सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रवननि सुनत रहत है जाकौ, सो दरसन भए नैन । कंचन कोटि कँगूरनि की छबि, मानी बैठे मैन । उपवन बन्यौ चहूँधा पुर के, अतिहीँ मोकौँ भावत । सूर स्याम बलरामहिँ पुनि पुनि, कर पल्लवनि दिखावत ॥१६॥ अर्थ—अक्रूर से कृष्ण पूँछते हैं। (जहाँ) महलों पर सूर्य की किरणे छायी हैं (क्या) इसी का नाम मधुपुरी है। कानो से जिसे सुनता रहा उसका नेत्रो से दर्शन हो गया । सोने के महल के कंगूरो की शोभा ऐसी है मानों कामदेव बैठे हों । पुर के चारो ओर बने उपवन मुझे अत्यधिक रुचिकर लगते हैं । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण कर- पल्लवो से बलराम को बार-बार दिखाते हैं ॥१६॥ मथुरा हरषित आजु भई । ज्यौँ जुवती पति आवत सुनि कै, पुलकित अंग मई । नवसत साजि सिंगार सुदरी, आतुर पंथ निहारति । उड़ति धुजा तनु सुरति बिसारे, अंचल नहीँ संभारति । उरज प्रगट महवनि पर कलसा, लसति पास बन सारी । ऊँचे अटनि छाज की सोभा, सीस उचाइ निहारी । जालरंध्र इकटक मग जोवति, किंकिन कंचन दुर्ग । बेनी लसति कहाँ छबि ऐसी, महलनि चित्रे उर्ग । बाजत नगर बाजने जहँ तहँ, और बजत घरियार । सूर स्याम बनिता ज्यौँ चंचल, पग नूपुर झनकार ॥१७॥ अर्थ—मथुरा आज हर्षित हो गयी, जैसे पति को आता सुनकर युवती के अंग पुलकित हो जाते हैं। सोलह श्रृंगार सजाकर सुन्दरी आतुर होकर पथ निहारती है। उड़ती हुई ध्वजा (ऐसी ज्ञात होती है) जैसे विस्मृत होकर अपने अंचल को नही सम्हालती । महलों पर रखे गये कलस (रूपी) स्तन प्रत्यक्ष हो गये तथा पास के वन (रूपी) साडी शोभित है। ऊँची छतो छज्जे शोभित हैं, (जैसे छज्जे के रूप में मथुरा रूपी नारी) सिर ऊँचा करके पथ निहार रही है। झरोखे की जालियो मे इकटक रास्ता देखती हैं। कंचन के दुर्ग (नगर सुन्दरी) की किंकिणी हैं। महलो पर के चित्रित सांप चोटी के समान शोभित हैं और जगह ऐसी छवि कहाँ है । नगर मे जहाँ-तहाँ वाजे तथा घड़ियाल बजते है, सूरदास कहते है मानो यह कृष्ण की चंचल पत्नी है जिसके पग के नूपुरों को झनकार हो रही है ॥१७॥ मथुरा पुर मैँ सोर पर्यौ । गरजत कंस बंस सब साजे, मुख कौ नीर हर्यौ । पीरौ भयौ, फेफरी अधरनि, हिरदय अतिहि डर्यौ । नंद महर के सुत दोउ सुनि कै, नारिनि हर्ष भर्यौ ।