भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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मथुरा गमन अक्रूर ब्रज आगमन कंस नृपति अक्रूर बुलाये । बैठि इकंत मंत्र दृढ़ कीन्हौ, दोऊ बंधु मंगाये । कहूँ मल्ल, कहूँ गज दै राखे, कहूँ धनुष कहूँ वीर । नंद महर के बालक मेरैं, करषत रहत सरीर । उनहिं बुलाइ बीच ही मारौं, नगर न आवन पावैं । सूर सुनत अक्रूर कहत, नृप मन-मन मौज बढ़ावैं ॥१॥ अर्थ – राजा कंस ने अक्रूर को बुलाया। एकांत मे बैठकर दृढ़ मंत्रणा करके दोनों भाइयो (कृष्ण और बलराम) को मँगाया। कही पर मल्ल (योद्धा), कही हाथी, कही धनुष तथा कही वीरो को तैनात करके रखा। (कंस ने कहा) नंद महर के पुत्र मेरे शरीर में चुभते रहते हैं; उन्हे बुलाकर बीच मे ही मार डालूँ, नगर तक आने ही न पावें। सूरदास कहते हैं कि अक्रूर कंस की बातों को सुनते हैं तथा राजा कंस कहते हुए मन-ही-मन आनन्द बढ़ाते हैं ॥१॥ उत नंदहिं सपनौ भयौ, हरि कहूँ हिराने । बल-मोहन कोउ लै गयौ, सुनि कै बिलखाने । ग्वाल सखा रोवत कहैं, हरि तौ कहूँ नाहीँ । संगहि संग खेलत रहे, यह कहि पछिताहीं । दूत एक सँग लै गयौ, बलराम कन्हाई । कहा ठगौरी सी करी, मोहिनी लगाई । वाही के दोउ ह्वै गए, हम देखत ठाढ़े । सूरज प्रभु वै निठुर ह्वै, अतिहीं गए गाढ़े ॥२॥ अर्थ – उधर (मथुरा मे) नन्द को स्वप्न हुआ कि कृष्ण कही खो गये। बलराम और मोहन को कोई ले गया यह सुनकर (सब) बिलखने लगे। ग्वाल सखा रोते हुए कहते हैं कि कृष्ण तो कहीं नहीं हैं। (हम) साथ-साथ खेलते रहे यह कह कहकर पछताते हैं। बलराम और कृष्ण को कोई दूत साथ ले गया। मोहनी लगाकर पता नही क्या जादू सा कर दिया कि दोनों उसी के हो गये, हम खड़े देखते रहे। सूरदास कहते हैं कि (ग्वाल कहते हैं) वे कृष्ण निष्ठुर होकर अत्यधिक कष्ट देकर चले गये ॥२॥ सुफलक-सुत हरि दरसन पायौ । रहि न सक्यौ रथ पर सुख-व्याकुल, भयौ वहै मन भायौ ।