सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ सूरसागर सार सटीक इते मान व्याकुल भइ सजनी, आरज पंथहुँ तैं बिडरी। सूरदास-प्रभु जहाँ सिधारे, कितिक दूर मथुरा नगरी ॥१३॥ अर्थ—आज रात में नीद नही आयी। जागती हुई आकाश के तारे गिनती रही, जीभ गोविंद कृष्ण रटती रही। जब अक्रूर की बाँह (कृष्ण ने) पकड़ी, (उस समय की) वह दृष्टि, वह रथ पर बैठना, (कितना निष्ठुर था)। (तब) हम ठगी सी खडी रही, तथा काम से दग्ध कुछ कह न सकी। हे सखी ! इतना अधिक व्याकुल हो गयी कि आर्यपथ से भी अलग हो गयी। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण जहां गये वहां से मथुरा नगरी कितनी दूर है ॥१३॥ री मोहिं भवन भयानक लागै, माई स्याम विना। काहि जाइ देखीँ भरि लोचन, जसुमति कैं अँगना। को सकट सहाइ करिवै कौं, मेटै विघ्न घना। लै गयौ क्रूर अक्रूर साँवरौ, ब्रज कौ प्रानधना। काहि उठाइ गोद करि लीजै, करि करि मन मगना। सूरदास मोहन दरसन बिनु, सुख सम्पति सपना ॥१४॥ अर्थ--हे सखी ! कृष्ण के बिना मुझे घर भयानक लगता है। यशोदा के आंगन जाकर किसे भर-निगाह (जी भर कर) देखूं। संकट (के समय) कौन सहायता करे (तथा) घने विघ्नों को मिटा दे। निर्दयी अक्रूर ब्रज के प्राणधन को लेकर चला गया। किसे उठाकर मन को प्रसन्न कर करके गोद मे ले ले। सूरदास कहते हैं कि मोहन के दर्शन के बिना सुख-सम्पत्ति स्वप्न के समान (है) ॥१४॥ कहा हौँ ऐसे ही मरि जैहौँ। इहिँ आँगन गोपाल लाल कौ, कबहुँ कि कनिया लैहौँ। कब वह मुख बहुरौ देखौंगी, कह वैसो सचुपैहौँ। कब मोपै माखन माँगैगे, कब रोटी धरि दैहौँ। मिलन आस तन-प्रान रहत हैं, दिन दस मारग ज्वैहौँ। जौ न सूर अइहैं इते पर, जाइ जमुन धँसि लैहौँ ॥१५॥ अर्थ—क्या मैं ऐसे ही मर जाऊँगी ? इस आँगन मे गोपाल लाल को कभी गोद मे लूंगी ? वह मुख फिर कब देखूँगी, वह सुख कहाँ पाऊँगी ? कब मुझसे मक्खन मागेगे, कब रोटी पर (मक्खन) रखकर दूँगी। मिलने की आशा से शरीर मे प्राण रुके है। दस दिन तक रास्ता देखूँगी। सूरदास कहते है कि इस बीच यदि नही आयेगे तो (हम गोपियां) जाकर यमुना मे धंस जायेगी ॥१५॥ मथुरा प्रवेश तथा कस-वध बूझत हैं अक्रूरहिँ स्याम। तरनि किरनि महलनि पर झईं, इहै मधुपरी नाम।