी कौ । मोहिँ देखि कै लोग हसैँगे, अरु किन कान्ह हँसै । सूर असीस जाई दैहौं, जनि न्हातहु बार खसै ॥५६॥ अर्थ— सखी ! मैं तो मथुरा ही जाऊँगी। वसुदेव राजा की दासी होकर (कृष्ण) को देखती रहूँगी। इतने दिनो मुझे रख-रखकर मेरी कौन सी भलाई तुमने की। उन्हे

मधुरा गमनं २३५ तो अक्रूर लेकर गये, जो तनिक प्राणों के लिए खिलोने (बहलाने वाले) थे । मुझे देखकर लोग हंसी करेंगे और कृष्ण (ही) क्यो न हंसें। सूरदास कहते है (गोपी कहती है) कि जाकर कृष्ण को आशीर्वाद दूंगी कि नहाते समय भी उनका (कोई) बाल बांका न हो ॥५६॥ पंथी इतनी कहियौ बात । तुम बिनु इहाँ कुँवर वर मेरे, होत जिते उतपात । बकी अघासुर टरत न टारे, बालक बनहिँ न जात । ब्रज पिंजरी रुधि मानी राखे, निकसन कौँ अकुलात । गोपी गाइ सकल लघु दीरघ, पीत बरन कृस गात । परम अनाथ देखियत तुम बिनु, केहिँ अवलंबै तात । कान्ह कान्ह कै टेरत तब धौं, अब कैसैं जिय मानत । यह व्यवहार आजु लौँ है ब्रज, कपट नाट छल ठानत । दसहूँ दिसि तैं उदित होत हैं, दावानल के कोट । आखिनि मूँदि रहत सनमुख ह्वै, नाम-कवच दै ओट । ए सब दुष्ट हते हरि जेते, भए एकही पेट । सत्वर सूर सहाइ करौ अब, समुझि पुरातन हेट ॥५७॥ अर्थ-पथिक ! जाकर इतनी (बात) कहना कि हे श्रेष्ठ कुंवर ! तुम्हारे बिना यहाँ बड़ा उत्पात होता है। बकासुर तथा अघासुर टाले नही टलते, (जिसके कारण) बालक वन नही जाते। ब्रज रूपी पिंजडे मे मानो (वे) घेर कर रखे गये हैं तथा निकलने के लिए अकुलाते है। गोपी-गाय सभी छोटे-बडे पीले वर्ण के (तथा) दुबले हो गये है। तुम्हारे बिना सब परम अनाथ जान पड़ते हैं; हे तात ! (वे) किसका अवलंब ग्रहण करे। तब तो कान्ह-कान्ह कहकर पुकारते थे, अब जी कैसे माने। यह व्यवहार आज तक ब्रज में है, (शत्रु) कपट तथा छल का नाटक ठानते हैं। दशों दिशाओ से दावाग्नि का समूह उदित होता है। सम्मुख होकर नाम रूपी कवच का ओट ग्रहण करके, आंखे बन्द करके (सब) रह जाते है। एक ही पेट से ये सब दुष्ट उत्पन्न (हुए थे) जिन्हे हरि ने नष्ट किया था। सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) पुराने प्रेम का स्मरण कर कृष्ण शीघ्र सहायता करो ॥५७॥ संदेसौ देवकी सौँ कहियौ । हौँ तौ धाइ तिहारे सुत की, मया करत ही रहियौ । जदपि टेव तुम जानतिं उनकी, तऊ मोहिं कहि आवै । प्रात होत मेरे लाल लड़ैतैं, माखन रोटी भावै । तेल उबटनौ अरु तातौ जल, ताहि देखि भजि जाते । जोइ जोइ माँगत सोइ सोइ देती, क्रम क्रम करि कै न्हाते ।

२३६ सूरसागर सार सटीक सूर पथिक सुनि मोहिँ रैनि दिन, बढ़यौ रहत उर सोच। मेरौ अलक लड़ैतौ मांहन, ह्वैहै करत सँकोच ॥५८॥ अर्थ—देवकी से यह संदेश कहना। मैं तो तुम्हारे पुत्र की धाय ही हूँ, किन्तु (तुम) प्रेम करते ही रहना। यद्यपि तुम उनकी जिद जानती हो तो भी मुझे कहना ही पड़ रहा है कि प्रातः होते ही मेरे लाल को माखन-रोटी ही अच्छी लगती है। तेल उबटन तथा गर्म जल देखकर भाग जाते थे। जो-जो माँगते थे वही-वही देती थी, (तब कही) क्रम-क्रम (कठिनाई) से नहलाती थी। सूरदास कहते हैं (यशोदा कहती हैं) कि पथिक, सुनो ! मेरे हृदय में दिन-रात (इस बात का) सोच बढ़ता है कि मेरा दुलारा पुत्र सकोच करता होगा ॥५८॥ मेरे कुँवर कान्ह बिनु सब कुछ, वैसेहिँ धर्यौ रहै। को उठि प्रात होत लै माखन, को कर नेति गहै। सूने भवन जसोदा सुत के, गुन गुनि सूल सहै। दिन उठि घर घेरति ही ग्वारिनि, उरहन कोउ न कहै। जो ब्रज मैंँ आनंद हुतौ, मुनि मनसा हू न गहै। सूरदासी स्वामी बिनु गोकुल, कौड़ी हू न लहै ॥५६॥ अर्थ—मेरे कुँवर कृष्ण के बिना सब कुछ वैसे ही रखा रहता है। प्रातः उठकर कौन माखन ले और हाथ में रई की रस्सी ग्रहण करे। पुत्र से शून्य घर में (पुत्र की) याद करके यशोदा दुख सहती हैं। दिन में उठकर ग्वालिनियां घर घेरती थी, (किन्तु) अब कोई शिकायत नहीं करता। ब्रज में जो आनन्द था उसे मुनि मन में भी नहीं सोच पाते। सूरदास कहते हैं (यशोदा कहती हैं) कि कृष्ण के बिना गोकुल कौड़ी के बराबर आनन्द भी नहीं देता ॥५६॥ गोपी विरह चलत गुपाल के सब चले। यह प्रीतम सौँ प्रीति निरंतर, रहे न अर्ध पले। धीरज पहिल करी चलिबँ की, जैसी करत भले। धीर चलत मेरे नैननि देखे, तिहिँ छिनि आँसु हले। आँसु चलत मेरी वलयनि देखे, भए अंग सिथिले। मन चलि रह्यौ हुतौ पहिलैँ ही, चले सबै विमले। एक न चलै प्रान सूरज प्रभु, अस लेहु साल सले ॥६०॥ अर्थ-कृष्ण के चलते समय सभी (अंग) चल पड़े। प्रीतम से निरंतर प्रीति के कारण (कोई) आधे पल भी नहीं रुके । चलने के लिए धैर्य ने पहल की; जैसे भले आदमी करते हैं नेत्रो ने धैर्य को जाते देखा तो उसी क्षण (नेत्रो से) आंसू बहने लगे । आँसुओ के चलते ही मेरे बलयों (चूडियो) ने देखा, और (वे भी) अंग मे शिथिल हो गये (कलाइयो के पतली पड़ जाने के कारण चूड़ियां भी हाथ से गिर गईं !)। मन तो पहले ही चल

मथुरा गवन २३७ चुका था; (इस प्रकार) सभी पवित्र लोग चले गये। सूरदास कहते हैं (कि) (यद्यपि) बिना छेद किए हुए (अ-सलेहु) (अर्थात् अत्यन्त कठोर जड पदार्थ भी) (कृष्ण के विरह की) पीड़ा (साल) से बिध गए (द्रवो-भूत हो गए), (किन्तु) अकेले प्राण ही (अभी तक) नही चले (अर्थात् प्राणो का अन्त अभी नही हुआ !) ॥६०॥ करि गए थोरे दिन की प्रीति । कहँ वह प्रीति कहाँ यह बिछुरनि, कहँ मधुबन की रीति । अब की बेर मिलौ मनमोहन, बहुत भई विपरीति । कैसे प्राण रहत दरसन बिनु, मनहु गए जुग बीति । कृपा करहु गिरिधर हम ऊपर, प्रेम रह्यौ तन जीति । सूरदास प्रभु तुम्हारे मिलन बिनु, भईं भुस पर की भीति ॥६१॥ अर्थ-(कृष्ण) थोड़े दिन का प्रेम करके चले गये । कहां वह प्रेम और कहां यह वियोग, और कहाँ मधुवन का व्यवहार (ये सब आश्चर्य उत्पन्न करने वाले है) । अब की बार कृष्ण फिर मिलो क्योंकि हमारी (दशा) बहुत विपरीत हो गयी । प्राण दर्शन के बिना कैसे रहते हैं, (लगता है) मानो युग बीत गया हो । कृष्ण हम पर कृपा करो क्योकि प्रेम ने (हमारे शरीर पर) विजय पा ली है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि कृष्ण.! तुम्हारे मिलन के विना हम भूसेपर की दीवाल के समान हो गयी है ॥६१॥ प्रीति करि दीन्ही गरैं छुरी । जैसेँ बधिक चुगाइ कपट-कन, पाछैं करत बुरी । मुरली मधुर चेप काँपा करि, मोर चंद्र फँदवारि । बंक विलोकनि लगी, लोभ बस, सकी न पंख पसारि । तरफत छाँड़ि गए मधुबन कौं, बहुरि न कीन्ही सार । सूरदास प्रभु सग कलपतरु, उलटि न बैठी डार ॥६२॥ अर्थ-प्रेम करके गले में छूरी लगा दी । जिस प्रकार वधिक कपट रूपी दाने चुगाकर (पकड़ लेने) के बाद बुरी (गत) बनाता है। (वैसे ही कृष्ण ने) मुरली तथा मधुर ध्वनि को क्रमश: लासा तथा बांस की तांली बनाकर, (मुकुट के) मोर-चन्द्र के फंदे को डाल दिया । (हम लोग) लोभ-वश टेढी चितवन रूपी लग्गी (के कारण) पखों को फैला न सकी (अर्थात् हिल डुल न सकी) । फिर (कृष्ण) (हमे फंसाकर) तड़फती हुई छोड़कर मथुरा चले गये और फिर स्मरण नही किया । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है) कि प्रभु संग रूपी कल्पतरु को छोड़कर हम उलटकर उस डाल पर न बैठ सकी ॥६२॥ नाथ अनाथनि की सुधि लीजै । गोपी, ग्वाल, गाइ, गोसुत सब, दीन मलीन दिनहिँ दिन छीजैं । नैननि जलधारा बढ़ी अति, बूड़त ब्रज किन कर गहि लीजै । इतनी बिनती सुनहु हमारी, बारक हूँ पतिया लिखि दीजै ।

२३८ सूरसागर सार सटीक चरन कमल दरसन नव नवका, करुनासिंधु जगत जस लीजै । सूरदास प्रभु आस मिलन की, एक बार आवन ब्रज कीजै ॥६३॥ अर्थ—स्वामी ! (हम) अनाथों की याद कीजिए । गोपी, ग्वाल, गाय बछड़े सभी दीन, मलिन हो गये हैं तथा दिन प्रतिदिन क्षीण होते जा रहे हैं। नैनो मे जल- धारा इतनी बढ़ गयी है कि डूबते हुये ब्रज का हाथ पकड़ कर क्यो नही रक्षा कर लेते ? इतनी ही हमारी विनती सुन लो, (कम से कम) एक वार पत्र तो लिख दीजिए । नवीन चरण कमल के दर्शन रूपी नयी नौका देकर हे करुणा के सागर ! जग में यश लीजिए । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि मिलने की आशा (अभी विद्यमान है) । एक बार ब्रज आगमन तो कीजिए ॥६३॥ देखियत कालिंदी अति कारी । अहो पथिक कहियौ उन हरि सौं, भयौ विरह जुर जारी । गिरि-प्रजंक तैं गिरति धरनि धसि, तरँग तरफ तन भारी । तट वारू उपचार चूर, जल-पूर प्रस्वेद पनारी । विगलित कच कुस काँस कुल पर, पक जू काजल सारी । भौंर भ्रमत अति फिरति भ्रमित गति, निसि दिन दीन दुखारी । निसि दिन चकई पिय जु रटति है, भई मनौ अनुहारी । सूरदास-प्रभु जो जमुना गति, सो गति भई हमारी ॥६४॥ अर्थ—यमुना अत्यन्त काली दिखाई देती है। हे पथिक ! उन हरि से कहना कि (यमुना) विरह के ज्वर से जल गयी है। पर्वत रूपी पलग से (यह) पृथ्वी पर गिरती है तथा इसके तन मे तरंग रूपी भारी तडपन होती है। तट की बालू का चूर्ण ही उपचार का चूर्ण है, (यमुना की) जल-धारा ही निकलने वाला पसीना है। तट पर के कुस तथा कांस उसके बिखरे हुए केश हैं। पंक (कीचड) ही (काली) मैली साड़ी है। भौंरे भ्रमित होकर इधर-उधर फिरते रहते है । (यही यमुना की) भ्रमित मति की दशा है; (वह) दुखी होकर इधर-उधर (घूमती) है दिवा-रात्रि चकई जो 'पी-पी' की रट लगाती रहती है, वही माना उसकी अन्तर्व्यथा सूचित करती है (प्रियतम-प्रियतम की रट लगाने वाली मुद्रा द्योतित कर रही है)। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है) कि जो यमुना की दशा है वैसी ही हमारी भी दशा हो गई है ॥६४॥ परेखौ कौन बोल कौ कीजै । ना हरि जाति न पांति हमारी, कहा मानि दुख लीजै । नाहींन मोर-चन्द्रिका माथैं, नाहींन उर बरमाल । नहिं सोभित पहुँचनि के भूपन, सुन्दर स्याम तमाल । नंद-नंदन गोपी-जन-बल्लभ, अब नहिं कान्ह कहावत । वासुदेव, जादवकुल-दीपक, बन्दी जन वरनावत ।

बिसरयौ सुख नातौ गोकुल कौ, और हमारे अग । सूर स्याम वह गई सगाई, वा मुरली कैं संग ॥६५॥ अर्थ—उनकी किस बात का पश्चात्ताप किया जाये । कृष्ण हमारी जाति-पांति के तो है नही, (हम) क्या समझकर दुखी हो । न तो उनके सिर पर मयूर-चन्द्रिका वाला मुकुट है, न हृदय पर वनमाल है । तमाल (वृक्ष) (जैसे) श्यामसुन्दर पर पुष्पों के आभूषण शोभित नही है । अब कृष्ण नन्द-नन्दन तथा गोपीजन-वल्लभ नही कहे जाते है । (अव वे) वन्दीजनो से वासुदेव (वसुदेव के पुत्र) तथा यादव-कुल के दीपक के रूप मे वर्णित किये जाते है । उन्होने गोकुल के सुख-सम्बन्धो को तथा हमारे अंगो को भुला दिया । सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) कि मुरली के साथ हमारी श्याम से सगाई समाप्त हो गई ॥६५॥ अब वै बातैं उलटि गईं । जिन बातनि लागत सुख आली, तेऊ दुसह भईं । रजनी स्याम स्याम सुन्दर सँग, अरु पावस की गरजनि । सुख समूह की अवधि माधुरी, पिय रस बस की तरजनि । मोर पुकार गुहार कोकिला, अलि गुंजार सुहाई । अब लागति पुकार दादुर सम, बिनही कुँवर कन्हाई । चन्दन चन्द समीर अगिन सम, तनहिं देत दव लाई । कालिन्दी अरु कमल कुसुम सब, दरसन ही दुखदाई । सरद वसंत सिसिर अरु ग्रीषम, हिम-रितु की अधिकाई । पावस जरैं सूर के प्रभु बिनु, तरफत रैन बिहाई ॥६६॥ अर्थ—(गोपियां कहती हैं) अब वे सभी बातें उलटी हो गईं । हे सखी ! जिन बातो से सुख मिलता था वे भी दुःखसह हो गयो । पावस की गरज तथा श्याम सुन्दर के साथ काली रात (अव तो भयावह है), प्रेमाभिभूत (होकर) प्रिय की डांट मधुर सुख-पुज की सीमा (थी) । (उस समय की) मोर की पुकार तथा कोयल की कूक तथा भ्रमर का गुंजन अब कृष्ण के विरह मे मेढक की (कर्कश) आवाज के समान जान पड़ती है । चदन, चन्द्रमा (तथा) (शीतल) समीर आग के समान तन मे दावाग्नि लगा देते है । यमुना और कमल पुष्प सर्व दर्शन से ही दुखदायी लगते है । शरद, बसंत, शिशिर और ग्रीष्म (आदि मे) हिम ऋतु की ही अधिकता है । पावस भी कृष्ण के बिना जलता हुआ प्रतीत होता है, तड़पते हुए ही रात बिताती हूँ ॥६६॥ मिलि बिछुरन की वेद न न्यारी । जाहि लगै सोई पै जानै, विरह-पीर अति भारी । जब यह रचना रची विधाता, तबहीं क्यौं न संभारी । सूरदास-प्रभु काहैं जिवाई, जनमत ही किन मारी ॥६७॥

२७८ सूरसागर सार सटीक अर्थ—उद्धव ! पत्र लेकर क्या करे ? जब तक कृष्ण को नही देखती, विरह छाती को जलाता है । (कृष्ण मुझे) पल-पल नही भूलते, (न तो) वह शरद ज्योत्सना की रात भूलती है । तुम कृष्ण के साथी होकर हमारी पीड़ा नही जानते हो । यह पत्र लेकर मधुपुर जाओ जहां वे अपने स्वजातियो के साथ रहते है । जो मेरा मन वहां लेकर चले गये, हम काम के कठिन बाण से घायल हो गयी । सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) कृष्ण क्या अब भी पूर्व जैसी अच्छी लगने वाली करोड़ो प्रेम चर्चाये सुनना चाहते है ? एक बार फिर मुख दिखा दो क्योकि हम चरण की रज मे अनुरक्त रहती है ॥४५॥ भ्रमर गीत इहिँ अन्तर मधुकर इक आयौ । निज स्वभाव अनुसार निकट ह्वै, सुन्दर शब्द सुनायौ । पूछन लागीँ ताहि गोपिका, कुबिजा तोहिँ पठायौ । कौधौँ सूर स्याम सुन्दर कौँ, हमैँ संदेसौँ लायौ ॥४६॥ अर्थ— इसी बीच एक भ्रमर आया । अपने स्वभाव के अनुसार निकट होकर सुन्दर शब्द सुनाया । गोपियां उससे पूछने लगी कि कुबरी ने तुमको भेजा है (क्या), या तुम हमारे लिए श्याम सुन्दर का सन्देश ले आये हो ॥४६॥ (मधुप तुम) कहौ कहाँ तैँ आए हौ । जानति हौँ अनुमान आपनै, तुम जदुनाथ पठाए हौ । वैसेइ बसन, बरन तन सुंदर, वेइ भूषन सजि ल्याए हौ । लै सरबसु सँग स्याम सिधारे, अब का पर पहिराए हौ । अहो मधुप एकै मन सबकौ, सु तौ उहाँ लै छाए हौ । अब यह कौन सयान बहुरि ब्रज, ता कारन उठि धाए हौ । मधुबन की मानिनी मनोहर, तहीँ जात जहँ भाए हौ । सूर जहाँ लौँ स्याम गात हैं, जानि भले करि पाए हौ ॥४७॥ अर्थ—भ्रमर, कहो तुम कहां से आये हो । अपने अनुमान से जानती हूँ कि तुम कृष्ण के द्वारा भेजे गये हो । वैसे ही वस्त्र है, शरीर का रंग भी सुन्दर है तथा उन्ही आभूषण से सजाए गए हो । सर्वस्व लेकर कृष्ण चले गये, अब किसे ले जाने के लिए भेजे गए हो । मधुप, सबके एक ही मन है जिसको (कृष्ण) लेकर वहां छाए हैं। अब यह कौन चतुराई है कि उनके (कृष्ण के) कारण पुनः ब्रज मे उठकर दौड़े आए हो । मधुबन की नारियां सुंदर हैं, आप वही क्यों नही चले जाते जहां अच्छे लगते हैं (प्रिय हो) । सूरदास कहते है जहां तक श्याम शरीर वाले हैं, उन्हे हमने अच्छी तरह से जान लिया है ॥४७॥ रहु रे मधुकर मधु मतवारे । कौन काज या निरगुन सौँ, चिर जीवहु कान्ह हमारे । लोटत पीत पराग कीच मैँ, बीच न अंग सम्हारे । बारम्बार सरक मदिरा की, अपरसरटत उघारे ।

उद्धव संदेश १७८ तुम जानत हौ वैसी ग्वारिनि, जैसे कुसुम तिहारे। घरी पहर सबहिनि बिरमावत, जेते आवत कारे। सुंदर बदन कमल-दल लोचन, जसुमति नंद-दुलारे। तन मन सूर अरपि रहीं स्यामहिं, का पै लेहिं उधारे। ४८॥ अर्थ—मधु (शराब) मे मस्त रहने वाले हे मधुकर ! इस निर्गुण से क्या मतलब है, हमारे कृष्ण बहुत समय तक जीवित रहे। पीले मकरंद के कीचड़ मे लोटते हो तथा बीच में अंग नही सम्हालते। बार-बार मदिरा के नशे में रस-विरुद्ध बातें बकते हो। तुम जानते हो कि ग्वालिनियां वैसी ही है, जैसे तुम्हारे कुसुम हैं। जो घड़ी-पहर के लिए सभी काले लोगो (भ्रमरों) को बिरमाते है। हम सुन्दर मुख, कमल के समान नेत्र वाले कृष्ण को तन-मन अर्पित कर चुकी है। अब पुनः निर्गुण को अर्पण करने के लिए तन-मन किससे उधार ले ॥४८॥ मधुकर हम न होहिं वै बेलि। जिन भजि तजि तुम फिरत और रंग, करन कुसुम-रस केलि। बारे तैं बर बारि बढ़ी हैं, अरु पोषी पिय पानि। बिनु पिय परस प्रात उठि फूलत, होति सदा हित हानि। ये बेली बिरहीं बृंदावन, उरझी स्याम तमाल। प्रेम-पुहुप-रस-बास हमारे, बिलसत मधुप गोपाल। जोग समीर धीर नहिं डोलतिं, रूप डार दृढ़ लागीं। सूर पराग न तजतिं हिए तैं, श्री गुपाल अनुरागीं ॥४६॥ अर्थ—मधुकर हम उन लताओ के समान नही है; जिन्हे छोड़कर भाग जाते हो ओर दूसरे रंग में रंगकर अन्य कुसुम के सांथ केलि (क्रीडा) करने के लिए फिर जाते हो। बचपन से ही उपवन मे पानी पीकर पुष्ट हुई हैं, और (प्रियतम) के हाथो द्वारा पोषित हुई हैं। ये प्रिय के बिना स्पर्श के प्रातः फूल उठती है, जिससे सदा हित की हानि होती है ! वृन्दावन की ये विरहिणी लताएँ (गोपिकाएँ) श्याम तमाल से उलझ गयी है। प्रेम रूपी पुष्प के रस से हमारे (भ्रमर) गोपाल कृष्ण बिलसते हैं। रूप की डालियों मे दृढ़ता पूर्वक लगी है (उलझ गई है), जो योग की हवा से हिलती नहीं हैं। सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) निरन्तर श्री गोपालकृष्ण में अनुरक्त हम हृदय से पराग नही त्यागती हैं ॥४६॥ उद्धव गोपी संवाद पहला संवाद सुनौ गोपी हरि कौ संदेस। करि समाधि अंतरगति ध्यावहु, यह उनकौ उपदेस। वै अविगत अविनासी पूरन, सब-घट रहे समाइ। तत्व ज्ञान बिनु मुक्ति नहीँ है, वेद पुराननि गाइ।

२८० सूरसागर सार सटीक सगुन रूप तजि निरगुन ध्यावहु,इक चित इक मन लाइ । वह उपाइ करि बिरह तरौ तुम, मिलै ब्रह्म तब आइ । दुसह संदेस सुनत माधो कौ, गोपी जन बिलखानी । सूर बिरह की कौन चलावै, बूड़तिँ मनु बिनु पानी ॥५०॥ अर्थ—गोपियो, कृष्ण का संवाद सुनो ! समाधि लगाकर अन्तर मे ध्यान करो, यही उनका संदेश है । वे अविगत, अविनाशी, पूर्ण तथा सभी घट मे व्याप्त है । वेद तथा पुराणो में गाया गया है कि तत्व-ज्ञान के बिना मुक्ति नही मिलती । चित्त मे (एकाग्र मन से) यह (विचार) लाकर, सगुण रूप को त्यागकर, निर्गुण का ध्यान करो । वही उपाय करो जिससे विरह को तर जाओ, तब ब्रह्म आकर मिल जायेगा । कृष्ण के दुसह संदेश को सुनकर गोपियां बिलखने लगीं । सूरदास कहते है कि विरह को कौन चलाये वे मानो बिना पानी के डूब रही हों ॥५०॥ परी पुकार द्वार गृह-गृह तैँ, सुनौ सखी इक जोगी आयौ । पवन सधावन, भवन छुड़ावन, रवन-रसाल, गोपाल पठायौ । आसन बाँधि, परम ऊरध चित, बनत न तिनिहिँ कहा हित ल्यायो । कनक बेलि, कामिनी ब्रजब्राला, जोग जगिनि दहिबे कौँ धायौ । भव-भय हरन, असुर मारन हित, कांरन कान्ह मधुपूरी छायौ । ब्रज मैँ जादव एकौ नाहीँ, काहैँ उलटौ जस बिथरायौ । सुथल जु स्याम धाम मैँ बैठैँ, अबलनि प्रति अधिकार जनायौ । सूर बिसारी प्रीति साँवरे, भली चतुरता जगत हँसायौ ॥५१॥ अर्थ—घर-घर के द्वार से पुकार मच गयी कि सखियो सुनो ! एक योगी आया है । पवन (प्राणायाम) सिद्ध करने के लिए तथा भवन छुड़ाने के लिए रमण करने वाले रसाल कृष्ण ने भेजा है । आसन लगाकर, चित्त को ऊर्ध्वमुख करना उन्हे (श्रीकृष्ण को) शोभा नही देता; उन्हें योग से क्यों इस प्रकार का प्रेम हो गया ? सोने की लता (के समान) ब्रजबालओ को योग की अग्नि पर दग्ध करने के लिए दौड़कर (आये है) । संसार के दुख को हरने वाले, असुरो को मारने के लिए कृष्ण मधुपूरी मे रह गए । ब्रज मे एक भी यादव नही, उलटे यश को क्यों बिखरा दिये । सुन्दर स्थल तथा भवन मे बैठे कृष्ण अबलाओ के प्रति अपना अधिकार जमा दिये । सूरदास कहते है कि (गोपियां कहती है) साँवले कृष्ण प्रीति को विस्मृत कर गए, अपने इस भले चातुर्य से संसार मे परिहास करा दिया ॥५१॥ देन आए ऊधौ मत नीकौ । आवहु री मिलि सुनहु सयानी, लेहु सुजस कौ टीकौ । तजन कहत अंबर आभूषण, गेह नेह सुत ही कौ । अंग भस्म करि सीस जटा धरि, सिखवत निरगुन फीकौ ।

उद्धव संदेश २८१ मेरे जान यहै जुवतिनि कौ, देत फिरत दुख पी कौ। ता सराप तँ भयौ स्याम तन, तउ न गहत डर जी कौ। जाकी प्रकृति परी जिय जैसी, सोच न भली बुरी कौ। जैसैं सूर ब्याल रस चाखैँ, मुख नहिँ होत अमी कौ ॥५२॥ अर्थ-उद्धव सुन्दर मत देने को आये है। चतुर सखियों आओ, सब मिलकर सुनो तथा सुयश का टीका लो। (ऊधो) वस्त्र, आभूषण तथा घर, स्नेह और पुत्र को भी छोडने को कहते है। अंग मे भस्म लगाने की, सिर पर जटा धारण करने की तथा फीके निर्गुण की सीख देते है। मेरी समझ में ये युवतियों को इसी प्रकार दुख देते फिरते हैं। उसी शाप से ये काले शरीर वाले हो गये हैं, तब भी हृदय मे डर नही ग्रहण करते । जिसका जैसा स्वभाव होता है, वह भी वैसा ही हो जाता है, उसे भले बुरे की सोच नही रहती है। सूरदास कहते हैं कि (गोपियाँ कहती हैं) सर्प अमृत रस को कितना भी चखे किन्तु उसका मुख अमृतमय नही होता ॥५२॥ प्रकृति जो जाकें अंग परी । स्वान पूँछ कोउ कोटिक लागै, सूधी कहूँ न करी। जैसैं काग भच्छ नहिं छाँड़े, जनमत जौन घरी। धोए रंग जात नहिं कैसेहुँ, ज्यौं कारी कमरी। ज्यौं अहि डसत उदर नहिं पूरत, ऐसी धरनिँ धरी। सूर होइ सो होइ सोच नहिं, तैसेइ एऊ री ॥५३॥ अर्थ- जिसके शरीर का जैसा स्वभाव हो गया है, (वह) वैसा ही रहता है। कुत्ते की पूंछ को कोई लाख प्रयत्न करे लेकिन उसे सीधी नही कर सकता। जैसे कौवा जिस घड़ी जन्म लेता है, उसी घड़ी से अभक्ष्य नही त्यागता। जैसे काली कमरी का रंग धोने से नही जाता है। जैसे सांप के डसने से कभी उसकी उदरपूर्ति (संतोष) नही होती, किन्तु डसने की उसने ऐसी टेक पकड़ ली है। सूरदास कहते है कि (गोपियां कहती है) जो होना हो उसकी चिंता नही, वैसे ही ये (उद्धव) भी है ॥५३॥ समुझि न परति तिहारी ऊधौ । ज्यौं त्रिदोष उपजैं जक लागत, बोलत बचन न सूधौ । आपुन कौ उपचार करो अति, तब औरनि सिख देहु । बड़ौ रोग उपज्यों है तुमकौं, भवन सबारैं लेहु । ह्वाँ भेषज नाना भाँतिन के, अरु मधु-रिपु से बैद । हम कातर डरपतिं अपनैं सिर, यह कलंक है खेद । साँची बात छाँड़ि अलि तेरी, झूठी को अब सुनिहै। सूरदास मुक्ताहल भोगी, हंस ज्वारि क्यों चुनिहै ॥५४॥ अर्थ-उद्धव ! तुम्हारी (बात) समझ में नही आती। जैसे वात-पित्त तथा कफ के समन्वय से एक जक उत्पन्न हो जाती है, वैसे ही तुम शुद्ध (सीधी) बात नही

२८२ सूरसागर सार सटीक बोलते हो । (पहले) अपना उपचार करो, तब औरो को सीख दो। तुमको कोई बड़ा रोग उत्पन्न हो गया है, शीघ्र ही घर के लिए रवाना हो जाओ; वहां अनेक प्रकार की दवाईयाँ तथा कृष्ण जैसा वैद्य है। हम कातर होकर डरती हैं कि कहीं अनिष्ट का कलंक हमारे सिर पर न मढा जाय, इसका हमें खेद (भी) है । सच्ची बात को छोड़ कर भ्रमर तुम्हारी बात कौन सुनेगा ? सूरदास कहते है कि (गोपियां कहती है) मुक्ताफल का भोगी हंस ज्वार (अन्न) को क्यों चुनेगा ॥५४॥ उधौ हम आजु भईँ बड़ भागी । जिन अँखियन तुम स्याम बिलोके, ते अँखिया हम लागीं । जैसें सुमन बास लै आवत, पवन मधुप अनुरागी । अति आनंद होत है तैसें, अंग-अंग सुख रागी । ज्यौँ दरपन मैँ दरस देखियत, दृष्टि परम रुचि लागी । तैसें सूर मिले हरि हमकौं, विरह-विथा तन त्यागी ॥५५॥ अर्थ- उद्धव ! आज हम बड़ी भाग्यशालिनी हो गयी, क्योकि जिन आंखों से तुमने कृष्ण को देखा था, वे आंखे हमारे शरीर को लग गयीं (देखा) । जैसे भौरे के प्रिय सुमन की गंध की हवा ले आती है, वैसे ही तुम्हें देखकर अत्यधिक आनंद हो रहा है तथा अंग-अंग सुख मे रंग गया (है) । जैसे शीशे मे दर्शन करने से दृष्टि परम रुचिकर लगती है, वैसे ही कृष्ण हमको मिले, हमारे शरीर ने विरह की व्यथा को त्याग दिया ॥५५॥ (अलि हौं) कैसैँ कहौँ हरि के रूप रसहिं । अपने तन मैँ भेद बहुत विधि, रसना जानै न नैन दसहिं । जिन देखे ते आहिं बचन बिनु, जिनहिं बचन दरसन न तिसहिं । बिनु बानी ये उमँगि प्रेम जल, सुमिरि-सुमिरि वा रूप जसहिं । बार-बार पछिताति यहै कहि, कहा करौँ जो विधि न बसहिं । सूर सकल अगनि की यह गति, क्यौं समझावैँ छपद पसुहिं ॥५६॥ अर्थ-(भ्रमर हम) कृष्ण के रूप रस को कैसे कहे ? अपने (ही) शरीर मे अनेक प्रकार के भेद है, क्योकि जीभ, नेत्रो की दशा को नही जानती । जिसने देखा वे वचन (वाणी) रहित हैं, जिनके वचन है उन्हे दृष्टि नही है (देखने मे असमर्थ हैं) । बिना वाणी (के नेत्रो मे) उस रूप-यश का स्मरण कर-कर के प्रेम जल उमड़ता रहता है । बार-बार यही कहकर पछताती हूँ, क्या करूँ विधाता से वश नही है । सूरदास कहते है कि (गोपियां कहती है) समस्त अंगो की यही गति है, इस मूर्ख (पशु) भ्रमर को कैसे समझाये ॥५६॥ हम तौ सब बातनि सचु पायौ । गोद खिलाइ पिवाइ देह पय, पुनि पालनै झुलायौ । देखति रही फनिग की मनि ज्यौं, गुरुजन ज्यौँ न भुलायौ । अब नहिं समुझति कौन पाप तैं, बिधना सो उलटायौ ।

उद्धव संदेश १८३ बिनु देखैं पल-पल नहिं छन-छन, ये ही चित ही चायौ। अबहिं कठोर भए ब्रजपति-सुत, रोवत मुँह न धुवायौ। तब हम दूध दही के कारन, घर-घर बहुत खिझायौ। सो अब सूर प्रगट ही लाग्यौ, योगऽरु ज्ञान पठायौ ॥५७॥ अर्थ-हमने तो सभी बातो मे सुख प्राप्त किया । (कृष्ण को) गोद मे खिलाकर, अपने शरीर का (स्व-स्तन का) दूध पिलाकर, फिर झूले पर झुलांया । सर्प की मणि की तरह (उन्हे) देखती रही तथा अभिभावक की तरह उपेक्षित नही किया । अब नही समझती हूँ कि किस पाप से विधाता ने वह (सब कुछ) उलट दिया । बिना देखे पल-पल, क्षण-क्षण नही (बीतता); यही (देखने की) इच्छा (चित्त में) बनी रहती है । अब कृष्ण कठोर हो गये है तथा रोते हुए हमें मुँह नही धुवाते (आश्वस्त नही करते) । तब तो हमे दूध-दही के कारण घर-घर मे बहुत खिझाया, वह सब अब प्रत्यक्ष ही हो गया (उन्होने) योग और ज्ञान भेज दिया ॥५७॥ मधुकर कहिए काहि सुनाइ । हरि बिछुरत हम जिते सहे दुख, जिते बिरह के घाइ । बरु माधौ मधुबन ही रहते, कत जसुदा कैं आए । कत प्रभु गोप-बेष ब्रज धरि कैं, कत ये सुख उपजाए । कत गिरि धरयौ, इंद्र मद मेटयौ, कत बन रास बनाए । अब कहा निठुर भए अबलनि कौं, लिखि लिखि जोग पठाए । तुम परबीन सबै जानत हौ, तातैं यह कहि आई । अपनी को चालै सुनि सूरुज, पिता जननि बिसराई ॥५८॥ अर्थ-मधुकर किसको सुनाकर कहें । हरि के बिछुड़ते हुए हमने जितना दुख सहा तथा जितने विरह के घाव हुए (वे सब अकथनीय) है। अच्छा होता कृष्ण मधुवन मे ही रहते, यशोदा के यहाँ क्यों आये । कृष्ण क्यों गोप का वेष धारण कर के ब्रज मे इतने सुखो को उपजाया । किसलिए उन्होंने पर्वत को धारण किया तथा इन्द्र के गर्व को मिटाया तथा किसलिए रास रचाया । अब अबलाओ के प्रति कैसे निष्ठुर हो गये और लिख-लिखकर योग भेजा है । तुम प्रवीण हो, उसी से यह कह दिया । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है) कि हमारी कौन चलाये (कृष्ण ने) अपने पिता-माता को ही भुला दिया ॥५८॥ दूसरा संवाद जानि करि बावरो जनि होहु । तत्व भजे वैसी ह्रै जैहौ, पारस परसैं लोहु । मेरौ बचन सत्य करि मानौ, छांड़ी सब कौ मोहू । तौ लगि सब पानी की चुपरो, जौ लगि अस्थिन दोहु ।

३८४ सूरसागर सार सटीक अरे मधुप ! बातें ये ऐसी, क्यों कहि आवतिँ तोह । सूर सुवस्ती छाड़ि परम सुख, हमें बतावत खोह ॥५६॥ अर्थ—जानकर पागल मत बनो। तत्व का भजन करने से वैसी (तत्ववत्) हो जाओगी जैसे पारस पत्थर को स्पर्श करके लोहा सोना हो जाता है। मेरी बात को सत्य मानो तथा सभी मोह को छोड़ दो। तब तक सब पानी की चुपड़ी है जब तक द्वैत भाव स्थित है। (गोपियां उत्तर देती हैं) अरे मधुप ऐसी बातें तुमसे कैसे कही जा रही हैं। तुम सुन्दर निवास तथा परम सुख को छोड़कर हमें कन्दरा में योगासन के लिए स्थान बता रहे हो ॥५६॥ ऊधौ हरि गुन हम चकडोर । गुन सौं ज्यौं भावै त्यौं फेरौ, यहै बात कौ ओर । पैँड़ पैँड़ चलियै तो चलियै, ऊबट रपट पाइ । चकडोरी की रीति यहै फिरि, गुन हीं सौं लपटाइ । सूर सहज गुन ग्रन्थि हमारैं, दई स्याम उर माहिं । हरि के हाथ परै तौ छूटै, और जतन कछु नाहिं ॥६०॥ अर्थ—उद्धव हम कृष्ण (के गुण) रूपी डोर के साथ घूमने वाली लट्टू हैं। उस गुण (डोरी) से जैसे चाहो वैसा फिरा दो, यही इस बात का अन्त है। रास्ते-रास्ते चलिये तो ठीक है, कुराह चलने से पद छिल जाते हैं। लट्टू का यही गुण है कि नाचने के बाद वह फिर गुण (डोरी) से ही लिपट जाता है। सूरदास कहते हैं कि (गोपियां कहती हैं) कृष्ण ने हमारे हृदय में गुण (की डोरी) की सहज-गांठ लगा दी है। कृष्ण के हाथ मे पड़ने पर ही छूट सकती है और अन्य कोई उपाय नहीं है ॥६०॥ उलटी रीति तिहारी ऊधौ, सुनै सो ऐसी को है । अल्प वयस अबला अहीरि सठ, तिनहिं जोग कत सोहै । बूची खुभी, आँधरी काजर, नकटी पहिरै बेसरि । मुड़ली पटिया पारौ चाहै, कोढ़ी लावै केसरि । बहिरी पति सौ मतौ करै तौ, तैसोइ उत्तर पावै । सो गति होइ सबै ताकी जो, ग्वारिनि जोग सिखावै । सिखई कहत स्याम की बतियाँ, तुमकौं नाहीँ दोष । राज काज तुम तैं न सरैगो, काया अपनी पोष । जाते भूलि सबै मारग मैं, इहाँ आनि का कहते । भली भई सुधि रही सूर, नतु मोह धार मैं बहते ॥६१॥ अर्थ—उद्धव तुम्हारी उल्टी रीति को यहाँ कौन (गोपी) है जो सुन सकती है। अल्प आयु वाली, बुद्धिहीन, अबला अहीर की स्त्रियों को योग कैसे शोभित होगा। बूची (कान रहित) को खुभी (कान का आभूषण), अन्धी को काजल तथा नकटी बेसर पहने (यह ठीक नहीं है)। बाल रहित स्त्री माँग काढ़ना चाहे तथा कोढ़ी केसर का लेप