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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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बिसरयौ सुख नातौ गोकुल कौ, और हमारे अग । सूर स्याम वह गई सगाई, वा मुरली कैं संग ॥६५॥ अर्थ—उनकी किस बात का पश्चात्ताप किया जाये । कृष्ण हमारी जाति-पांति के तो है नही, (हम) क्या समझकर दुखी हो । न तो उनके सिर पर मयूर-चन्द्रिका वाला मुकुट है, न हृदय पर वनमाल है । तमाल (वृक्ष) (जैसे) श्यामसुन्दर पर पुष्पों के आभूषण शोभित नही है । अब कृष्ण नन्द-नन्दन तथा गोपीजन-वल्लभ नही कहे जाते है । (अव वे) वन्दीजनो से वासुदेव (वसुदेव के पुत्र) तथा यादव-कुल के दीपक के रूप मे वर्णित किये जाते है । उन्होने गोकुल के सुख-सम्बन्धो को तथा हमारे अंगो को भुला दिया । सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) कि मुरली के साथ हमारी श्याम से सगाई समाप्त हो गई ॥६५॥ अब वै बातैं उलटि गईं । जिन बातनि लागत सुख आली, तेऊ दुसह भईं । रजनी स्याम स्याम सुन्दर सँग, अरु पावस की गरजनि । सुख समूह की अवधि माधुरी, पिय रस बस की तरजनि । मोर पुकार गुहार कोकिला, अलि गुंजार सुहाई । अब लागति पुकार दादुर सम, बिनही कुँवर कन्हाई । चन्दन चन्द समीर अगिन सम, तनहिं देत दव लाई । कालिन्दी अरु कमल कुसुम सब, दरसन ही दुखदाई । सरद वसंत सिसिर अरु ग्रीषम, हिम-रितु की अधिकाई । पावस जरैं सूर के प्रभु बिनु, तरफत रैन बिहाई ॥६६॥ अर्थ—(गोपियां कहती हैं) अब वे सभी बातें उलटी हो गईं । हे सखी ! जिन बातो से सुख मिलता था वे भी दुःखसह हो गयो । पावस की गरज तथा श्याम सुन्दर के साथ काली रात (अव तो भयावह है), प्रेमाभिभूत (होकर) प्रिय की डांट मधुर सुख-पुज की सीमा (थी) । (उस समय की) मोर की पुकार तथा कोयल की कूक तथा भ्रमर का गुंजन अब कृष्ण के विरह मे मेढक की (कर्कश) आवाज के समान जान पड़ती है । चदन, चन्द्रमा (तथा) (शीतल) समीर आग के समान तन मे दावाग्नि लगा देते है । यमुना और कमल पुष्प सर्व दर्शन से ही दुखदायी लगते है । शरद, बसंत, शिशिर और ग्रीष्म (आदि मे) हिम ऋतु की ही अधिकता है । पावस भी कृष्ण के बिना जलता हुआ प्रतीत होता है, तड़पते हुए ही रात बिताती हूँ ॥६६॥ मिलि बिछुरन की वेद न न्यारी । जाहि लगै सोई पै जानै, विरह-पीर अति भारी । जब यह रचना रची विधाता, तबहीं क्यौं न संभारी । सूरदास-प्रभु काहैं जिवाई, जनमत ही किन मारी ॥६७॥