सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७८ सूरसागर सार सटीक अर्थ—उद्धव ! पत्र लेकर क्या करे ? जब तक कृष्ण को नही देखती, विरह छाती को जलाता है । (कृष्ण मुझे) पल-पल नही भूलते, (न तो) वह शरद ज्योत्सना की रात भूलती है । तुम कृष्ण के साथी होकर हमारी पीड़ा नही जानते हो । यह पत्र लेकर मधुपुर जाओ जहां वे अपने स्वजातियो के साथ रहते है । जो मेरा मन वहां लेकर चले गये, हम काम के कठिन बाण से घायल हो गयी । सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) कृष्ण क्या अब भी पूर्व जैसी अच्छी लगने वाली करोड़ो प्रेम चर्चाये सुनना चाहते है ? एक बार फिर मुख दिखा दो क्योकि हम चरण की रज मे अनुरक्त रहती है ॥४५॥ भ्रमर गीत इहिँ अन्तर मधुकर इक आयौ । निज स्वभाव अनुसार निकट ह्वै, सुन्दर शब्द सुनायौ । पूछन लागीँ ताहि गोपिका, कुबिजा तोहिँ पठायौ । कौधौँ सूर स्याम सुन्दर कौँ, हमैँ संदेसौँ लायौ ॥४६॥ अर्थ— इसी बीच एक भ्रमर आया । अपने स्वभाव के अनुसार निकट होकर सुन्दर शब्द सुनाया । गोपियां उससे पूछने लगी कि कुबरी ने तुमको भेजा है (क्या), या तुम हमारे लिए श्याम सुन्दर का सन्देश ले आये हो ॥४६॥ (मधुप तुम) कहौ कहाँ तैँ आए हौ । जानति हौँ अनुमान आपनै, तुम जदुनाथ पठाए हौ । वैसेइ बसन, बरन तन सुंदर, वेइ भूषन सजि ल्याए हौ । लै सरबसु सँग स्याम सिधारे, अब का पर पहिराए हौ । अहो मधुप एकै मन सबकौ, सु तौ उहाँ लै छाए हौ । अब यह कौन सयान बहुरि ब्रज, ता कारन उठि धाए हौ । मधुबन की मानिनी मनोहर, तहीँ जात जहँ भाए हौ । सूर जहाँ लौँ स्याम गात हैं, जानि भले करि पाए हौ ॥४७॥ अर्थ—भ्रमर, कहो तुम कहां से आये हो । अपने अनुमान से जानती हूँ कि तुम कृष्ण के द्वारा भेजे गये हो । वैसे ही वस्त्र है, शरीर का रंग भी सुन्दर है तथा उन्ही आभूषण से सजाए गए हो । सर्वस्व लेकर कृष्ण चले गये, अब किसे ले जाने के लिए भेजे गए हो । मधुप, सबके एक ही मन है जिसको (कृष्ण) लेकर वहां छाए हैं। अब यह कौन चतुराई है कि उनके (कृष्ण के) कारण पुनः ब्रज मे उठकर दौड़े आए हो । मधुबन की नारियां सुंदर हैं, आप वही क्यों नही चले जाते जहां अच्छे लगते हैं (प्रिय हो) । सूरदास कहते है जहां तक श्याम शरीर वाले हैं, उन्हे हमने अच्छी तरह से जान लिया है ॥४७॥ रहु रे मधुकर मधु मतवारे । कौन काज या निरगुन सौँ, चिर जीवहु कान्ह हमारे । लोटत पीत पराग कीच मैँ, बीच न अंग सम्हारे । बारम्बार सरक मदिरा की, अपरसरटत उघारे ।