भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 243

उद्धव संदेश १८३ बिनु देखैं पल-पल नहिं छन-छन, ये ही चित ही चायौ। अबहिं कठोर भए ब्रजपति-सुत, रोवत मुँह न धुवायौ। तब हम दूध दही के कारन, घर-घर बहुत खिझायौ। सो अब सूर प्रगट ही लाग्यौ, योगऽरु ज्ञान पठायौ ॥५७॥ अर्थ-हमने तो सभी बातो मे सुख प्राप्त किया । (कृष्ण को) गोद मे खिलाकर, अपने शरीर का (स्व-स्तन का) दूध पिलाकर, फिर झूले पर झुलांया । सर्प की मणि की तरह (उन्हे) देखती रही तथा अभिभावक की तरह उपेक्षित नही किया । अब नही समझती हूँ कि किस पाप से विधाता ने वह (सब कुछ) उलट दिया । बिना देखे पल-पल, क्षण-क्षण नही (बीतता); यही (देखने की) इच्छा (चित्त में) बनी रहती है । अब कृष्ण कठोर हो गये है तथा रोते हुए हमें मुँह नही धुवाते (आश्वस्त नही करते) । तब तो हमे दूध-दही के कारण घर-घर मे बहुत खिझाया, वह सब अब प्रत्यक्ष ही हो गया (उन्होने) योग और ज्ञान भेज दिया ॥५७॥ मधुकर कहिए काहि सुनाइ । हरि बिछुरत हम जिते सहे दुख, जिते बिरह के घाइ । बरु माधौ मधुबन ही रहते, कत जसुदा कैं आए । कत प्रभु गोप-बेष ब्रज धरि कैं, कत ये सुख उपजाए । कत गिरि धरयौ, इंद्र मद मेटयौ, कत बन रास बनाए । अब कहा निठुर भए अबलनि कौं, लिखि लिखि जोग पठाए । तुम परबीन सबै जानत हौ, तातैं यह कहि आई । अपनी को चालै सुनि सूरुज, पिता जननि बिसराई ॥५८॥ अर्थ-मधुकर किसको सुनाकर कहें । हरि के बिछुड़ते हुए हमने जितना दुख सहा तथा जितने विरह के घाव हुए (वे सब अकथनीय) है। अच्छा होता कृष्ण मधुवन मे ही रहते, यशोदा के यहाँ क्यों आये । कृष्ण क्यों गोप का वेष धारण कर के ब्रज मे इतने सुखो को उपजाया । किसलिए उन्होंने पर्वत को धारण किया तथा इन्द्र के गर्व को मिटाया तथा किसलिए रास रचाया । अब अबलाओ के प्रति कैसे निष्ठुर हो गये और लिख-लिखकर योग भेजा है । तुम प्रवीण हो, उसी से यह कह दिया । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है) कि हमारी कौन चलाये (कृष्ण ने) अपने पिता-माता को ही भुला दिया ॥५८॥ दूसरा संवाद जानि करि बावरो जनि होहु । तत्व भजे वैसी ह्रै जैहौ, पारस परसैं लोहु । मेरौ बचन सत्य करि मानौ, छांड़ी सब कौ मोहू । तौ लगि सब पानी की चुपरो, जौ लगि अस्थिन दोहु ।