भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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२१० सूरसागर सार सटीक आकाश मे बादल फैल गये हो । सूरदास कहते हैं सुन्दर रंग दशों दिशाओ मे परिपूर्ण हो गया । देवतागण विमान मे विस्मृत हो कृष्ण के विनोद को देखते हैं ॥१६२॥ नंद नंदन बृषभानु किसोरी, मोहन राधा खेलत होरी । श्रीवृन्दावन अतिहिं उजागर, वरद बरन नव दंपति भोरी । एकनि कर है अगरु कुमकुमा, एकनि कर केसरि लै घोरी । एक अर्थ सौं भाव दिखावति, नाचति तरुनि बाल वृध भोरी । स्यामा उतहिं सकल ब्रज-वनिता, इतहिं स्याम रस रूप लहौ री । कंचन की पिचकारी छूटति, छिरकत ज्यौं सचुपावैं गोरी । अतिहिं ग्वाल दधि गोरस माते, गारी देत कहौ न करौ री । करत दुहाई नंदराइ की, लै जु गयौ कल बल छल जोरी । झुंडनि जोरि रही चंद्रावलि, गोकुल मैं कछु खेल मच्यौ री । सूरदास-प्रभु फगुआ दीजै, चिरजीवौ राधा वर जोरी ॥१६३॥ अर्थ-कृष्ण तथा राधा होली खेलते हैं। वृन्दावन अत्यधिक प्रकाशित (चहल- पहलमय) है। रंग-रंग के नवीन दम्पति विभोर खड़े हैं। एक (के) हाथ मे अगरु और कुमकुम है, तो एक हाथ मे लेकर केसर घोलता है। (सब) एक ही तरह का भाव दिखाते हैं। बाल, वृद्ध तथा तरुण सभी विभोर होकर नाचते हैं। उधर राधा तथा समस्त ब्रजवनिंताये हैं, इधर कृष्ण रूप लाभ कर रहे हैं। सोने की पिचकारी छूट रही है, छिरकने पर सखियां सुखी होती हैं। ग्वाल अत्यधिक दूध तथा दही से मस्त हैं, गाली देते हुए कहना नही करते। नंदराय (कृष्ण) की दुहाई देते हैं जो उपाय, बल तथा छल से जोड़ी लेकर चले। चन्द्रावली आदि झुण्ड बनाकर बोली कि गोकुल मे कुछ खेल मचा है। सूरदास कहते हैं (चन्द्रावली कहती है) प्रभु अब फगुआ (इनाम) दीजिये, राधा की श्रेष्ठ जोड़ी अनन्त काल तक जिये ॥१६३॥ गोकुलनाथ विराजत डोल । संग लिये वृषभानु-नंदिनी, पहिरे नील निचोल । कंचन खचित लालमनि मोती, हीरा जटित अमोल । झुलवहिँ जूथ मिलै ब्रजसुंदरि, हरषित करतिं कलोल । खेलतिँ, हँसतिँ परस्पर गावर्ति, बोलतिँ मीठे बोल । सूरदास स्वामी, पिय-प्यारी, झूलत हैं झकझोल ॥१६४॥ अर्थ - कृष्ण झूले पर शोभित है। नीले रंग की ओढनी पहने हुए राधा को साथ लिये हुए है। (राधा) सोने से खचित लाल मणि, मोती तथा हीरे से जड़ा अमूल्य हार पहने है। ब्रज की सुन्दरियां मिलकर उन्हे झुलाती हैं तथा हर्षित होकर कल्लोल करती हैं। खेलती हैं, हँसती हैं तथा परस्पर मीठी बोली बोलती है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण और प्यारी राधा झूले पर झोके के साथ झूलते हैं ॥१६४॥