भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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मधुरा गमनं २३५ तो अक्रूर लेकर गये, जो तनिक प्राणों के लिए खिलोने (बहलाने वाले) थे । मुझे देखकर लोग हंसी करेंगे और कृष्ण (ही) क्यो न हंसें। सूरदास कहते है (गोपी कहती है) कि जाकर कृष्ण को आशीर्वाद दूंगी कि नहाते समय भी उनका (कोई) बाल बांका न हो ॥५६॥ पंथी इतनी कहियौ बात । तुम बिनु इहाँ कुँवर वर मेरे, होत जिते उतपात । बकी अघासुर टरत न टारे, बालक बनहिँ न जात । ब्रज पिंजरी रुधि मानी राखे, निकसन कौँ अकुलात । गोपी गाइ सकल लघु दीरघ, पीत बरन कृस गात । परम अनाथ देखियत तुम बिनु, केहिँ अवलंबै तात । कान्ह कान्ह कै टेरत तब धौं, अब कैसैं जिय मानत । यह व्यवहार आजु लौँ है ब्रज, कपट नाट छल ठानत । दसहूँ दिसि तैं उदित होत हैं, दावानल के कोट । आखिनि मूँदि रहत सनमुख ह्वै, नाम-कवच दै ओट । ए सब दुष्ट हते हरि जेते, भए एकही पेट । सत्वर सूर सहाइ करौ अब, समुझि पुरातन हेट ॥५७॥ अर्थ-पथिक ! जाकर इतनी (बात) कहना कि हे श्रेष्ठ कुंवर ! तुम्हारे बिना यहाँ बड़ा उत्पात होता है। बकासुर तथा अघासुर टाले नही टलते, (जिसके कारण) बालक वन नही जाते। ब्रज रूपी पिंजडे मे मानो (वे) घेर कर रखे गये हैं तथा निकलने के लिए अकुलाते है। गोपी-गाय सभी छोटे-बडे पीले वर्ण के (तथा) दुबले हो गये है। तुम्हारे बिना सब परम अनाथ जान पड़ते हैं; हे तात ! (वे) किसका अवलंब ग्रहण करे। तब तो कान्ह-कान्ह कहकर पुकारते थे, अब जी कैसे माने। यह व्यवहार आज तक ब्रज में है, (शत्रु) कपट तथा छल का नाटक ठानते हैं। दशों दिशाओ से दावाग्नि का समूह उदित होता है। सम्मुख होकर नाम रूपी कवच का ओट ग्रहण करके, आंखे बन्द करके (सब) रह जाते है। एक ही पेट से ये सब दुष्ट उत्पन्न (हुए थे) जिन्हे हरि ने नष्ट किया था। सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) पुराने प्रेम का स्मरण कर कृष्ण शीघ्र सहायता करो ॥५७॥ संदेसौ देवकी सौँ कहियौ । हौँ तौ धाइ तिहारे सुत की, मया करत ही रहियौ । जदपि टेव तुम जानतिं उनकी, तऊ मोहिं कहि आवै । प्रात होत मेरे लाल लड़ैतैं, माखन रोटी भावै । तेल उबटनौ अरु तातौ जल, ताहि देखि भजि जाते । जोइ जोइ माँगत सोइ सोइ देती, क्रम क्रम करि कै न्हाते ।