भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 235

मथुरा गवन २३७ चुका था; (इस प्रकार) सभी पवित्र लोग चले गये। सूरदास कहते हैं (कि) (यद्यपि) बिना छेद किए हुए (अ-सलेहु) (अर्थात् अत्यन्त कठोर जड पदार्थ भी) (कृष्ण के विरह की) पीड़ा (साल) से बिध गए (द्रवो-भूत हो गए), (किन्तु) अकेले प्राण ही (अभी तक) नही चले (अर्थात् प्राणो का अन्त अभी नही हुआ !) ॥६०॥ करि गए थोरे दिन की प्रीति । कहँ वह प्रीति कहाँ यह बिछुरनि, कहँ मधुबन की रीति । अब की बेर मिलौ मनमोहन, बहुत भई विपरीति । कैसे प्राण रहत दरसन बिनु, मनहु गए जुग बीति । कृपा करहु गिरिधर हम ऊपर, प्रेम रह्यौ तन जीति । सूरदास प्रभु तुम्हारे मिलन बिनु, भईं भुस पर की भीति ॥६१॥ अर्थ-(कृष्ण) थोड़े दिन का प्रेम करके चले गये । कहां वह प्रेम और कहां यह वियोग, और कहाँ मधुवन का व्यवहार (ये सब आश्चर्य उत्पन्न करने वाले है) । अब की बार कृष्ण फिर मिलो क्योंकि हमारी (दशा) बहुत विपरीत हो गयी । प्राण दर्शन के बिना कैसे रहते हैं, (लगता है) मानो युग बीत गया हो । कृष्ण हम पर कृपा करो क्योकि प्रेम ने (हमारे शरीर पर) विजय पा ली है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि कृष्ण.! तुम्हारे मिलन के विना हम भूसेपर की दीवाल के समान हो गयी है ॥६१॥ प्रीति करि दीन्ही गरैं छुरी । जैसेँ बधिक चुगाइ कपट-कन, पाछैं करत बुरी । मुरली मधुर चेप काँपा करि, मोर चंद्र फँदवारि । बंक विलोकनि लगी, लोभ बस, सकी न पंख पसारि । तरफत छाँड़ि गए मधुबन कौं, बहुरि न कीन्ही सार । सूरदास प्रभु सग कलपतरु, उलटि न बैठी डार ॥६२॥ अर्थ-प्रेम करके गले में छूरी लगा दी । जिस प्रकार वधिक कपट रूपी दाने चुगाकर (पकड़ लेने) के बाद बुरी (गत) बनाता है। (वैसे ही कृष्ण ने) मुरली तथा मधुर ध्वनि को क्रमश: लासा तथा बांस की तांली बनाकर, (मुकुट के) मोर-चन्द्र के फंदे को डाल दिया । (हम लोग) लोभ-वश टेढी चितवन रूपी लग्गी (के कारण) पखों को फैला न सकी (अर्थात् हिल डुल न सकी) । फिर (कृष्ण) (हमे फंसाकर) तड़फती हुई छोड़कर मथुरा चले गये और फिर स्मरण नही किया । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है) कि प्रभु संग रूपी कल्पतरु को छोड़कर हम उलटकर उस डाल पर न बैठ सकी ॥६२॥ नाथ अनाथनि की सुधि लीजै । गोपी, ग्वाल, गाइ, गोसुत सब, दीन मलीन दिनहिँ दिन छीजैं । नैननि जलधारा बढ़ी अति, बूड़त ब्रज किन कर गहि लीजै । इतनी बिनती सुनहु हमारी, बारक हूँ पतिया लिखि दीजै ।

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 235, कुल 359 में से · BharatKosha