सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 247, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ेंउद्धव संदेश २८७ तुम हौ सखा स्याम सुंदर के, जानत सकल सुभाइ । जैसे मिलैं सूर के स्वामी, सोई करहु उपाइ ॥६६॥ अर्थ—उद्धव, आंखें अत्यन्त अनुरक्त हैं। टकटकी लगाकर रास्ता देखती हैं, भूल से भी पलक नही लगती । पावस ऋतु के बिना ही (आंसू की वर्षा करके) पावस बना दिया है (तुम) इसे प्रत्यक्ष देख रहे हो । अब क्या करना चाहते हो । निर्गुण ज्ञान को छोड़ दो । तुम श्याम सुन्दर के मित्र हो, समस्त स्वभाव को जानते हो । सूरदास कहते हैं (गोपी कहती है) कि कृष्ण जैसे भी मिल जायें, वैसा उपाय करो ॥६६॥ सब खोटे मधुबन के लोग । जिनके संग स्याम सुंदर सखि, सीखे हैं अपजोग । आए हैं ब्रज के हित ऊधौ, जुवतिनि कौ लै जोग । आसन, ध्यान नैन मूंदे सखि, कैसें कढ़ौ बियोग । हम अहीरि इतनी का जानैं, कुबिजा सौं संजोग । सूर सुवैद कहा लै कीजै, कहैं न जानै रोग ॥६७॥ अर्थ—मधुबन के सभी लोग खोटे (बुरे, दुष्ट) है, सखी जिनके साथ कृष्ण ने बुरा योग (दुखद योग शास्त्र की बाते) सीखा है। उद्धव ब्रज मे युवतियो को योग लेकर आए हैं। आसन, ध्यान तथा आंखे बन्द करने से वियोग कैसे दूर हो (निकल) सकता है। हम अहीर की लड़कियां इतना क्या जाने कि (कृष्ण का) कुबरी से संयोग हुआ है। सूरदास कहते हैं ( गोपियां कहती हैं ) सुन्दर वैद्य कहां तक (प्रयास करे) बिना कहे रोग को नही जानता ॥६७॥ मधुबन लोगनि को पतियाइ । मुख औरै अंतरगति औरै, पतियाँ लिखि पठवत जु बनाइ । ज्यौँ कोइल सुत-काग जियावै, भाव भगति भोजन जु खवाइ । कुहूकि कुहूकि आएँ बसत रितु, अंत मिलै अपने कुल जाइ । ज्यौँ मधुकुर अंबुज-रस चाख्यौ, बहुरि न बूझे बातैं आइ । सूर जहाँ लगि स्याम गात हैं, तिनसौँ कीजै कहा सगाइ ॥६८॥ अर्थ--मधुबन के लोगों पर कौन विश्वास करे ? मुख में (कुछ) और है, हृदय मे कुछ और तथा पत्र मे कुछ और (बनाकर) लिखकर भेजते है। जैसे कोयल के पुत्र को भाव, भक्ति तथा भोजन कराके कौआ जिलाता है, किन्तु बसन्त ऋतु आने पर अन्त मे कुहूक-कुहूक कर जाकर अपने कुल से मिल जाता है। जैसे भ्रमर कमल रस को चखकर फिर आकर बाते नही पूछता है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) जहाँ तक सांवले शरीर वाले हैं, उनसे कैसे सम्बन्ध किया जाय ॥६८॥ आए जोग सिख परमारथी पुराननि लाने