सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 245, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ेंउद्धव संदेश २८५ करे तथा बहरी स्त्री पति से यदि परामर्श करे तो उसे उत्तर भी उसी प्रकार मिलेगा (उसे निराश होना पड़ेगा)। उसकी ये सभी गतियां होंगी जो ग्वालिनो को योग सिखाता है। (तुम) कृष्ण की सिखायी बात कर रहे हो इसलिए तुम्हे दोष नही है। (कृष्ण तुमसे) राज्य-कार्य नही चलेगा, अपने शरीर का पालन करो। सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) (कृष्ण) मार्ग में सब कुछ भूल जाते, यहां आकर क्या कहते ! अच्छा ही हुआ ख्याल बना रहा नही तो मोह की धारा में वह जाते ॥६१॥ अँखियाँ हरि दरसन की प्यासी। देखी चाहतिं कमलनैन कौं, निसि-दिन रहतिं उदासी। आए ऊधौ फिरि गए आँगन, डारि गए गर फाँसी। केसरि तिलक मोतिनि की माला, वृन्दावन के वासी। काहू के मन की कोउ जानत, लोगनि के मन हाँसी। सूरदास-प्रभु तुम्हरे दरस कौं, करवट लैहौँ कासी ॥६२॥ अर्थ—आंखे कृष्ण के दर्शन के लिए प्यासी हैं। कमल नयन (कृष्ण को) देखना चाहती हैं इसीलिए दिन-रात उदास रहती हैं। हे उद्धव, वृन्दावन के वासो (श्री कृष्ण) केसर का तिलक लगाए हुए और मोतियों की माला पहने हुए एक दिन हमारे आंगन मे आए और गले मे फांसी देकर (वियोग की असह्य पीड़ा देकर) चले गये। किसी के मन को कोई जानता है ? लोगों के मन मे हंसी ही रहती है।, सूरदास कहते हैं कि (गोपियाँ कहती हैं) कृष्ण तुम्हारे दर्शन के लिए काशी मे करवट (व्रत) ले लूंगी ॥६२॥ जब तैं सुंदर बदन निहार्यौ। ता दिन तैं मधुकर मन अटक्यौ, बहुत करी निकरै न निकार्यौ। मातु, पिता, पति, बंधु, सुजन नहिं, तिनहूँ की कहिबौ सिर धार्यौ। रही न लोक लाज मुख निरखत, दुसह क्रोध फीकौ करि डार्यौ। ह्वै बौ होइ सु होइ कर्मबस, अब जी कौ सब सोच निवार्यौ। दासी भई जु सूरदास प्रभु, भलौ पोच अपनौ न विचार्यौ ॥६३॥ अर्थ—जब से सुन्दर मुख को निहारा, उसी दिन से (हे) भ्रमर मन उलझ गया, निकालने का बहुत प्रयास किया, लेकिन निकला नही। माता, पिता, भाई तथा स्वजनों का भी कहना स्वीकार नही किया। कृष्ण का मुख देखते ही लोक-लज्जा नही रही (नष्ट हो गई), दुःसह क्रोध ने फीका कर डाला। कर्म के अनुसार जो होना होगा होगा, अब मन की सभी चिन्ताएँ दूर कर दी क्योकि कृष्ण की जो दासी हो गयी उसने अपना अच्छा-बुरा कुछ भी विचार नही किया ॥६३॥ और सकल अंगनि तैं ऊधौ, अँखियाँ अधिक दुखारी। अतिहिं पिरातिं सिरातिं न कबहूँ. बहुत जतन करि हारी। मग जोवत पलकौं नहिं लावतिं, विरह विकल भई भारी। भरि गइ विरह बयारि दरस बिनु, निसि दिन रहतिं उघारी।