सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ सूरसागर सार सटीक कोउ महलनि पर कोउ छज्जनि पर, कुल लज्जा न करयौ। कोउ धाईँ पुर गलिन गलिन ह्वै, काम-धाम विसरयौ। इंदु वदन नव जलद सुभग तनु, दोउ खग नयन करयौ। सूर स्याम देखत पुर-नारी, उर-उर प्रेम भरयौ ॥१८॥ अर्थ—मथुरा नगर मे शोर मच गया। अपने वश सहित सुसज्जित कंस गरज रहा है, किन्तु (उसका) मुख सूख गया है, (वह) (भय से) पीला पड गया, अधरों पर पपड़ी पड गयी, (और) (वह) हृदय से अत्यधिक डरा (है)। (दूसरी ओर) नन्द महर के दोनों पुत्रों के विषय मे सुनकर नारियो को हर्ष हुआ। कोई महलो पर, कोई छज्जो पर (आकर देखने लगी), उन्होंने कुल की लज्जा नही की। कोई पुर की गली-गली से होकर दोड पड़ी तथा धाम का काम सब कुछ भूल गया। नये वादल के समान सुन्दर शरीर वाले कृष्ण के चन्द्र-मुख हेतु पुर की नारियो ने अपने दोनो नेत्रो को (चकोर) पक्षी बना लिया। सूरदास कहते हैं कि अपने-अपने हृदय मे प्रेम भरकर पुर की नारियां कृष्ण को देखती हैं ॥१८॥ ढोटा नंद कौ यह री। नाहिं जानति बसत ब्रज मैँ, प्रगट गोकुल री। धरयौ गिरिवर वाम कर जिहिँ, सोइ है यह री। दैत्य सब इनहीँ सँहारे, आपु-भुज-बल री। ब्रज-घरनि जो करत चोरी, खात माखन री। नंद-घरनी जाहिँ बाँध्यौ, अजिर ऊखल री। सुरभि-ठान लिये वन तैँ आवत, सबहिँ गुन इन री। सूर-प्रभु ये सबहि लायक, कंस डरै जिन री ॥१९॥ अर्थ—यही नन्द के पुत्र हैं। जानती नही कि (यही) ब्रज में बसते हैं तथा गोकुल मे प्रकट हुए हैं। वाये हाथ से जिन्होने गिरवर को धारण किया यह वही है। अपनी भुजाओं के बल से इन्होने सारे दैत्यो का सहार किया। ब्रज के घरो मे जो चोरी करते हैं तथा माखन खाते हैं। नन्द की स्त्री ने जिन्हे आंगन मे ऊखल से बांधा था। गायो का समूह लेकर वन से आते है, इनमे सभी गुण हैं। सूरदास कहते हैं कि ये सब (कुछ करने) योग्य हैं, और कंस जिनसे डरता है ॥१९॥ भए सखि नैन सनाथ हमारे। मदनगोपाल देखतहिँ सजनी, सब दुख सोक विसारे। पठये हे सुफलक-सुत गोकुल, लैन सो इहाँ सिधारे। मल्ल जुद्ध प्रति कंस कुटिल मति, छल करि इहाँ हँकारे। मुष्टिक अरु चानूर सैल सम, सुनियत हैं अति भारे। कोमल कमल समान देखियत ये जसुमति के बारे।