भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 236

२३८ सूरसागर सार सटीक चरन कमल दरसन नव नवका, करुनासिंधु जगत जस लीजै । सूरदास प्रभु आस मिलन की, एक बार आवन ब्रज कीजै ॥६३॥ अर्थ—स्वामी ! (हम) अनाथों की याद कीजिए । गोपी, ग्वाल, गाय बछड़े सभी दीन, मलिन हो गये हैं तथा दिन प्रतिदिन क्षीण होते जा रहे हैं। नैनो मे जल- धारा इतनी बढ़ गयी है कि डूबते हुये ब्रज का हाथ पकड़ कर क्यो नही रक्षा कर लेते ? इतनी ही हमारी विनती सुन लो, (कम से कम) एक वार पत्र तो लिख दीजिए । नवीन चरण कमल के दर्शन रूपी नयी नौका देकर हे करुणा के सागर ! जग में यश लीजिए । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि मिलने की आशा (अभी विद्यमान है) । एक बार ब्रज आगमन तो कीजिए ॥६३॥ देखियत कालिंदी अति कारी । अहो पथिक कहियौ उन हरि सौं, भयौ विरह जुर जारी । गिरि-प्रजंक तैं गिरति धरनि धसि, तरँग तरफ तन भारी । तट वारू उपचार चूर, जल-पूर प्रस्वेद पनारी । विगलित कच कुस काँस कुल पर, पक जू काजल सारी । भौंर भ्रमत अति फिरति भ्रमित गति, निसि दिन दीन दुखारी । निसि दिन चकई पिय जु रटति है, भई मनौ अनुहारी । सूरदास-प्रभु जो जमुना गति, सो गति भई हमारी ॥६४॥ अर्थ—यमुना अत्यन्त काली दिखाई देती है। हे पथिक ! उन हरि से कहना कि (यमुना) विरह के ज्वर से जल गयी है। पर्वत रूपी पलग से (यह) पृथ्वी पर गिरती है तथा इसके तन मे तरंग रूपी भारी तडपन होती है। तट की बालू का चूर्ण ही उपचार का चूर्ण है, (यमुना की) जल-धारा ही निकलने वाला पसीना है। तट पर के कुस तथा कांस उसके बिखरे हुए केश हैं। पंक (कीचड) ही (काली) मैली साड़ी है। भौंरे भ्रमित होकर इधर-उधर फिरते रहते है । (यही यमुना की) भ्रमित मति की दशा है; (वह) दुखी होकर इधर-उधर (घूमती) है दिवा-रात्रि चकई जो 'पी-पी' की रट लगाती रहती है, वही माना उसकी अन्तर्व्यथा सूचित करती है (प्रियतम-प्रियतम की रट लगाने वाली मुद्रा द्योतित कर रही है)। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है) कि जो यमुना की दशा है वैसी ही हमारी भी दशा हो गई है ॥६४॥ परेखौ कौन बोल कौ कीजै । ना हरि जाति न पांति हमारी, कहा मानि दुख लीजै । नाहींन मोर-चन्द्रिका माथैं, नाहींन उर बरमाल । नहिं सोभित पहुँचनि के भूपन, सुन्दर स्याम तमाल । नंद-नंदन गोपी-जन-बल्लभ, अब नहिं कान्ह कहावत । वासुदेव, जादवकुल-दीपक, बन्दी जन वरनावत ।