सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८६ सूरसागर सार सटीक ते अलि अब ये ज्ञान सलाकैँ, क्योंँ सहि सकतिँ तिहारी। सूर सु अंजन आँजि रूप रस, आरति हरहु हमारी ॥६४॥ अर्थ—उद्धव समस्त अगों की अपेक्षा आंखे अधिक दुखी हैं। वे अत्यधिक पीडा करती है। बहुत यत्न करके हार गयो लेकिन वे शीतल नही होती। रास्ता देखते हुए पलके भी नही लगती तथा विरह से अत्यधिक व्याकुल हो गई । दर्शन के बिना उनमें विरह की हवा भर गयी है इसलिए रात-दिन खुली रहती हैं। हे भ्रमर ! (उद्धव) अब तुम्हारे ज्ञान की शलाका ये कैसे सह सकती है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) सुन्दर रूप रस के अंजन को इनमें आंजकर हमारे दुख को दूर करो ॥६४॥ उपमा नैन एक न रही । कवि जन कहत कहत सब आये, सुधि कर नाहि कही । कहि चकोर बिधु मुख बिनु जीवत, भ्रमर नहीँ उड़ि जात । हरि-मुख कमल कोष बिछुरे तैँ, ठाले कत ठहरात । ऊधौ बधिक व्याध ह्वै आए, मृग सम क्योंँ न पलात । भागि जाहिँ बन सघन स्याम मैँ, जहाँ न कोऊ घात । खंजन मन-रंजन न होहिँ ये, कवहूँ नहीँ अकुलात। पंख पसारि न होत चपल गति, हरि समीप मुकुलात । प्रेम न होइ कौन निधि कहियै, झूठँ हीँ तन आड़त । सूरदास मीनता कछू इक, जल भरि कबहूँ न छाँड़त ॥६५॥ अर्थ—आंखो की किसी से समानता नही रह गयी । कवि लोग कहते आये लेकिन (किसी ने) सोच कर नही कहा । (इन्हे) चकोर कहा जाय (किन्तु यह भी उचित नही है (क्योकि ये) कृष्ण मुख रूपी चन्द्रमा को देखे बिना जीवित रहती हैं । भ्रमर भी नही है नही तो उड़ जाते क्योकि कृष्ण रूपी कमल कोश के बिछुड़ जाने पर व्यर्थ क्यो ठहरे रहते ? उद्धव वधिक तथा व्याध के समान आये हैं, ये मृग के समान भाग क्यों नही जाते ? श्याम रूपी सघन वन मे भाग जांय, जहाँ कोई भय नही है। ये मन के अच्छे लगने वाले खंजन पक्षी भी नही हैं क्योकि ये कभी आकुल नही होते तथा पंख पसार कर ये चंचल गति नही होते, और न ही कृष्ण के आगे मुकुलित ही होते हैं। किस तरह कहा जाय इन्हे प्रेम नही है, ये व्यर्थ शरीर को रोके हैं। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) इनमे मछली के गुण कुछ मात्रा मे हैं। क्योकि जल-भरना कभी नही छोड़ते ॥६५॥ ऊधौ अँखियाँ अति अनुरागी । इकटक मग जोवतिं अरु रोवतिं, भूलेहुँ पलक न लागी । बिनु पावस पावस करि राखी, देखत हौ बिदमान । अब धौं कहा कियौ चाहत हौ, छाँड़ी निरगुन ज्ञान ।