भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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मथुरा गमन २१५ होवे जीति विधाता इनकी, करहु सहाइ सवारे। सूरदास चिर जियहु दुष्ट दलि, दोऊ नंद-दुलारे ॥२०॥ अर्थ- हे सखि ! हमारे नेत्र सफल हो गये । मदन गोपाल को देखते ही (हमने) सारे दुख-शोक भुला दिये । इन्हे लेने के लिए अक्रूर को (कस ने) गोकुल भेजा था, इसी से यहां आये हैं। कुटिल-बुद्धि कंस ने मल्ल युद्ध के लिए छल करके (इन्हे) यहाँ बुलाया है। सुनती हूँ मुष्टिक और चानूर पर्वत के समान अत्यन्त भारी है। ये यशोदा के बालक कोमल कमल के समान दिखाई देते हैं। हे विधाता ! शीघ्र सहायता करो ताकि इनकी ही जीत हो । सूरदास कहते है कि दुष्टो का नाश करके नन्द के दोनो पुत्र बहुत समय तक जिएँ ॥२०॥ धनुषसाला चले नंदलाला । सखा लिए संग प्रभु रंग नाना करत, देव नर कोउ न लखि सकत ख्याल । नृपति के रजक सों भेंट मग मेँ भई, कह्यौ दै बसन हम पहिरि जाही । वसन ये नृपति के जासु की प्रजा तुम, ये बचन कहत मन डरत नाहीँ । एक ही मुष्टिका प्रान ताके गए, लए सब वसन कछु सखनि दीन्हे । आइ दरजी गयौ बोलि ताकौँ लयौ, सुभग अँग साजि उन विनय कीन्हे । सुनि सुदामा कह्यौ गेह मम अति निकट, कृपा करि तहाँ हरि चरन धारे । धोइ पद-कमल पुनि हार आगैँ धरे, भक्ति दै, तासु सब काज सारे । लिए चंदन बहुरि आनि कुबिजा मिली, स्याम अँग लेप कीन्हौ बनाई । रीझि तिहिँ रूप दियौ, अंग सुधौ कियौ, बचन सुभ भाषि निज गृह पठाई । पुनि गए तहाँ जहँ धनुष, बोले सुभट, हौंस जनि मन करौ वन-बिहारी । सूर प्रभु छुवत धनु टूटि धरनी पर्यो, सोर सुनि कंस भयौ भ्रमित भारी ॥२१॥ अर्थ-साथ मे मित्रो को लेकर अनेक क्रीडाएँ करते हुए कृष्ण धनुष-शाला को चले, देवता या मनुष्य कोई (उनके इस) खेल को देख (समझ) नहीं सकता। रास्ते में राजा (कंस के) धोबी से भेट हुई । (कृष्ण ने उससे) कहा कि हमे वस्त्र दो (जिन्हे) पहनकर हम जाएं । (धोबो ने कहा) यह वस्त्र राजा के हैं जिनकी तुम प्रजा हो, यह वचन कहते हुए (तुम) डरते नही हो ! एक ही मुष्टिका (मुक्के) मे उसके प्राण चले गये तथा उससे सब वस्त्र ( कृष्ण ने ) ले लिये, कुछ मित्रों को दे दिये । दरजी आया और (उसने) उनके सुन्दर अंग को सजाकर विनय की। फिर सुदामा ने कहा कि मेरा घर अत्यन्त निकट है, कृपा करके कृष्ण वहां गए । (सुदामा ने) चरण-कमल धोये (तथा) फिर हार (अहार) आगे रखा । (कृष्ण ने) अपनी भक्ति देकर उसके सब कार्य सिद्ध कर दिये । फिर आगे चंदन लिए कुब्जा मिली, उसने भली प्रकार कृष्ण के अंगों