सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमथुरा गमन २२१ कांधि धरि दोऊ जन आए, दंत कुंबलयापीर के। 'पसुपति मंडल मध्य मनो, मनि क्षीरधि नीरधि नीर के। उड़ि आए तजि हंस मात मनु, मानसरोवर तीर के। सूरदास प्रभु ताप निवारन, हरन संत दुःख पीर के ॥२४॥ अर्थ—नन्द अहीर के पुत्र ये ही हैं। बलराम तथा मित्रों के साथ धोबी को मारकर (इन्होने) सब वस्त्र लूट लिये। कुवलयापीड (हाथी) के दांतो को कन्धे पर रखकर दोनो भाई आये । पशुपति मंडल के बीच मानों क्षीर सागर की मणि हो, मानों मतवाले हंस होकर मानसरोवर के तीर को छोड़कर उड़ आये हों.। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ताप का निवारण करने वाले, (तथा) सन्तो के दुख और पीड़ा को हरने वाले हैं ॥२४॥ सुनो हो बीर मुष्टिक चानूर सबै, हमहिं नृप पास नहिं जान दैहौ। घरि राखे हमें, नहीं बूझे तुम्हें, जगत मैं कहा उपहास लैहौ। सबै यहै कहै भली मत तुम पै है, नंद के कुँवर दोउ मल्ल मारे। यहै जस लेहुगे, जान नहिं देहुगे, खोजही परे अब तुम हमारे। हम नहीं कहैं तुम मनहिं जौ यह बसी, कहत हौ कहा तौ करौ तैसी। सूर हम तन निरखि देखियै आपुकीं, बात तुम मनहिं यह बसी नैसी ॥२५॥ अर्थ—मुष्टिक, चानूर, सभी वीरों सुनो ! क्या मुझे राजा के पास नही जाने दोगे ? मुझे घेरकर खड़े हो, (मैं) तुम्हे (कुछ) नही समझता, (तुम) जगत में हँसे जाओगे। सभी, यही भली बात तुमसे कहेगे (कि) नन्द के पुत्रों ने दोनो मल्लो को मार डाला । (तुम) यही यश लोगे और जाने नही दोगे, तुम मेरे पीछे ही पढ गये हो। तुम्हारे मन में जो यही बसा है तो हम (कुछ) नही कहेंगे । (मल्लो ने कहा) क्या कहते हो, जैसा करना हो करो। सूरदास कहते हैं (मल्ल कृष्ण से कहते हैं) कि हमारी तरफ देखकर अपने को देखो ! तुम्हारे मन मे (हम से भिड़ने की) यह बुरी बात बस गयी है ॥२५॥ गह्यौ कर स्याम भुज मल्ल अपने धाइ, झटकि लीन्हौ तुरत पटकि धरनी । भटकि अति सब्द भयौ, खटक नृप के हियैं, अटकि प्राननि पर्यौ चटक करनी। लटकि निरखन लग्यौ, मटक सब भूलि गइ, हटक करि देउँ इहै लागी । झटकि कुंडल निरखि, अटक ह्वै कै गयौ, गटकि सिल सौं रही मीच जागी। मल्ल जे जे रहे सबै मारे तुरत, असुर जोधा सबै तेउ सँहारे। धाइ दूतनि कह्यौ, मल्ल कोउ न रह्यौ, सूर बलराम हरि सब पछारे ॥२६॥ अर्थ—मल्ल ने दोडकर अपनी भुजा से कृष्ण का हाथ पकड़ लिया। (कृष्ण ने) तुरन्त झटककर (हाथ छुड़ा लिया), (और) (उसे) धरती पर पटक दिया। घोर शब्द से (राजा) भ्रमित हुआ, राजा (कंस) के हृदय मे खटका पैदा हुआ, चटक कर प्राण उलझ गये। लटक कर (झुककर) (वह मल्ल) देखने लगा, सारी गति भूल गई, यही