सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 242, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ें२८२ सूरसागर सार सटीक बोलते हो । (पहले) अपना उपचार करो, तब औरो को सीख दो। तुमको कोई बड़ा रोग उत्पन्न हो गया है, शीघ्र ही घर के लिए रवाना हो जाओ; वहां अनेक प्रकार की दवाईयाँ तथा कृष्ण जैसा वैद्य है। हम कातर होकर डरती हैं कि कहीं अनिष्ट का कलंक हमारे सिर पर न मढा जाय, इसका हमें खेद (भी) है । सच्ची बात को छोड़ कर भ्रमर तुम्हारी बात कौन सुनेगा ? सूरदास कहते है कि (गोपियां कहती है) मुक्ताफल का भोगी हंस ज्वार (अन्न) को क्यों चुनेगा ॥५४॥ उधौ हम आजु भईँ बड़ भागी । जिन अँखियन तुम स्याम बिलोके, ते अँखिया हम लागीं । जैसें सुमन बास लै आवत, पवन मधुप अनुरागी । अति आनंद होत है तैसें, अंग-अंग सुख रागी । ज्यौँ दरपन मैँ दरस देखियत, दृष्टि परम रुचि लागी । तैसें सूर मिले हरि हमकौं, विरह-विथा तन त्यागी ॥५५॥ अर्थ- उद्धव ! आज हम बड़ी भाग्यशालिनी हो गयी, क्योकि जिन आंखों से तुमने कृष्ण को देखा था, वे आंखे हमारे शरीर को लग गयीं (देखा) । जैसे भौरे के प्रिय सुमन की गंध की हवा ले आती है, वैसे ही तुम्हें देखकर अत्यधिक आनंद हो रहा है तथा अंग-अंग सुख मे रंग गया (है) । जैसे शीशे मे दर्शन करने से दृष्टि परम रुचिकर लगती है, वैसे ही कृष्ण हमको मिले, हमारे शरीर ने विरह की व्यथा को त्याग दिया ॥५५॥ (अलि हौं) कैसैँ कहौँ हरि के रूप रसहिं । अपने तन मैँ भेद बहुत विधि, रसना जानै न नैन दसहिं । जिन देखे ते आहिं बचन बिनु, जिनहिं बचन दरसन न तिसहिं । बिनु बानी ये उमँगि प्रेम जल, सुमिरि-सुमिरि वा रूप जसहिं । बार-बार पछिताति यहै कहि, कहा करौँ जो विधि न बसहिं । सूर सकल अगनि की यह गति, क्यौं समझावैँ छपद पसुहिं ॥५६॥ अर्थ-(भ्रमर हम) कृष्ण के रूप रस को कैसे कहे ? अपने (ही) शरीर मे अनेक प्रकार के भेद है, क्योकि जीभ, नेत्रो की दशा को नही जानती । जिसने देखा वे वचन (वाणी) रहित हैं, जिनके वचन है उन्हे दृष्टि नही है (देखने मे असमर्थ हैं) । बिना वाणी (के नेत्रो मे) उस रूप-यश का स्मरण कर-कर के प्रेम जल उमड़ता रहता है । बार-बार यही कहकर पछताती हूँ, क्या करूँ विधाता से वश नही है । सूरदास कहते है कि (गोपियां कहती है) समस्त अंगो की यही गति है, इस मूर्ख (पशु) भ्रमर को कैसे समझाये ॥५६॥ हम तौ सब बातनि सचु पायौ । गोद खिलाइ पिवाइ देह पय, पुनि पालनै झुलायौ । देखति रही फनिग की मनि ज्यौं, गुरुजन ज्यौँ न भुलायौ । अब नहिं समुझति कौन पाप तैं, बिधना सो उलटायौ ।