सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० सूरसागर सार सटीक सगुन रूप तजि निरगुन ध्यावहु,इक चित इक मन लाइ । वह उपाइ करि बिरह तरौ तुम, मिलै ब्रह्म तब आइ । दुसह संदेस सुनत माधो कौ, गोपी जन बिलखानी । सूर बिरह की कौन चलावै, बूड़तिँ मनु बिनु पानी ॥५०॥ अर्थ—गोपियो, कृष्ण का संवाद सुनो ! समाधि लगाकर अन्तर मे ध्यान करो, यही उनका संदेश है । वे अविगत, अविनाशी, पूर्ण तथा सभी घट मे व्याप्त है । वेद तथा पुराणो में गाया गया है कि तत्व-ज्ञान के बिना मुक्ति नही मिलती । चित्त मे (एकाग्र मन से) यह (विचार) लाकर, सगुण रूप को त्यागकर, निर्गुण का ध्यान करो । वही उपाय करो जिससे विरह को तर जाओ, तब ब्रह्म आकर मिल जायेगा । कृष्ण के दुसह संदेश को सुनकर गोपियां बिलखने लगीं । सूरदास कहते है कि विरह को कौन चलाये वे मानो बिना पानी के डूब रही हों ॥५०॥ परी पुकार द्वार गृह-गृह तैँ, सुनौ सखी इक जोगी आयौ । पवन सधावन, भवन छुड़ावन, रवन-रसाल, गोपाल पठायौ । आसन बाँधि, परम ऊरध चित, बनत न तिनिहिँ कहा हित ल्यायो । कनक बेलि, कामिनी ब्रजब्राला, जोग जगिनि दहिबे कौँ धायौ । भव-भय हरन, असुर मारन हित, कांरन कान्ह मधुपूरी छायौ । ब्रज मैँ जादव एकौ नाहीँ, काहैँ उलटौ जस बिथरायौ । सुथल जु स्याम धाम मैँ बैठैँ, अबलनि प्रति अधिकार जनायौ । सूर बिसारी प्रीति साँवरे, भली चतुरता जगत हँसायौ ॥५१॥ अर्थ—घर-घर के द्वार से पुकार मच गयी कि सखियो सुनो ! एक योगी आया है । पवन (प्राणायाम) सिद्ध करने के लिए तथा भवन छुड़ाने के लिए रमण करने वाले रसाल कृष्ण ने भेजा है । आसन लगाकर, चित्त को ऊर्ध्वमुख करना उन्हे (श्रीकृष्ण को) शोभा नही देता; उन्हें योग से क्यों इस प्रकार का प्रेम हो गया ? सोने की लता (के समान) ब्रजबालओ को योग की अग्नि पर दग्ध करने के लिए दौड़कर (आये है) । संसार के दुख को हरने वाले, असुरो को मारने के लिए कृष्ण मधुपूरी मे रह गए । ब्रज मे एक भी यादव नही, उलटे यश को क्यों बिखरा दिये । सुन्दर स्थल तथा भवन मे बैठे कृष्ण अबलाओ के प्रति अपना अधिकार जमा दिये । सूरदास कहते है कि (गोपियां कहती है) साँवले कृष्ण प्रीति को विस्मृत कर गए, अपने इस भले चातुर्य से संसार मे परिहास करा दिया ॥५१॥ देन आए ऊधौ मत नीकौ । आवहु री मिलि सुनहु सयानी, लेहु सुजस कौ टीकौ । तजन कहत अंबर आभूषण, गेह नेह सुत ही कौ । अंग भस्म करि सीस जटा धरि, सिखवत निरगुन फीकौ ।